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साझा कृषि बाजार में अड़चनें हजार

संजीव मुखर्जी /  05 11, 2017

बाजार पर नजर

 देश में किसानों के लिए उपज बेचने की खातिर नियमित मंडियों की संख्या काफी कम

7,320 कुल नियमित मंडियों की संख्या
2,477 मुख्य नियमित मंडियों की संख्या
4,843 सब यार्ड मंडियां
585 अगले 2 से 3 साल में साझा इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म से जोड़े जाने वाली मंडियां
400 मंडियों (14 राज्यों में) को ई-नाम स्थापित करने की सैद्धांतिक मंजूरी मिली
31 लाख टन कृषि उपज दिसंबर 2016 तक ई-नाम के जरिये बेची गईं

पिछली सरकारों के कई विफल प्रयासों के बाद नरेंद्र मोदी सरकार एक बार फिर कृषि जिंसों के लिए एक साझा राष्ट्रीय बाजार बनाने के लिए कई कदम उठा रही है। इलेक्ट्रॉनिक-राष्ट्रीय कृषि बाजार प्लेटफॉर्म (ई-नाम) और नया मॉडल एपीएमसी अधिनियम राष्ट्रीय बाजार के उस मुख्य मकसद को हासिल करने के लिए बनाए गए हैं, जिसमें कृषि जिंसों की खरीद और बिक्री बिना किसी प्रतिबंध और अड़चन के हो सके। 

एक साझा अखिल भारतीय कृषि बाजार में कीमतों का निर्धारण केवल मांग और आपूर्ति के आधार पर होगा। इसमें कीमतों को बहुत से कार्टेल और समूह प्रभावित नहीं कर सकेंगे, जिनकी वजह से इस समय उपभोक्ताओं और किसानों दोनों को नुकसान होता है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलूरु और कोलकाता में फल एवं सब्जी आपूर्ति शृंखला पर किए गए अनुसंधान के आधार पर 2011 में मुंबई के इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट रिसर्च द्वारा तैयार किए गए पत्र में पाया गया था कि प्राथमिक उत्पादक और उपभोक्ता के बीच औसतन पांच से छह बिचौलिये होते हैं। इस शृंखला में जिंसों की कीमतें 60 से 75 फीसदी तक बढ़ जाती हैं। इसके नतीजतन प्राथमिक उत्पादकों को उपभोक्ताओं द्वारा चुकाई जाने वाली कीमत का महज 20 से 25 फीसदी हिस्सा ही मिलता है। जिंसों में स्पॉट और डेरिवेटिव बाजारों को जोडऩे के लिए वित्त मंत्रालय की एक समिति भी काम कर रही है और ई-नाम इसका एक अहम हिस्सा होने का अनुमान है। यह घोषणा वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2017-18 के बजट में भी की थी। 

बाजारों को जोड़ने में चुनौतियां

विशेषज्ञों का कहना है कि अवधारणा के स्तर पर एक साझा बाजार से उपभोक्ताओं और किसानों को वास्तविक फायदे मिल सकते हैं। लेकिन इस पूरी अवधारणा में कई चुनौतियां और जटिलताएं हैं। अगर इस पर ठीक से नियंत्रण नहीं रखा गया तो इससे कीमतों को प्रभावित करने के रास्ते खुल जाएंगे। इसलिए केंद्र को इस विचार को कैसे मूर्त रूप देने की उम्मीद की है? ई-नाम का मकसद अगले कुछ वर्षों के दौरान देशभर की 585 मंडियों में कारोबार को डिजिटल करना है। 

