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केवल रुपये की मजबूती ही नहीं निर्यात में सुस्ती का कारण

शुभायन चक्रवर्ती और इंदिवजल धस्माना /  05 10, 2017

बीएस बातचीत

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार अपने तीन साल पूरे करने जा रही है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) निर्मला सीतारामन का कहना है कि अब समय आ गया है कि सरकार के कुछ अहम कार्यक्रमों को तेज किया जाए और कुछ नए कदम उठाए जाएं। उन्होंने शुभायन चक्रवर्ती और इंदिवजल धस्माना से एक साक्षात्कार में कहा कि विश्व व्यापार संगठन ने भारत को 2018 के अंत तक निर्यात सब्सिडी समाप्त करने को कहा है लेकिन सरकार विभिन्न क्षेत्रों को प्रोत्साहन देने का तरीका खोज निकालेगी। पेश है उनसे बातचीत के संपादित अंश:

जल्दी ही इस सरकार को सत्ता में तीन साल पूरे हो जाएंगे। क्या आपको लगता है कि अब समय आ गया है कि पिछले कार्यक्रमों को मजबूत किया जाए या फिर नए कदम उठाए जाएं?

यह दोनों का मिश्रण होना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किए गए कार्यक्रमों को मजबूत करने की जरूरत है क्योंकि निरंतर उनके परिणाम सामने आ रहे हैं। कम से कम वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय में तो ऐसा दिख रहा है और इन कदमों को मजबूत करने की जरूरत है। इसलिए यह पुराने कार्यक्रमों को मजबूत करने और नए कदम उठाने के लिए सर्वश्रेष्ठï समय है। उदाहरण के लिए मेक इन इंडिया को इसलिए शुरू किया गया क्योंकि कृषि में रोजगार घट रहा है। कुछ राज्य कृषि रोजगार के क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं, वहां भी स्थिति फायदेमंद नहीं है। इसलिए भारत को निवेश और विनिर्माण के लिए बेहतर स्थान बनाने पर जोर दिया गया। मेरा मानना है कि मेक इन इंडिया को मजबूती के साथ आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

सरकार इंडस्ट्री 4.0 के मुद्दों को कैसे इससे जोड़कर देखती है?

मैंने क्षेत्रवार इसे समझने की प्रक्रिया शुरू की है और मैं राज्यों से बात कर रही हूं कि वे इंडस्ट्री 4.0 के लिए कितने तैयार हैं। मैं उन सभी उद्योगों की मदद के लिए तैयार हूं जो पूरी तरह तैयार हैं, आंशिक रूप से तैयार हैं या फिर बिल्कुल तैयार नहीं हैं। मैं सभी नीतियों में इसे शामिल कर रही हूं ताकि यह पता लगाया जा सके कि भारत को विनिर्माण का केंद्र बनाने और रोजगार पैदा करने में यह किस तरह मददगार हो सकता है। सरकार डिजिटल इंडिया को बढ़ावा दे रही है जो इंडस्ट्री 4.0 के अनुरूप है। यानी रोबोटिक्स, इंटरनेट, ज्ञान आधारित व्यवस्थाएं, स्मार्ट शहर और विनिर्माण में स्मार्टनेस। मैं स्किल इंडिया को भी इसमें  शामिल करूंगी। यह शुरू हो चुका है और हम नई औद्योगिक नीति लेकर आ रहे हैं जिसमें 2011 की राष्ट्रीय विनिर्माण नीति और इंडस्ट्री 4.0 के मुद्दों को शामिल किया जाएगा और यह डिजिटल इंडिया को बढ़ावा देगी। हमने हाल में राज्यों को इसके साथ जोडऩा शुरू किया है। मैं उम्मीद करती हूं कि सितंबर में जब मेक इन इंडिया के तीन साल पूरे होंगे तो औद्योगिक नीति सामने आ जाएगी।

क्या नोटबंदी के कारण औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने की योजना प्रभावित हुई है क्योंकि औद्योगिक उत्पादन सूचकांक फरवरी में सिकुड़ा है?

