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राष्ट्रीय सुरक्षा पर सुविचारित रणनीति वक्त की दरकार

प्रेमवीर दास /  May 09, 2017

सरकार को बाहरी और घरेलू खतरों से निपटने के लिए कारगर रणनीति अपनाने पर ध्यान देना होगा। देश के सुरक्षा हालात का विश्लेषण कर रहे हैं प्रेमवीर दास

 
क्लासिक का दर्जा रखने वाली फिल्म 'ए टेल ऑफ टू सिटीज' की शुरुआत कुछ इन्हीं शब्दों के साथ होती है, 'यह बेहतरीन वक्त था, यह बदतरीन दौर भी था'। वर्तमान भारत के बारे में भी हमें इससे कुछ अलग अहसास नहीं होता है। एक तरफ, हमारे पास अनगिनत प्रशंसकों वाला एक सुव्यवस्थित और लोकप्रिय नेता है जो देश को विकास की राह पर ले जाने का वादा करता है और नोटबंदी के पीड़ादायक फैसले से अघोषित धन को सफेद करने की बात करता है। दूसरी तरफ, उसके अनुयायी होने का दावा करने वाले अनेक लोग आधुनिक या विकासपरक रास्ते पर जाने वाले हरेक कदम की आलोचना करते हैं। लिहाजा एक ऐसा सवाल खड़ा हो रहा है जिसे जरूर पूछा जाना चाहिए। लेकिन यह राजनीति से जुड़ा नहीं है। यह कुछ कड़वी सच्चाइयों से जुड़ा सवाल है जिनके बारे में हरेक समझदार भारतीय को चिंतित होना चाहिए। देश की अखंडता, स्थिरता और सुरक्षा पर विपरीत प्रभाव डाल सकने वाले मुद्दों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। 
 
सुरक्षाबलों की कार्रवाई में आतंक की राह पर चल पड़ा कश्मीर का एक उग्रपंथी मारा गया था तो उसके जनाजे में हजारों लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी थी। इसी तरह श्रीनगर लोकसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव होता है तो वहां महज आठ फीसदी मतदान ही होता है। कुछ मतदान केंद्रों पर दोबारा मतदान हुए तो करीब 40,000 मतदाताओं में से केवल 700 लोग ही वोट देने पहुंचे। कश्मीर की ही अनंतनाग सीट पर होने वाला उपचुनाव तो कानून व्यवस्था की समस्या के चलते हो ही नहीं पाया। लोग बिना किसी डर के सुरक्षाबलों पर पथराव कर रहे हैं और जब-तब सेना एवं वायुसेना के केंद्रों पर हमला भी किया जा रहा है। उग्र तेवर अपना चुकी भीड़ से अपने दस्ते को बचाने के लिए एक युवा सैन्य अधिकारी को अपनी जीप के आगे एक स्थानीय शख्स को बांधकर निकलने का तरीका अपनाने को मजबूर होना पड़ता है। देश के भीतरी इलाकों में सीआरपीएफ के दो दर्जन से भी अधिक जवानों को माओवादी नक्सलियों का गिरोह मार देता है और उनके हथियार भी छीनकर भाग जाता है। अगर यह सब सच नहीं है और वातानुकूलित कमरों में बैठकर आरोप लगाने वाले कुछ लोगों के मुताबिक केवल गलत सूचनाएं ही बाहर आ रही हैं तो फिर वाकई में कुछ गड़बड़ है।
 
असलियत तो यह है कि देश के आसपास सुरक्षा परिदृश्य लगातार खतरनाक होते जा रहे हैं। भारत को लेकर चीन अगर आक्रामक नहीं तो पहले से भी अधिक हठधर्मी जरूर हो गया है। दलाई लामा कोई पहली बार तवांग की यात्रा पर नहीं गए हैं लेकिन चीन के मीडिया ने इसे लेकर अनवरत विषवमन किया है। यहां तक कि भारत के लिए कश्मीर में समस्याएं खड़ी करने की धमकी भी दी गई है। सुरक्षा परिषद के अन्य सदस्यों के विपरीत चीन हाफिज सईद को आतंकवादी मानने से भी इनकार करता रहा है। इसी तरह इस देश ने परमाणु सामग्री आपूर्तिकर्ता देशों के समूह एनएसजी में भारत की सदस्यता का भी विरोध किया है।
 
चीन पाकिस्तान को सैन्य साजोसामान दे रहा है ताकि भारत के मुकाबले उसकी सैन्य क्षमता को बढ़ाया जा सके। चीन बीच-बीच में भारत से भी सहयोग बढ़ाने की बात करता रहा है लेकिन इसके पीछे मंशा भारत को रोकने की ही होती है। चीन हिंद महासागर में अपनी परमाणु पनडुब्बियों को पहले से ही तैनात किए हुए है। चीन हिंद महासागर के ग्वादर और जिबूती बंदरगाहों पर नौसैनिक अड्डा बना रहा है। माना जा रहा है कि इन नौसैनिक ठिकानों से चीन के लिए दुश्मन पर निगाह रख पाना और आसान हो जाएगा। साफ है कि हालात अनिष्ट की सूचना दे रहे हैं और ऐसे में हम केवल अपनी कीमत पर ही इसे हल्के में लेने का जोखिम उठा सकते हैं। 
 
