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जापान जैसे साझेदार का फायदा उठाने को तैयार?

मिहिर शर्मा /  May 14, 2017

आखिर हम अपने सबसे महत्त्वपूर्ण साझेदार, जापान की अनदेखी क्यों कर रहे हैं? सवाल उठा रहे हैं मिहिर शर्मा

 
भारत के साथ सबसे अहम द्विपक्षीय रिश्ते अमेरिका, चीन या पाकिस्तान के साथ नहीं बल्कि जापान के साथ माने जा सकते हैं। फिलहाल कोई और देश भारतीय अर्थव्यवस्था की मदद करने की वैसी स्थिति में नहीं है जैसा कि जापान। सुरक्षा साझेदारी के मामले में अवश्य अमेरिका सबसे अधिक संभावनाओं से भरा है। परंतु भारत न तो पिछली सरकार और न ही मौजूदा सरकार के कार्यकाल में जापान के साथ प्रगाढ़ रिश्तों का लाभ लेने की दिशा में उचित ढंग से आगे बढ़ा है। यह भी एक तरीका है जिससे यह समझा जा सकता है कि क्यों भारत का विकास का दायरा और उसकी विकास संबंधी प्राथमिकताएं चीन के उस वक्त के स्वरूप से अलग हैं जब वह भारत के मौजूदा आकार के बराबर था। यह तकरीबन 20 वर्ष पुरानी बात है। चीन ने न केवल व्यापार को अपनाया बल्कि उसने तमाम सांस्कृतिक और आपसी शंकाओं के बावजूद जापानी निवेश का इस्तकबाल किया। विदेशों में रहने वाले चीनी नागरिकों ने जापानी नकदी जमकर बचाई और अरबों डॉलर के निवेश से चीन का स्वरूप बदल दिया। अब चीन अति राष्ट्रवादी हो गया है और उसका विकास मॉडल छिटक रहा है। जापान की नजर भारत समेत तमाज जगहों पर है। 
 
जापान भारत में पहले ही काफी कुछ कर रहा है। वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारामन हाल ही में अपनी जापान यात्रा में कह चुकी हैं कि मॉरीशस और सिंगापुर को छोड़ दिया जाए तो जापान भारत में सबसे बड़ा निवेशक है। वर्ष 2000 के बाद से वह भारत में 25.2 अरब डॉलर की राशि निवेश कर चुका है। वर्ष 2010 तक वह पेंशन और बीमा फंड में 80 खरब डॉलर की राशि लगा चुका था। शिंजो आबे के मंत्रिमंडल ने विदेशों के बुनियादी निवेश में 200 अरब डॉलर के निवेश की बात कही है। कहना नहीं होगा कि यह काफी आसान शर्तों पर दिया जाएगा। निवेश और विशेषज्ञता के मोर्चे पर भी हमारे पास जापान जैसा विकल्प नहीं है। 
 
सामरिक दृष्टिï से भी देखें तो जापान की सेना जो आत्मरक्षा तक सीमित रही आई है अब वह दूसरों की मदद करने लगी है। शिंजो आबे ने जापान की समुद्री क्षमताओं में इजाफा करने की प्रतिबद्घता जताई है। दूसरे विश्व युद्घ के बाद उसने अपना सबसे बड़ा नौसैनिक जहाज तैयार किया है और वह इस समय प्रशांत सागर में छोटे अमेरिकी आपूर्ति जहाज की रखवाली कर रहा है। जुलाई में भारत, अमेरिका और जापान की नौसेनाएं संयुक्त अभ्यास करेंगी। शायद ऑस्ट्रेलिया भी इसमें शिरकत करे। 
 
हालांकि मुझे यह समझ नहीं आ रहा है कि पिछले दिनों ऐसी खबरें क्यों आईं कि भारत खुद ऑस्ट्रेलिया की भागीदारी रोकना चाहता है। अगर इसका संबंध ऑस्ट्रेलिया सरकार द्वारा हाल ही में जारी किए गए वीजा नियम से है तो कहना न होगा कि यह अदूरदर्शी है। उम्मीद करता हूं कि इसके पीछे कोई और वजह होगी जिसकी जानकारी मुझे नहीं है। अगर डॉनल्ड ट्रंप के अधीन अमेरिका एशिया से दूरी बनाता है तो हमारे पास ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर और जापान ही सहयोग के लिए प्रमुख विकल्प बचेंगे। 
 
