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सरकार चार क्षेत्रों पर दे ध्यान तभी होगा कारोबार आसान

कारोबारी मंत्र
भूपेश भन्डारी /  May 10, 2017

 

 
 
 
सरकार लोकप्रियता की लहर पर सवार है और लगातार चुनावों में जीत हासिल करती जा रही है। लेकिन इस खुशनुमा माहौल में सरकार शायद भारत को कारोबार के लिए बेहतर जगह बनाने का अपना वादा भूल गई है। सरकार को अर्थव्यवस्था के चार क्षेत्रों- औषधि, शराब, विमानन और दूरसंचार पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। अगर हालात ऐसे ही बिगडऩे दिए गए तो निवेश स्थल के तौर पर भारत की प्रतिष्ठा को गहरा आघात लगेगा।
 
सबसे पहले औषधि क्षेत्र पर नजर डालते हैं। सरकार ने दिल के रोगियों को लगाए जाने वाले स्टेंट की कीमतों में भारी कटौती कर दी ताकि अस्पताल और डॉक्टर मनमानी न कर सकें। लेकिन स्टेंट निर्माताओं ने जब ऊंची लागत का हवाला देते हुए आपूर्ति रोक दी तो सरकार ने उनसे स्टेंट का उत्पादन स्तर बरकरार रखने को कहा। इस कदम से स्टेंट निर्माताओं को एक बार फिर लाइसेंसराज के खौफनाक दिनों की तरफ धकेल दिया गया है।  
 
दवाओं के मूल्य नियंत्रण का दायरा लगातार बढ़ते रहने से औषधि क्षेत्र में भारत की गिनती दुनिया के सर्वाधिक मुश्किल बाजार के रूप में होती है। नीतियों में ऐसे बदलावों से भारत की प्रतिष्ठा को और ठेस पहुंचेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह बयान देकर औषधि क्षेत्र की घबराहट बढ़ा दी है कि डॉक्टरों को पर्ची पर ब्रांडेड दवाएं नहीं, केवल जेनेरिक दवाएं ही लिखनी होंगी। इससे पूरे औषधि कारोबार का परिदृश्य ही बदल जाएगा। जेनेरिक नाम लिखने से ब्रांड चुनने का अधिकार डॉक्टर के हाथ से निकलकर फार्मासिस्ट के पास चला जाएगा। क्या यह सुधार है? वैसी स्थिति में दवा कंपनियों के प्रतिनिधियों की फौज का क्या होगा? इन मुद्दों पर चर्चा की जरूरत है। दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की कीमत को कम करना एक अच्छी सोच है लेकिन उसके लिए कोई भी कदम सोच-समझकर उठाना होगा। 
 
अब शराब उद्योग पर नजर डालते हैं। पहला, बिहार सरकार ने पिछले साल से ही शराब के उत्पादन और सेवन पर पाबंदी लगाई हुई है। दूसरा, उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों के 500 मीटर के दायरे में शराब की बिक्री पूरी तरह रोक दी है। तीसरा, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज चौहान ने ऐलान किया है कि राज्य सरकार चरणबद्ध तरीके से शराब बिक्री की सभी दुकानों को बंद करने जा रही है।
 
इस तरह अचानक ही शराब उद्योग पर आशंकाओं के बादल मंडराने लगे हैं। जब बिहार सरकार ने शराबबंदी का फैसला किया था तो टिप्पणीकारों ने कहा था कि शराब बिक्री से मिलने वाले भारी राजस्व का नुकसान होता देख जल्द ही सरकार फैसला पलटने के लिए बाध्य हो जाएगी। सरकार को निश्चित रूप से राजस्व की क्षति उठानी पड़ी है लेकिन इस फैसले से सरकार को सियासी फायदा कहीं अधिक हुआ है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शराबबंदी को सटीक फैसला बताते हुए कहा है कि इससे राज्य में दूध और मिठाइयों के अलावा दैनिक उपभोग की वस्तुओं की बिक्री भी बढ़ी है। राज्य में अपराध पर भी काबू पाने में मदद मिलने का दावा किया गया है। शराबबंदी का फैसला महिला मतदाताओं के बीच काफी हिट रहा है जिसकी वजह से सभी राजनीतिक दलों को यह विचार पसंद आ रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी बिहार की पिछली यात्रा के दौरान शराबबंदी को लेकर नीतीश की तारीफ की थी। पंजाब विधानसभा चुनाव के दौरान अरविंद केजरीवाल ने भी अपनी पार्टी के सत्ता में आने पर अमृतसर और आनंदपुर को शराब-मुक्त करने का ऐलान किया था।
 