इसके अलावा भी हमारे पड़ोस में हालात अधिक संतोषजनक नहीं हैं। श्रीलंका का हम्बनटोटा बंदरगाह भी ग्वादर की तरह चीन की एक कंपनी ही संचालित कर रही है। जिबूती बंदरगाह पर भी कई हजार नौसैनिकों की तैनाती किए जाने की संभावना है। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में चीन के सहयोग से आर्थिक कॉरिडोर का विकास यह बताता है कि चीन इस इलाके को पाकिस्तान का हिस्सा मान चुका है और इससे भारत के खिलाफ उन दोनों की मिलीभगत उजागर होती है। इस बदले हुए हालात में पाकिस्तान के साथ निपटने की भारत की लोचशीलता काफी कम हो गई है। पाकिस्तान पर अमेरिका का दबाव बढऩे की संभावना अब उतनी वास्तविक नहीं लगती है। हाल ही में जब अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार पाकिस्तान की यात्रा पर आए थे तो कुछ प्रवचन ही सुनने को मिले थे। ऐसे में हम कुछ खास लाभ की उम्मीद नहीं कर सकते हैं।
 
थोड़ा दूर नजर डालें तो ईरान के प्रति हमारी रुचि भी डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन के बढ़ते दबाव के चलते अधिक परवान चढ़ती नहीं दिख रही है। इस मुश्किल परिवेश में चीन से दो पनडुब्बियां लेने के बाद भी बांग्लादेश का सहयोग ही एक चमकदार पहलू नजर आता है। फिलहाल सौम्यता दिखा रहे नेपाल ने भी हाल ही में चीन के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास में हिस्सा लिया था। 
 
देश के भीतर और बाहर बने इस चिंताजनक हालात में भी हमारी प्रतिक्रिया अनिश्चित बनी हुई है। विदेशी चुनौतियों से निपटने के लिए हम अमेरिका और जापान के साथ नजदीकी रिश्ते बनाने की कोशिश कर रहे हैं। चीन के साथ इन दोनों प्रमुख देशों के करीबी कारोबारी संबंध होने के बावजूद भारत का ऐसा करना सही है। संभव है कि अमेरिका और जापान के भू-राजनीतिक हित चीन से  मेल न खाते हों लेकिन 'संघर्ष के बीच सहयोग' का यह रिश्ता आगे चलकर उनके संबंधों को व्याप्त कर ले। ऐसे में भारत के लिए ज्यादा गुंजाइश नहीं बचती है।
 
रूस के साथ भारत के दशकों से करीबी संबंध रहे हैं और बांग्लादेश के निर्माण के समय उसने परोक्ष रूप से हमारी मदद भी की थी। लेकिन इस समय वह चीन के साथ कहीं अधिक करीबी से जुड़ा हुआ है। दरअसल रास्ते में आने वाली अड़चनों और उसके मुताबिक सही विकल्प चुनने के लिए जरूरी लक्ष्यों और उद्देश्यों की ही समग्र तस्वीर हमारे सामने स्पष्ट नहीं है। कुछ अनबूझ कारणों से हमारे नीति-निर्माता एक सुविचारित योजना बनाने के बजाय अंतरात्मा की आवाज पर फैसला करना ही पसंद करते हैं। 
 
जहां तक घरेलू हालात का सवाल है तो स्थिति अधिक बुरी और भयावह है। इन मामलों में बल प्रयोग की नीति अपनाई जाती रही है। अगर कश्मीर घाटी में उग्रवाद की हरेक घटना के लिए  पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया जाता है तो फिर उस देश से निपटने के लिए हमारे पास एक ठोस नीति होनी चाहिए। या तो ताकत का इस्तेमाल होना चाहिए या फिर बातचीत होनी चाहिए लेकिन इनमें से कुछ भी नहीं करना हमारी रणनीति नहीं हो सकती है। अगर समस्या अधिक स्थानीय है तो हमें अपने लोगों से बातचीत का ही विकल्प आजमाना होगा। अगर जल्द ही एक सुविचारित प्रक्रिया नहीं अपनाई जाती है तो हमारे शहीदों की संख्या बढ़ती ही जाएगी। सेना पाकिस्तान से तो बखूबी निपट सकती है लेकिन अपने ही देश के लोगों को ठिकाने नहीं लगा सकती है। सेना इसके लिए जितना अधिक प्रयास करेगी, यहां के लोगों में उसके प्रति आकर्षण उतना ही कम होता जाएगा। वाकई में यह बेहतरीन समय नहीं है।
 
(लेखक नौसेना की पूर्वी कमान के पूर्व कमांडर-इन-चीफ हैं। वह राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के सदस्य भी रहे हैं)
Keyword: defense, india,,
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