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तथ्यों पर खरा नहीं उतरता हर व्यक्ति के अहम होने का दावा

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  May 09, 2017

बीते पखवाड़े के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अति विशिष्ट व्यक्ति (वीआईपी) संस्कृति पर सवाल उठाते हुए कहा कि सभी व्यक्ति महत्त्वपूर्ण हैं। उन्होंने मन की बात में अपने श्रोताओं को बताया कि वीआईपी की जगह ईआईपी शब्द का प्रयोग होना चाहिए यानी एवरी पर्सन इज इंपॉर्टेंट जिसका मतलब है कि हर व्यक्ति महत्त्वपूर्ण है। माना जाना चाहिए कि मन की बात में होने वाला संवाद प्रधानमंत्री के हृदय से निकलता है। इससे पहले मोदी अपने मंत्रियों और सरकारी अधिकारियों को यह निर्देश दे चुके थे कि वे अपनी कारों से लाल बत्ती हटा दें। लाल बत्ती लंबे समय से सत्ता और श्रेष्ठता का ऐसा प्रतीक रहा है जिसे जनमानस पसंद नहीं करता। 

 
यह रोचक बात है कि कुछ ही दिन में प्रधानमंत्री ने एक और संक्षिप्त शब्द रूप प्रस्तुत किया। इसका संबंध परिवहन की ऐसी योजना की सब्सिडी से जुड़ा था जिसका इस्तेमाल आबादी के 5 फीसदी से भी कम लोग करते हैं। उड़ान यानी उड़े देश का आम नागरिक, ऐसी योजना है जिसके तहत क्षेत्रीय हवाई परिवहन को बढ़ावा देना है। इसके तहत करीब 300 छोटे हवाई अड्डों को भी विकसित किया जाना है जो अभी परिचालन अवस्था में नहीं हैं। इस योजना के बारे में काफी बात हो चुकी है। इसके तहत एक घंटे की अवधि की उड़ान की आधी सीटें 2,500 रुपये में बेची जाएंगी और इसके लिए विमान कंपनियों को सब्सिडी प्रदान की जाएगी। यह कुछ कुछ वैसा ही है जैसे कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के कार्यकाल में उन कंपनियों को अल्ट्रा मेगा पावर प्रोजेक्ट सौंपा गया था जिन्होंने सबसे कम सब्सिडी की बात कही थी। बाकी बची आधी सीटें जिन पर सब्सिडी नहीं है, उनकी कीमत तय करने पर कौन से नियम लगेंगे यह अब तक स्पष्टï नहीं है। कुछ खबरों के मुताबिक विमान कंपनियां बाकी सीटों पर अल्ट्रा प्रीमियम कीमत वसूल कर सकती हैं। ऐसे में सवाल यह उठ सकता है कि आखिर सब्सिडी की आवश्यकता ही क्या है? 
 
सवाल यह भी है कि एक ऐसी सरकार जो राजकोषीय सुधार और सब्सिडी खत्म करने के प्रति प्रतिबद्घता जता चुकी है, जो घरेलू गैस और ईंधन के क्षेत्र में ऐसा कर भी चुकी है, उसे एक ऐसी योजना में सब्सिडी देने की क्या आवश्यकता है जिसके कुछ खास लाभ नहीं हैं। सरकार को अंतिम तौर पर इससे क्या नुकसान होगा यह स्पष्टï नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि इन सब्सिडी की प्रक्रिया बहुत जटिल है। इसमें विमानपत्तन शुल्क की माफी, सेवा कर में उदारतापूर्वक कमी और विमानन ईंधन के सीमा शुल्क में कमी शामिल है। इनमें से कुछ रियायतें 10 वर्ष तक की अवधि के लिए दी जाएंगी। इससे यह सवाल उठता है कि उसके बाद क्या होगा? 
 