ये मासिक उतार-चढ़ाव हैं। मैं इन पर टिप्पणी नहीं करूंगी। जहां तक नोटबंदी का सवाल है तो मैंने कहा है कि नवंबर में इसकी घोषणा के बाद उस तिमाही के दो-तीन हफ्तों में इसका असर हुआ था। यह असर उन क्षेत्रों में दिखाई दिया जहां प्रवासी और अकुशल मजदूर काम पर लगे होते हैं। अलबत्ता अधिकांश निर्यातोन्मुखी श्रम साध्य क्षेत्रों ने मजदूरों का जन धन खाता खोलने में  पहल की। इसलिए मुझे नहीं लगता है कि औद्योगिक नीति पर नोटबंदी का असर पड़ेगा। यह दौर बहुत पहले खत्म हो चुका है। 

औद्योगिक नीति को रोजगान सृजन को बढ़ावा देने में कितना समय लगेगा?

रक्षा और रेलवे जैसे क्षेत्रों में भारी निवेश हो रहा है। इन क्षेत्रों में निर्माणपूर्व अवधि के बाद ही आंकड़े उपलब्ध होंगे। इसलिए मैं जल्दबाजी में यह निष्कर्ष नहीं निकालूंगी कि रोजगार पैदा नहीं हो रहे हैं। इसी तरह मेरा मानना है कि केवल सरकार ही सारे रोजगार पैदा नहीं कर सकती। हम लोगों में उद्यमिता की भावना सुनिश्चित करने के लिए भी काम कर रहे हैं। स्टैंड अप ऐंड स्टार्ट अप इंडिया की नीतियां और मुद्रा इसी दिशा में प्रयास है।

प्रधानमंत्री ने भी रोजगार बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। क्या यह एक नया कदम है?

कुछ महीने पहले प्रधानमंत्री ने स्पष्टï कहा था कि मंत्रिमंडल में आने वाले निवेश के हर प्रस्ताव मे कम से कम एक पैरा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के बारे में होना चाहिए। इसलिए हम सभी इस दिशा में काफी मेहनत कर रहे हैं।

नई औद्योगिक नीति के तहत ऐपल जैसी कंपनियों के लिए चीजें कैसे बेहतर हो सकती हैं। इन कंपनियां का कहना है कि भारत में विनिर्माण में कई दिक्कतें हैं।

सभी के लिए चीजें बेहतर होंगी। कोई भी नीति किसी एक कंपनी के लिए नहीं बनती। मैं इतना ही कह सकती हूं कि हमारा जोर विनिर्माण पर है। हम घरेलू और विदेशी कंपनियों और निवेशकों के लिए लगातार माहौल में सुधार करते रहेंगे ताकि उनके लिए यहां कामकाज करना आसान हो।

सरकार के मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक्स की चरणबद्घ विनिर्माण नीति बनाने के बाद क्या ऐपल ने फिर से पेशकश की है?

मेरे पास उनकी तरफ से कोई नया अनुरोध नहीं आया है।

लगता है कि आपने रुपये के अवमूल्यन पर अपना रुख बदल दिया है। अब आप मजबूत मुद्रा की बात कर रही हैं क्योंकि यह अर्थव्यवस्था की मजबूती दर्शाता है। क्या आपने रुपये को अपना वास्तविक मूल्य हासिल करने के लिए छोड़ दिया है?

