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दालों की खेती के लिए प्रोत्साहन खोलेगा आत्मनिर्भरता का रास्ता

खेती-बाड़ी
सुरिंदर सूद /  May 12, 2017

भारत में व्यापक स्तर पर फैले कुपोषण, खास तौर पर प्रोटीन की कमी की समस्या से निपटने में दालें सबसे अहम स्रोत हो सकती हैं। प्रोटीन और अच्छी गुणवत्ता वाले रेशेदार खाद्य पदार्थों की मौजूदगी से आपका भोजन स्वास्थ्यवद्र्धक और संतुलित बनता है। इसके अलावा इनमें अधिकांश विटामिन और खनिज भी पाए जाते हैं जो स्वस्थ जीवन के लिए आवश्यक माने जाते हैं। वैश्विक दाल परिसंघ के दावों पर यकीन करें तो दालों के इस्तेमाल से रक्त में कोलेस्ट्रॉल कम करने और रक्त में शर्करा की मात्रा भी नियंत्रित करने में मदद मिलती है। मधुमेह और दिल के रोगों के इलाज के लिए आम तौर पर ये दोनों अहम माने जाते हैं। जानवरों से मिलने वाली प्रोटीन की जगह दालों को स्थान देने से संतृप्त वसा की मात्रा को कम करने के साथ ही स्वास्थ्यवद्र्धक रेशेदार पदार्थों की मात्रा को बढ़ाया जा सकता है। 

 
इसके अलावा दालों में पाए जाने वाले रेशेदार पदार्थों, खनिजों और अमीनो एसिड तत्त्वों की वजह से इसे कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों की रोकथाम में भी मददगार माना जाता है। अमेरिका की प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका 'एनल्स ऑफ द न्यूयॉर्क एकेडमी ऑफ साइंसेज' के मार्च 2017 अंक में प्रकाशित एक शोधपत्र के मुताबिक दालों और अनाजों से मिलने वाले प्रोटीन एक दूसरे के पूरक हैं और एक साथ लेने पर ये शरीर के लिए जरूरी सभी अमीनो एसिड की आपूर्ति कर देते हैं।
 
इस तरह के गुणकारी लक्षणों वाली दालों को भोजन एवं पोषण से संबंधित रणनीतियों एवं कार्यक्रमों में जरूर जगह दी जानी चाहिए जबकि अभी तो इन कार्यक्रमों में अनाजों पर ही ध्यान केंद्रित रहता है। इससे कुपोषण की समस्या दूर करने, लोगों का स्वास्थ्य सुधारने और वैश्विक भूख सूचकांक में भारत की रैंकिंग ऊंची करने में मदद मिलेगी। लेकिन यह मकसद तभी हासिल किया जा सकता है जब दालों की देश के भीतर उपलब्धता को बढ़ाया जाए क्योंकि आयात पर निर्भरता इसकी राह में अड़चनें पैदा कर सकती है।
 
हालांकि भारत ने दालों के उत्पादन के मामले में वर्ष 2016-17 में ही अपना सर्वोच्च स्तर हासिल किया है। पिछले साल भारत में दालों का उत्पादन 2.2 करोड़ टन रहा था जो एक साल पहले के 1.63 करोड़ टन की तुलना में 35 फीसदी अधिक है। इस उल्लेखनीय बढ़ोतरी के बावजूद भारत दाल उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर बनने से अभी दूर है। कृषि मंत्रालय का अनुमान है कि भारत को दाल के मामले में आत्मनिर्भर बनने के लिए उत्पादन स्तर को 2.35 करोड़ टन से आगे ले जाना होगा। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद का सुझाव है कि स्वस्थ जीवन के लिए हरेक व्यक्ति को रोजाना 52 ग्राम दाल का सेवन करना चाहिए। इस गणना के हिसाब से भारत को 2.8 करोड़ टन दाल की जरूरत होगी जो कृषि मंत्रालय के आकलन से काफी अधिक है। किसी भी स्थिति में दालों की जरूरत तो बढऩे ही वाली है। दरअसल जनसंख्या की वृद्धि दर से भी अधिक तेजी से दालों की मांग बढ़ रही है। 
 
दालों के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल करने से संबंधित एक अहम तथ्य यह है कि पिछले साल भारत ने 2.2 करोड़ टन का जो उत्पादन स्तर हासिल किया था उसे मौजूदा नीतिगत ढांचे में बरकरार रख पाना मुश्किल होगा। दरअसल 2016-17 में दालों की रिकॉर्ड पैदावार के पीछे एक वजह तो यह रही कि दालों की ऊंची कीमतों को देखते हुए किसान अधिक रकबे में इसकी खेती के लिए प्रोत्साहित हुए थे। इसके अलावा खरीफ और रबी दोनों सत्रों में अच्छे मौसम का साथ मिलने से भी पैदावार बढ़ी। लेकिन अब दालों की कीमतों में अच्छी-खासी गिरावट होने से बदले हुए हालात में किसान शायद ही पिछले साल की तरह दालों की खेती के लिए प्रेरित हों। इस साल तो अधिकतर दालों के भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी नीचे आ गए हैं। इसके अलावा दालों का बफर स्टॉक जमा करने के लिए सरकार ने जिस तरह से गलत समय पर बाजार में दखल दिया था, उसने भी दाल उत्पादकों के अलावा उपभोक्ताओं के लिए हालात खराब कर दिए हैं। सरकारी एजेंसियों ने दालों के ऊंचे भावों के बीच ही दालों की खरीद शुरू कर दी थी जिससे आम उपभोक्ताओं की थाली में दाल का पहुंच पाना मुश्किल हो गया। इसी तरह मौजूदा समय में दालों की गिरती कीमतों के बीच ही इन एजेंसियों ने खरीदी दाल को बाजार में पहुंचाना शुरू कर दिया है जिससे उत्पादकों के हित प्रभावित हो रहे हैं। 
 
संयोग से दालों का उत्पादन बढ़ाना केवल मुश्किल है, असंभव नहीं। अगर अनुकूल रणनीतियां बनाई जाएं तो तकनीक के इस्तेमाल से दालों का उत्पादन अपेक्षित स्तर तक बढ़ाया जा सकता है। इसका सबसे अच्छा और सरल तरीका यह है कि सर्वाधिक और न्यूनतम उपज वाले इलाकों के अंतर को पाट दिया जाए। अभी तो दालों के उच्च और निम्न उत्पादन स्तर में करीब 34 फीसदी उपज का फर्क है। अगर दालों के प्रति हेक्टेयर उत्पादन स्तर को बढ़ाकर म्यांमार में 700 किलोग्राम से 1,300 किलोग्राम और कनाडा में 2,200 किलोग्राम तक किया जा सकता है तो भारत भी उच्च स्तर को हासिल कर सकता है। इससे भारत न केवल इस बुनियादी खाद्य पदार्थ के उत्पादन में आत्मनिर्भर हो जाएगा बल्कि निर्यातक भी बन जाएगा। इसके लिए सिंचित भूमि में खेती करने वाले किसानों को जल्दी तैयार होने वाली फसलें लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। दालों की पैदावार बढ़ाने की कोई भी रणनीति कामयाब बनाने के लिए उत्पादकों को लाभकारी प्रतिफल का भरोसा दिया जाना एक तरह से पूर्व-शर्त होगी।
Keyword: agri, आधुनिक मशीन, किसान, कृषि उपकरण,,
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