विभिन्न राज्यों के ऐसे अनुभवों का अध्ययन किया जाए तो यही अनुमान लगता है कि इसके कोई सुखद परिणाम सामने नहीं आए हैं। एक बार तयशुदा अवधि के प्रावधान का समापन होते ही दिक्कत शुरू हो जाती है। राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन नीति की घोषणा हुए बमुश्किल एक वर्ष का समय बीता है। इसका लक्ष्य था विमान यात्राओं को आम जनता के लिए सुलभ बनाना। कहा जा रहा है कि मांग के आधार पर विमानपत्तन और हवाई अड्डों को विकसित किया जाएगा। अगर मांग है तो फिर सब्सिडी की पेशकश क्यों की जा रही है? इसका फायदा किसे मिलेगा? बाजार कहां है?
 
दिल्ली-शिमला उड़ान की बात करते हैं जिसका प्रधानमंत्री ने कुछ ही दिन पहले उद्घाटन किया। इस मार्ग पर एक घंटे की उड़ान का किराया 2,500 रुपये से कुछ कम है। दिल्ली से शिमला लक्जरी बस से जाने में 12 घंटे लगते हैं और किराया इससे आधा है। वहीं कालका मार्ग से छह घंटे की रेल यात्रा का किराया करीब 1,300 रुपये है। यह बात भी ध्यान देने लायक है कि क्या मोदी के शब्दों में हवाई चप्पल पहनने वाले लोग हवाई यात्रा के लिए बस या ट्रेन की तुलना में दोगुना किराया देना पसंद करेंगे, भले ही उनका समय बच रहा हो। इस किराये पर हवाई यात्रा करने वाले भी हवाई चप्पल वाले आम लोग नहीं बल्कि समय बचाने वाले नव धनाढ्य लोग सफर करेंगे। आश्चर्य नहीं कि यह वर्ग भारतीय जनता पार्टी के मतदाताओं में सबसे प्रमुख है। लेकिन क्या उनको सब्सिडी की आवश्यकता है?
 
अगर हर भारतीय महत्त्वपूर्ण है तब तो सरकार का ध्यान रेलवे पर होना चाहिए जो रोज दो करोड़ लोगों को सफर कराती है। उसे यात्री सुविधाओं में सुधार की भरपूर कोशिश करनी चाहिए। यह भी सच है कि हाल ही में तृतीय श्रेणी वातानुकलित डिब्बों में सुधार किया गया है और उनको इस माह के अंत तक सफर के लिए शुरू किया जाएगा। लेकिन यह सुधार पर्याप्त नहीं है। रेलवे के आकार और उसके दायरे को देखते हुए इससे कहीं अधिक की दरकार है। 
 
यह भी याद कीजिए कि कैसे रेलवे स्टेशनों में सुधार के लिए निजी निवेश जुटाने के प्रस्ताव वर्ष 2007 से ही सुनने में आ रहे हैं। ये स्टेशन ऐसे हैं कि बहुत आसानी से इनको एशिया के सबसे गंदे स्टेशन का खिताब दिया जा सकता है। यहां अगर परियोजना लागत और व्यवहार्यता में आने वाली कमी की भरपाई की जाए तो निवेशकों की रुचि जग सकती है। रेलवे के आकार को देखते हुए कहा जा सकता है कि इसका प्रभाव व्यापक होगा। 
 
उड्डयन नीति में अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संस्थान के एक अध्ययन को उद्घृत किया गया है जिसके मुताबिक विमानन क्षेत्र में उत्पादन गुणक 3.25 और रोजगार गुणक 6.10 है। वहीं रेलवे क्षेत्र में अकेले उत्पादन गुणक ही 5 से ऊपर है। इसलिए वहां रोजगार की संभावना भी अपेक्षाकृत ज्यादा है। भारत जैसे देश में अगर रेलवे जैसे सार्वजनिक परिवहन के साधन को बेहतर बनाने पर ध्यान दिया जाए तो यह ईपीआई की भावना के अधिक करीब होगा बजाय कि सस्ती विमान यात्रा के। 
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