ई-नाम के तहत प्रत्येक मंडी के लिए केंद्र से 75 लाख रुपये का केंद्रीय अनुदान हासिल करने की बुनियादी पूर्व शर्त यह है कि राज्यों को सबसे पहले मंडियों को नियंत्रित करने वाले तीन बुनियादी नियमों में संशोधन करना होगा। इनमें सभी कारोबारियों के लिए एक साझा कारोबारी लाइसेंस, कृषि उपजों की कीमतों के निर्धारण के लिए ई-नीलामी प्लेटफॉर्म और एक जगह पर बाजार फीस शामिल है। गौरतलब है कि प्रत्येक मंडी के लिए केंद्र द्वारा दिए जाने वाले अनुदान में 30 लाख रुपये प्लेटफॉर्म स्थापित करने के लिए और शेष राशि सुविधाओं और कचरा प्रबंधन संयंत्र में सुधार के लिए होगी। 

इन शर्तों का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि ई-नाम कारोबार के लिए इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म से कुछ बढ़कर हो और यह सच्चे मायनों में राष्ट्रीय हाजिर बाजार की नींव रखे। ई-नाम की शुरुआत एक साल से कुछ समय पहले हुई थी और उसके बाद अब तक 18 राज्य इलेक्ट्रॉनिक बाजार प्लेटफॉर्म को अपना चुके हैं। वहीं 13 ने केंद्रीय अनुदान हासिल करने के लिए ïआवश्यक तीन अहम नियमों में बदलाव किए हैं। देेशभर में कुल 7,320 मंडियां हैं, जिनमें से 585 को अगले कुछ वर्षों के दौरान ई-नाम के तहत लाया जाएगा। 

हालांकि इसका मकसद धीरे-धीरे सभी मंडियों को इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म पर लाना और यह सुनिश्चित करना है कि पूरा कारोबार इस सिस्टम के जरिये हो, लेकिन असल में यह अपने लक्ष्य से कोसों दूर है। ई-नाम कई जगहों पर चालू हो गया है, लेकिन बहु-स्थान कारोबारी लाइसेंस के अभाव या आंशिक रूप से नियमों को पूरा करने के कारण बहुत सी जगहों पर मंडियां राष्ट्रीय स्तर पर छोडिय़े, राज्य या जिले के भीतर ही आपस में नहीं जुड़ी हैं। ई-नाम के तहत बहुत सी जगहों पर अब तक कारोबार आवाज देकर बोलियों से हो रहा था, लेकिन अब डिजिटल रूप में होने लगा है। 

हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में अंतर-मंडी कारोबार को मंजूरी दी गई है और कारोबारियों को तीन तरह के लाइसेंस जारी किए गए हैं। लेकिन ऐसा अभी कुछ जगह ही हुआ है। कुछ विश्लेषकों के मुताबिक हकीकत यह है कि जिन मंडियों में ई-नाम प्लेटफॉर्म स्थापित किए जा चुके हैं, उनमें किसान और कारोबारी अपने लक्ष्य पूरे करने पर ध्यान दे रहे हैं। इसके बावजूद केंद्र सरकार को उम्मीद है कि धीरे-धीरे ई-नाम से जुडऩे वाली सभी मंडियां और एपीएमसी भौतिक कारोबार बंद कर देंगी और यह सिस्टम स्थिर हो जाएगा। 

मॉडल मंडी

केंद्र सरकार ने राज्यों द्वारा अपनाए जाने के लिए ई-नाम के अलावा नया मॉडल एपीएमसी अधिनियम भी बनाया है। यह वर्ष 2003 के बाद का ऐसा पहला प्रयास है। उस समय पिछला एपीएमसी मॉडल अधिनियम बनाया गया था। कृषि विपणन राज्यों का विषय है , इसलिए केंद्र सरकार अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर के विषयों पर कानून नहीं बना सकती। एपीएमसी मॉडल अधिनियम महज एक सुझाव है। 