इसने भारत को कारोबार के लिहाज से बेहद खराब स्थिति में पहुंचा दिया है। विदेशी कंपनी काल्र्सबर्ग ने 2.5 करोड़ डॉलर के निवेश से पटना में अपना बियर संयंत्र लगाया था लेकिन उसे 12 घंटों में ही कामकाज समेटने को कह दिया गया। इससे हैरान काल्र्सबर्ग इंडिया के मुख्य कार्याधिकारी माइकल जेन्सन ने नीतीश सरकार के प्रति अपनी नाराजगी का खुलकर इजहार भी किया था। कई लोगों का मानना है कि शराबबंदी को पूरे देश में भी लागू किया जा सकता है। हालांकि इसकी संभावना काफी कम है लेकिन इतना जरूर है कि एक विचार के स्तर पर शराबबंदी का वक्त आ चुका है।
 
अब विमानन क्षेत्र की स्थिति पर विचार करते हैं। सरकार ने इस क्षेत्र को विदेशी निवेश के लिए खोल दिया है लेकिन अब भी कोई विदेशी एयरलाइन भारतीय एयरलाइन में 49 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी नहीं खरीद सकती है। अवसर का फायदा उठाते हुए कतर एयरवेज सॉवरिन वेल्थ फंड की मदद से एक भारतीय एयरलाइन की शुरुआत करना चाहती है। लेकिन नियमों के मुताबिक नियंत्रण और स्वामित्व एक ही भारतीय प्रतिष्ठान के पास होना चाहिए। जब तक यह प्रावधान नहीं हटाया जाता हैै विमानन क्षेत्र को पूरी तरह खोलने का कोई खास फायदा नहीं हो पाएगा। फिर तो कतर एयरवेज का प्रस्ताव कागज पर ही रह जाएगा।
 
विमानन क्षेत्र को पूरी तरह खोलने के पक्ष और विपक्ष दोनों में ही कई तर्क दिए गए हैं। सरकार को अपने मंतव्य के बारे में पूरी तरह स्पष्ट होना चाहिए। इस क्षेत्र के लिए ऐसे नियम नहीं बनाए जाने चाहिए जो एक दूसरे के समानांतर चलें। दूरसंचार भी सरकार का ध्यान हासिल करने की राह देख रहा है। दूरसंचार नेटवर्क घाटे में चल रहे हैं, सरकार को मिलने वाला राजस्व भी गिरावट पर है और अब भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों से कहा है कि संचार कंपनियों से लेनदेन के दौरान अतिरिक्त सतर्कता बरतनी होगी। डिजिटल इंडिया के सपने को हकीकत में बदलने की कुंजी माने जाने वाले मोबाइल नेटवर्क की हालत पतली हो चुकी है। सरकार इस क्षेत्र पर लगने वाले विभिन्न शुल्कों को कम कर उसे थोड़ी राहत दे सकती है। अगर सरकार के रिकॉर्ड पर उंगली उठ रही होती तो इन मुद्दों पर शायद अधिक ध्यान देती। लेकिन अभी तो ऐसी स्थिति नहीं है। इसका मतलब है कि इन क्षेत्रों को अभी राहत के लिए इंतजार करना होगा।
Keyword: narendra modi, development,,
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