जहां तक मैं देख सकता हूं, जापानी पूंजी के स्वागत और जापानी सैन्य प्रतिष्ठïान के साथ रिश्तों की दलील में दम है। इसके बावजूद हम इस दिशा में जरूरी कदम नहीं उठा पा रहे। 
जापान में भी भारत को लेकर सबकुछ ठीक नहीं है। इसमें सरकार की ही गलती हो ऐसा भी नहीं। दाइची सैंक्यो को रैनबैक्सी के साथ सौदे में जो नुकसान हुआ उसका सरकार से कोई लेनादेना नहीं। लेकिन निश्चित तौर पर जापान की भारत के प्रति निवेश प्रतिबद्घता का यह बहुत बड़ा उदाहरण था और रैनबैक्सी घटनाक्रम ने भावी निवेश को गहरे तक प्रभावित किया। लेकिन कुछ बातें हैं जिनके लिए भारत जिम्मेदार है। मसलन टाटा द्वारा एनटीटी डोकोमो का जायज पैसा रोकने की घटना। दिल्ली उच्च न्यायालय ने आखिरकार इस मामले में कंपनी के पक्ष में निर्णय दिया। इससे अच्छा संकेत यह गया कि भारत अभी भी अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता का सम्मान करता है। यह जापानी निवेशकों के लिए राहत की बात है। 
 
इस बीच बाधाएं लगातार आ रही हैं। तमिलनाडु जिसे कारोबारियों के अनुकूल राज्य माना जाता है वह निशान कंपनी को 2,000 करोड़ रुपये का पुनर्भुगतान करने से इनकार कर रहा है। यह राशि एक द्विपक्षीय निवेश नीति के अधीन उसे चुकाई जानी थी। यह तब हुआ जबकि कंपनी ने वर्ष 2015 में राज्य में 4,500 करोड़ रुपये का निवेश किया था। उसकी योजना इसे दोगुना करने की थी। अगर कंपनियों के साथ ऐसा व्यवहार हो तो फिर प्रधानमंत्री और मंत्रियों की यात्रा का क्या औचित्य हो सकता है? 
 
जापान भारत के लिए अपवाद बनने को तैयार है और इसकी वजहें भी हैं। जापान उम्रदराज हो रहा है और उसे प्रतिफल चाहिए। हमारी आबादी युवा है और हमारे यहां वृद्घि की संभावना है। लेकिन हम प्रत्युत्तर नहीं दे रहे। यह बात सुरक्षा के मोर्चे पर भी नजर आई। यह सच है कि मौजूदा सरकार ने पिछली सरकार की हिचक तोड़ी है और उसने जापान को मालाबार अभ्यास में शामिल किया। इसके लिए चीन की नाराजगी भी मोल ली गई। जापान ने भी आसामान्य रुचि दिखाते हुए हमें नए यूएस-2 सी प्लेन की पेशकश की। यह एक बड़ा सौदा है। जापान आमतौर पर उन्नत रक्षा उपकरण बेचता नहीं है। यह पेशकश हमारी जरूरत के मुताबिक है। इसके दो इस्तेमाल हैं। इसे बचाव और खोज अभियान में इस्तेमाल किया जा सकता है लेकिन इसकी मदद से एक लंबे इलाके की निगरानी भी की जा सकती है। यह पेशकश हमें आठ साल पहले की गई थी। चार साल पहले इसे दोहराया गया लेकिन इस पर अभी भी विचार ही चल रहा है। आखिर हम इतने अहम साझेदार की अनदेखी क्यों कर रहे हैं? समय बीतने के साथ हमें जापान के सहयोग की और अधिक आवश्यकता पडऩे वाली है। 
 
इस दिशा में अभी काफी कुछ किया जाना है। भारत को अधिक से अधिक छात्रों और प्रशिक्षुओं को जापान भेजने की आवश्यकता है। भारत को जापान में चलने वाले प्रशिक्षण कार्यक्रमों का भी पूरा लाभ उठाना चाहिए। अबे सरकार को जापान में काम कर रही भारतीय चिकित्सा परिचारिकाओं के साथ सहज बनाने के लिए जो किया जा सके करना चाहिए। उम्रदराज होते जापान में ऐसे देखरेख करने वालों की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है। अगर इसके लिए नए नर्सिंग कॉलेज खोलने की आवश्यकता पड़े तो वह भी करना चाहिए। यह काम पूर्वोत्तर में किया जा सकता है जहां जापानी भाषा पढ़ाई जाती है। लेकिन सबसे बढ़कर हमें अपने रवैये में बदलाव लाना होगा। ठीक वैसे ही जैसे चीन ने दशकों तक किया। हमें जापान को अहसास कराना होगा कि उसका हमारे यहां स्वागत है। जापान के साथ रिश्ते ने चीन की तस्वीर बदल दी थी। यह बदलाव हमारे यहां भी घटित हो सकता है।
Keyword: india, japan,,
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