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रक्षा क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा

संपादकीय /  May 10, 2017

रक्षा खरीद नीति के एक के बाद एक संस्करण (नवीनतम डीपीपी-2016) के साथ रक्षा मंत्रालय धीरे-धीरे उस पुराने चलन को समाप्त कर रहा है जिसके तहत रक्षा मंत्रालय देसी सैन्य उपकरणों के तमाम ऑर्डर बिना किसी प्रतिस्पर्धा के अपनी 41 हथियार फैक्टरियों और नौ सरकारी कंपनियों के लिए सुरक्षित रखता था। आज कम से कम नाम को सही लेकिन वह यह स्वीकार कर रहा है कि देश की जीवंत और तकनीक संपन्न निजी कंपनियों को रक्षा ऑर्डर के लिए प्रतिस्पर्धा की अनुमति दी जाए और उनको सरकारी क्षेत्र के साथ एकसमान अवसर मुहैया कराए जाएं। हालांकि इस विचार के पूर्ण क्रियान्वयन की राह में बाधाएं हैं। रक्षा मंत्रालय के कुछ नौकरशाह, खासतौर पर वे जिनकी सालाना आकलन रिपोर्ट इस बात पर निर्भर होती है कि सरकारी कंपनियों ने उनके अधीन कितना लाभ कमाया, उनका मानना है कि निजी कंपनियों को ऑर्डर तभी दिए जाने चाहिए जब सरकारी कंपनियां अपनी क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल कर चुकी हों। यह अवधारणा इस बात की अनदेखी कर देती है कि डीपीपी में ऐसा कोई उल्लेख नहीं है कि सरकारी कंपनियों को उत्पादन अनुबंध के लिए नामित किया जाए। केवल जहाज निर्माण के मामले में ऐसा है। शेष सभी अनुबंधों के लिए प्रतिस्पर्धी निविदा की व्यवस्था है जिसमें निजी क्षेत्र भी भागीदारी कर सकता है। 

 
इसके विपरीत आयुध फैक्टरियां जो सरकारी कंपनियों की तरह स्वतंत्र इकाई के बजाय रक्षा मंत्रालय के एक विभाग के अधीन हैं, उनको अधिक नियामकीय संरक्षण हासिल है। रक्षा खरीद नियमावली राजस्व बजट के अतिरिक्त की जाने वाली खरीदारी का नियमन करती है। उसमें कहा गया है कि आयुध फैक्टरियों के निर्माण का दायरा चाहे जो भी हो, खरीद उन्हीं से की जानी चाहिए बजाय कि प्रतिस्पर्धी निविदा के। अब रक्षा मंत्रालय इस संरक्षण को खत्म करना चाहता है। इसके लिए आयुध फैक्टरियों के उत्पादन के दायरे को मूलभूत और उससे इतर, इन दो हिस्सों में  बांटा जा रहा है। मूलभूत वस्तुओं में विस्फोटक, गोलाबारूद और ऐसी बंदूक आदि शामिल होंगी जिनका निर्माण निजी क्षेत्र नहीं कर सकता। यह क्षेत्र आयुध फैक्टरियों के लिए संरक्षित रहेगा। जबकि निजी उद्यमों को गैर मूलभूत वस्तुओं की आपूर्ति का ऑर्डर मिल सकेगा। ऐसा इसलिए किया जा रहा है क्योंकि रक्षा मंत्रालय को समझ में आ रहा है कि निजी क्षेत्र कहीं अधिक किफायती है। 
 
इसके अलावा रक्षा मंत्रालय एक ऐसा ढांचा तैयार करने का प्रयास कर रहा है जो निजी क्षेत्र की रक्षा कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा की निगरानी करे। बीते दो वर्ष से अधिक समय से वह लगातार सामरिक साझेदार के विषय पर संघर्ष करता रहा है। इसका तात्पर्य उन निजी कंपनियों से है जिनको वित्तीय और तकनीकी मानकों पर चुना जाएगा। यही चयनित कंपनियां विदेशी कारोबारियों के साथ उत्पादन के संयुक्त उद्यम स्थापित करेंगे। चूंकि चुने हुए सामरिक साझेदार को विदेशी साझेदारी से फायदा मिलेगा और रक्षा मंत्रालय 10-15 साल के लिए ऑर्डर जारी करेगा। उनके चयन को लेकर तमाम बहस है। 
 
रक्षा मंत्रालय ने अगले सप्ताह एक अहम बैठक का आयोजन किया है ताकि सामरिक साझेदार नीति पर अंतिम निर्णय लिया जा सके। खतरा यह भी है कि नौकरशाह कहीं इस नीति को अपने मनमुताबिक न बना लें। अगर ऐसा होता है तो एक ऐसी नीति सामने होगी जो कई सामरिक साझेदारों को हर क्षेत्र के लिए तय कर दे। इसमें विमानन, युद्घपोत और टैंक शामिल हो सकते हैं। यहां पर खतरा यह है कि गिनेचुने ऑर्डर के लिए बहुत अधिक प्रतिस्पर्धा के चलते कारोबार का आकार अव्यवहार्य हो जाएगा। इतना ही नहीं अगर मानक शिथिल हुए तो अव्यावहारिक, अनुभवहीन और गुणवत्ताहीन कंपनियां बाजार में आ जाएंगी। उच्च तकनीक वाले रक्षा क्षेत्र के लिए यह उचित नहीं।
Keyword: defense, india, budget,,
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