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मोदी को सिर से उतारना होगा एयर इंडिया का बोझ

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  May 14, 2017

ऐसी स्थिति की कल्पना कीजिए जहां किसी कंपनी में नई जान फूंकने के लिए उसका प्रवर्तक भारी पूंजीगत निवेश करता है लेकिन कंपनी के प्रदर्शन में कोई ठोस सुधार नहीं होता है। तब उस प्रवर्तक के पास क्या विकल्प रह जाएंगे? या तो कंपनी की वित्तीय पुनर्संरचना की जाए जिसमें कर्ज की वसूली के लिए बैंक किसी समाधान पर सहमत हो जाएं या फिर कंपनी को सीधे तौर पर बंद ही कर दिया जाए। तीसरा विकल्प यह होगा कि कंपनी का घाटा अधिक होने के पहले ही उसे किसी खरीदार को बेच दिया जाए। 

 
हालांकि जब सवालों के घेरे में आया प्रवर्तक भारत सरकार हो और कंपनी एयर इंडिया हो तो ये सारे विकल्प अप्रासंगिक ही नजर आते हैं। सरकार के स्वामित्व वाली विमानन कंपनी एयर इंडिया चौतरफा नुकसान से घिरी है, उस पर कर्जों का भारी बोझ है और उसकी बाजार हिस्सेदारी काफी कम हो चुकी है, कर्मचारियों की संख्या जरूरत से अधिक है और विमानों का बेड़ा भी छोटा हो चुका है। 
 
संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के दूसरे कार्यकाल में एयर इंडिया को नुकसान से उबारने के लिए उसमें 15,200 करोड़ रुपये की पूंजी लगाई गई थी। उसके बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार में आया जिससे उम्मीद जगी कि घाटे में चल रही कंपनी को मदद के नाम पर खैरात देने की आदत पर लगाम लग जाएगी। लेकिन ये सारी उम्मीदें धराशायी हो गईं। 
 
एयर इंडिया के मामले में राजग भी संप्रग से अलग नहीं नजर आ रहा है। राजग के पिछले तीन वर्षों के कार्यकाल में सरकार ने आर्थिक मदद के नाम पर एयर इंडिया में 11,545 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि का निवेश किया है। इस साल के बजट में किए गए 1,800 करोड़ रुपये के प्रावधान को भी अगर जोड़ दें तो राजग सरकार की तरफ से एयर इंडिया को दी गई आर्थिक सहायता बढ़कर 13,345 करोड़ रुपये हो जाएगी। संप्रग सरकार के समय इसमें लगाई गई रकम को जोड़ दिया जाए तो नौ वर्षों के दौरान 28,500 करोड़ रुपये से भी अधिक पूंजी का इस एयरलाइन में निवेश किया जा चुका है। यह राशि एयर इंडिया के एक साल के मौजूदा राजस्व से थोड़ी अधिक ही है।
 
वर्ष 2009-10 में एयर इंडिया की भारतीय विमानन बाजार में  हिस्सेदारी 17 फीसदी हुआ करती थी। अब इसकी बाजार हिस्सेदारी 14 फीसदी पर आ गई है। विमानों के बेड़े का आकार भी वर्ष 2010 के 148 से गिरकर 118 पर आ चुका है। इस अवधि में एयर इंडिया के सभी बहीखातों पर भी लाल निशान देखने को मिले हैं। वर्ष 2009-10 में इसका घाटा 5,522 करोड़ रुपये रहने का अनुमान था जो आगे भी बढ़ता चला गया। वर्ष 2013-14 में एयर इंडिया का घाटा 6,280 करोड़ रुपये रहा था। उसके अगले साल राजग की सरकार आने पर एयर इंडिया की सेहत में हल्का सुधार हुआ था लेकिन उसके बाद भी एयर इंडिया को 5,860 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था। 
 
पिछले तीन वर्षों में विमान ईंधन की कीमतें कम रहने से अन्य विमानन कंपनियों ने अच्छा-खासा मुनाफा कमाया है लेकिन एयर इंडिया को वर्ष 2015-16 में 3,837 करोड़ रुपये का घाटा उठाना पड़ा था। हालांकि उस साल यह एयरलाइन 105 करोड़ रुपये का परिचालन लाभ हासिल करने में सफल रही थी। कर्ज के भारी बोझ को एयर इंडिया का प्रदर्शन लगातार खराब रहने का कारण माना जाता है। संप्रग सरकार के अंतिम साल में एयर इंडिया पर 48,359 करोड़ रुपये का कर्ज था और राजग सरकार के दूसरे साल (2015-16) में यह बढ़कर 50,357 करोड़ रुपये हो गया।
 
ऐसे में सरकार के सामने एयर इंडिया के लिए क्या विकल्प रह जाते हैं? इसने वित्तीय पुनर्संरचना के जरिये कायापलट कर देने का विकल्प तो पहले ही आजमा लिया है। इस विकल्प पर पिछले कुछ वर्षों से काम चल रहा है और 2020-21 तक इस योजना में कुल निवेश 30,231 करोड़ रुपये हो जाने का अनुमान है। इसमें से 24,745 करोड़ रुपये तो खर्च भी किए जा चुके हैं। सरकार का कहना है कि वह कर्ज चुकाने के लिए एयर इंडिया की संपत्तियों की बिक्री से करीब 5,000 करोड़ रुपये जुटाने की योजना बना रही है। इसके अलावा एयर इंडिया ने लागत में कटौती, नए रूटों पर परिचालन शुरू करने, मार्केटिंग पर अधिक ध्यान देने, मांग के अनुरूप किराया बढऩे की डाइनैमिक किराया नीति अपनाने और परिचालन सक्षमता दुरुस्त करने की रणनीति को भी अंतिम रूप दे दिया है। लेकिन इन कोशिशों से एयरलाइन की आर्थिक स्थिति पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा है। 
 
अगर किसी निजी कंपनी ने आर्थिक अनुशासन के मामले में इतना लचर प्रदर्शन किया होता तो इसके प्रबंधन को बर्खास्त कर दिया गया होता और उसके प्रवर्तक कामकाज समेटने या खुद उससे अलग होने के बारे में सोचते। लेकिन एयर इंडिया की बंदी का विकल्प भी संभव नहीं लगता है। सरकार चाहती है कि देश के सामने जरूरत पडऩे पर एयर इंडिया का इस्तेमाल एक राष्ट्रीय एयरलाइन के रूप में किया जा सकेगा।
 
ऐसे में एयर इंडिया की बिक्री का तीसरा विकल्प ही बच जाता है। इसे निजी क्षेत्र के किसी रणनीतिक सहयोगी को सौंप दिया जाए जो सरकारी नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त रहते हुए इसका संचालन करे। इस दौरान सरकार एयर इंडिया के 26 फीसदी से अधिक शेयर अपने पास रख सकती है। ऐसे प्रावधान भी किए जा सकते हैं कि निवेशकों केे एक खास समूह के पास रणनीतिक नियंत्रण न पहुंच जाए। एयर इंडिया को किसी रणनीतिक निवेशक के सुपुर्द करने का समय आ चुका है और सरकार को अपने पुराने फैसले पर विचार करना चाहिए। आज एयर इंडिया एक ऐसा बोझ बन चुका है जो प्रधानमंत्री मोदी के गले से लटका हुआ है। मोदी इस बोझ से मुक्ति पा सकते हैं लेकिन इसके लिए उन्हें एयर इंडिया का निजीकरण करना होगा। 
Keyword: aviation, विमानन, एयर इंडिया,
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