सरकार का हमेशा से यही रुख रहा है कि रुपया अपनी सही स्थिति हासिल करे और सरकार की मंशा कभी भी इसे कृत्रिम रूप से कमजोर या मजबूत करने की नहीं रही है। मुझे पता नहीं कि इस पर चर्चा कहां से शुरू हुई। लेकिन संभवत: यह एक कैबिनेट नोट का हिस्सा था जिसमें मैंने कहा था कि निर्यात को बढ़ावा देने के लिए आंतरिक सुधारों की जरूरत है। इसमें हमने यह सुझाव भी दिया था कि इसमें रुपये की क्या भूमिका हो सकती है। मुझे पता नहीं कि यह बात कहां से आई कि वाणिज्य मंत्रालय रुपये के अवमूल्यन के पक्ष में है। लेकिन फिर हाल में जब मुझसे रुपये के अवमूल्यन के बारे में पूछा गया तो मैंने कहा कि निर्यातक पिछले कई सालों से रुपये में उतार-चढ़ाव का सामना कर रहे हैं। मुझे उम्मीद है कि निर्यातकों के लिए अब यह सामान्य बात है। केवल मजबूत रुपये को ही निर्यात की राह में बाधा नहीं माना जाना चाहिए। अर्थव्यवस्था केवल निर्यात पर ही निर्भर नहीं है बल्कि यह घरेलू बाजार पर भी निर्भर है। इसी पृष्ठïभूमि में ही यह चर्चा हुई है।

क्या रुपये में मजबूती के कारण भारत दूसरे देशों के साथ रुपये में लेनदेन की व्यवस्था पर जोर दे रहा है?

कई साल पहले हमारा सोवियत संघ के साथ रुपये में लेनदेन होता था लेकिन सोवियत संघ के टूटने के बाद यह व्यवस्था बिखर गई। उदारीकरण के बाद भी इसे बहाल नहीं किया गया। विदेश व्यापार नीति की समीक्षा के दौरान मुझे बताया गया कि रुपये में लेनदेन से भी निर्यात को बढ़ावा मिलेगा।

मौजूदा विदेश व्यापार नीति में भी सरकार 2019-20 तक 900 अरब डॉलर के निर्यात लक्ष्य को बरकरार रख रही है?

उद्योग जगत या किसी और ने इस लक्ष्य पर कोई सवाल नहीं उठाए हैं।

क्या नोटबंदी, प्रस्तावित जीएसटी और अब वित्त वर्ष के समय में संभावित बदलाव से उद्योग जगत के लिए दिक्कत नहीं हो रही है?

मुझे लगता है कि अर्थव्यवस्था के साथ-साथ कंपनियों और निर्यातकों के लिए यह फायदे की बात है कि समय पर उन्हें सूचना दी जा रही है। नोटबंदी की घोषणा अचानक की गई जिसके पीछे कई तथ्य हैं। लेकिन हर मुद्दे पर ऐसा नहीं है। जाहिर सी बात है कि हर किसी को नियमों का पालन करने और रिकॉर्ड रखने के लिए कुछ बदलाव करने पड़ेंगे। मैं इन्हें दिक्कत नहीं मानती हूं। बल्कि इन कदमों से तो अर्थव्यवस्था को दुरुस्त किया जा रहा है।

विश्व व्यापार संगठन के नियमों के मुताबिक 2018 तक भारत को निर्यातकों को सब्सिडी देना बंद करना होगा। सरकार इससे कैसे निपटेगी?

हम उन क्षेत्रों को छोड़ नहीं सकते जिन्हें मदद की जरूरत है। इससे कोई मुझे उन्हें एक स्वीकार्य रास्ते से मदद पहुंचाने के अधिकार से वंचित नहीं कर सकता। 

विश्व व्यापार संगठन में सेवाओं पर भारत के प्रस्ताव को लेकर दूसरे देशों की क्या प्रतिक्रिया है? क्या आपको लगता है कि यह अमेरिका को वीजा पर पाबंदी लगाने से हतोत्साहित करेगा?

हालांकि दोनों मुद्दे आपस में जुड़े हुए हैं लेकिन वे उस संदर्भ में नहीं जुड़े हैं जिसमें आप पूछ रहे हैं। सेवाओं पर व्यापार समझौता एक बेहद जरूरी ढांचे और वैश्विक सेवाओं के व्यापार की समझ का व्यापक मुद्दा है। इसे अभी लंबा रास्ता तय करना है। इस पर चर्चा होनी है, सवालों का जवाब दिया जाना है और हमें सभी सदस्यों के सहयोग की जरूरत है।

Keyword: import, export, निर्मला सीतारामन,
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