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अस्थायी राहत

संपादकीय /  May 11, 2017

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के उपग्रहों ने बीते कुछ सप्ताह के दौरान जो तस्वीरें कैद की हैं उनमें पंजाब और हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भीषण लपटें देखी जा सकती हैं। हर वर्ष ऐसी आग आसपास के माहौल और निवासियों को भयंकर नुकसान पहुंचाती है। दिल्ली के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को इसका सबसे अधिक खमियाजा उठाना पड़ता है क्योंकि खेतों में लगने वाली यह आग भयंकर प्रदूषण फैलाती है। दिल्ली न केवल ऐसी आग वाले कृषि क्षेत्र के बीचोबीच आती है बल्कि यहां पहले से ही वाहनों से होने वाले उत्सर्जन और विनिर्माण की धूल के रूप में व्यापक प्रदूषक तत्त्व मौजूद हैं। खेतों में लगने वाली आग से जो धुआं पैदा होता है वह वातावरण में नीचे ही रहता है और अन्य प्रदूषक तत्त्वों के साथ मिलकर घातक धुएं वाला कोहरा पैदा करता है। खेतों में आग का सिलसिला साल में दो बार चलता है। गर्मियों में गेहूं की कटाई के बाद और जाड़ों में धान की फसल के बाद। 

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हालांकि गर्मियों में इसका असर जाड़ों की तुलना में कम रहता है। इन गर्मियों में खेतों में आग लगाने का प्रदूषण पर उस कदर असर नहीं हुआ। इस बार दक्षिणपूर्वी हवाओं के रुख ने हमें बचा लिया। इस बार हवा का बहाव दिल्ली से हरियाणा और पंजाब की ओर था। जबकि आमतौर पर इसका उलटा होता है। लेकिन हवा का रुख तो समस्या का निदान नहीं हो सकता। हवा के रुख में कभी भी बदलाव आ सकता है और अगर ऐसा हुआ तो एक बार फिर भारी प्रदूषण संकट हमारे सामने होगा। 
 
इस समस्या की मूल बात यह है कि खेतों में बचे कृषि अपशिष्टï को जलाना पर्यावरण के लिए गंभीर चिंता का विषय है। इसके बावजूद किसानों को यह आर्थिक रूप से बेहतर विकल्प लगता है। उनके लिए खेत में फसल कटने के बाद बचे अपशिष्टï को जलाना सबसे सस्ता और तेज तरीका है जिसकी मदद से वे अपनी जमीन को अगले दौर की बुआई के लिए तैयार कर सकते हैं। सरकार ने किसानों को इससे दूर करने की कोशिश की। कहा गया कि ऐसी आग लगाना अवैध है और इसके लिए सजा व जुर्माने का प्रावधान किया गया। यह नीति सही नहीं थी क्योंकि ऐसा करके वह इसे कानून व्यवस्था की समस्या के रूप में देख रही थी। जरूरत थी इसके पीछे की आर्थिक वजह को समझा जाता। किसानों को लगता है कि ऐसा करने से उनको जो आर्थिक बचत होगी वह जुर्माने की तुलना में बेहतर साबित होगी। यही वजह है कि सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद वे मान नहीं रहे। ऐसा भी नहीं है कि किसान खेतों में आग लगाने के पर्यावरण संबंधी असर से नावाकिफ हैं। तापमान के चलते जमीन पर असर पड़ता है और कई महत्त्वपूर्ण पोषक तत्त्व नष्टï हो जाते हैं। 
 
लेकिन फसल के अवशेष जलाने के विकल्प भी अव्यावहारिक और काफी समय लेने वाले हैं। मसलन इस अवशिष्टï को छोड़ दिया जाए कि वह जमीन में सड़कर खाद बन जाए लेकिन इसमें बहुत समय लगेगा। वहीं इसे मशीन से निकालना बहुत महंगा पड़ेगा। इसमें करीब 2,000 रुपये प्रति एकड़ की लागत आएगी जो अधिकांश किसानों के बूते के बाहर की बात है। आखिर उपाय है शोध एवं विकास के क्रम में ऐसे व्यावहारिक विकल्प तलाश करना जो लागत और समय दोनों मोर्चों पर बचत कर सकें। कोशिश यह होनी चाहिए कि इन अपशिष्टïों को खेतों में ही आसानी से सड़ाया जा सके या इन्हें हटाने की लागत कम की जा सके। जब तक ऐसे विकल्प सामने नहीं आते हैं तब तक राज्य सरकार को किसानों को ऐसा प्रोत्साहन देना चाहिए कि वे मशीनों का इस्तेमाल करके खेतों से इसे हटाएं और उनको नई फसल बोने में देरी भी नहीं हो।
 
Keyword: india, settelite, दक्षिण एशियाई संचार उपग्रह (जीसैट-9),
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