इस मॉडल अधिनियम में कई प्रावधान हैं। इसमें पहली बार पूरे राज्य को एक महज एक मंडी नहीं बल्कि पूरे मार्केट यार्ड के रूप में देखने की कोशिश की गई है। इसके अलावा निजी मंडियों, किसान संचालित बाजारों, किसानों से सीधे खरीद और बिक्री के लिए कई तरह के लाइसेंस और बड़ी मात्रा में खरीद के लिए अस्थायी लाइसेंस के दरवाजे खोले गए हैं।  केंद्र सरकार के मुताबिक इन संशोधनों से लाइसेंस और कारोबार के नियमन में एपीएमसी की व्यापक शक्तियां समाप्त हो जाएंगी, जिसे वह स्पष्ट रूप से हितों का टकराव पाती है। हालांकि आलोचकों का मानना है कि साझा कृषि बाजार और एपीएमसी अधिनियम का पूरा विचार बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए जिंसों की खरीद के लिए बहुत से विकल्पों के द्वार खोलना है और उत्पादक किसानों के हितों पर कुठाराघात करना है।  

खाद्य नीति विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा का कहना है, 'भारत को एक साझा राष्ट्रीय कृषि बाजार की जरूरत क्यों है। इससे जिंसों की कीमतें देशभर में एकसमान हो जाएंगी, जबकि एक ही किस्म की उत्पादन लागत अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग है।' उनके मुताबिक किसी कृषि जिंस की देशभर में एकसमान कीमत कंपनियों के लिए फायदेमंद हो सकती है, लेकिन इससे किसानों की जीविका पर असर पड़ेगा। 

शर्मा कहते हैं कि निजी मंंडियों की अवधारणा में कमियां हैं। कुछ राज्यों में महज 6 फीसदी किसान अपनी उपज नियमित एपीएमसी के जरिये बेचते हैं। शेष निजी मंंडियों का इस्तेमाल करते हैं और अब भी उनकी आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है। वह कहते हैं, 'अगर निजी मंडियां इतनी उपयोगी हैं तो किसान बदहाल क्यों हैं? इसके बजाय केंद्र को एपीएमसी के नेटवर्क को विस्तारित करने की कोशिश करनी चाहिए।'

शर्मा ई-नाम के बारे में कहते हैं कि ई-नाम के बावजूद आंध्र प्रदेश के निजामाबाद में एक किसान ने दो दिन पहले आत्महत्या कर ली क्योंकि वह अपनी उपज की कीमतों में गिरावट के झटके को बर्दाश्त नहीं कर पाया। शर्मा कहते हैं, 'इससे यह साफ पता चलता है कि ई-नाम किसानों को उपज की अच्छी कीमत की गारंटी नहीं है।' आईआईएम अहमदाबाद में सेंटर फॉर मैनेजमेंट के चेयरपर्सन सुखपाल सिंह भी राष्ट्रीय साझा कृषि बाजार के विचार को ठीक नहीं मानते हैं। हालांकि वे इसकी वजह अलग बताते हैं। 

वह कहते हैं कि विभिन्न कृषि जिंस मंडियों का एक स्तर से ज्यादा समन्वय किया जाना संभव नहीं है क्योंकि इनमें कई कानूनी और संवैधानिक मसले शामिल होता है और उनसे निपटना मुश्किल होता है। सिंह कहते हैं, 'पूरे देश को एक बाजार बनाने का विचार मूर्त रूप लेने से कोसों दूर है क्योंकि विभिन्न राज्यों की अलग-अलग प्राथमिकताएं होती हैं। वहीं मंडियों में भी एकाधिकार को तोड़ना होगा।'

ई-नाम पर सिंह ने कहा कि 7,000 नियमित मंडियों में से महज 585 को जोडऩा इस पूरे तंत्र का 10 फीसदी भी नहीं है। देश में अलग-अलग इलाकों में विभिन्न किस्म के फलों और सब्जियों का उत्पादन होता है। यह उत्पादन करीब 55 करोड़ टन होता है, जिसके लिए पूरे देश में महज 7,000 नियमित मंडियां होना अपर्याप्त है।  मोटे अनुमान यह बताते हैं कि देश में कम से कम 45,000 नियमित मंडियां होनी चाहिए ताकि देश में उत्पादित फलों एवं सब्जियों को बिक्री के लिए उचित बाजार मिल सके।
Keyword: agri, आधुनिक मशीन, किसान, कृषि उपकरण,,
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