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आप : दूर होते अपने, चूर होते सपने

आदिति फडणीस /  05 08, 2017

आम आदमी पार्टी हमें बार-बार यह याद दिलाती है कि जब कोई पार्टी दूसरों को नैतिकता और जवाबदेही का पाठ पढ़ाकर सत्ता में आती है तो उसका क्या हश्र होता है

चालीस साल से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के सदस्य और 30 साल से सामाजिक कार्यकर्ता कमल मित्रा चेनॉय वर्ष 2014 में आम आदमी पार्टी (आप) में शामिल हो गए थे। चेनॉय ने विस्तार से उन कारणों का खुलासा किया जिसकी वजह से उन्होंने भाकपा से इस्तीफा दिया। अपने एक लेख में उन्होंने कहा, 'भारतीय धर्मनिरपेक्षता के लिए यह अहम समय है। यह कहना बचपना है कि आप के पास कोई विचारधारा नहीं है। जैसे कि ग्रामसी ने बार-बार कहा है कि सभी लोग किसी न किसी रूप में  बुद्धिजीवी हैं। उन्होंने परंपरागत विचारधाराओं का बचाव करने वाले और उन्हें वैधता देने वाले परंपरागत बुद्धिजीवियों और सत्ता के एकाधिकारवादी तरीके से इस्तेमाल में अंतर को समझाया था। उनके प्रतिद्वंद्वी जैविक बुद्धिजीवियों हैं जिनकी जड़ें लोकप्रिय आंदोलनों और लोकप्रिय संस्कृति में है। वे किसी बदलाव और यहां तक कि आंदोलन के लिए जरूरी हैं।'

चेनॉय में महज दो साल बाद ही आप से किनारा कर लिया। अपने इस्तीफे के बारे में पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल को भेजे गए एक नोट में उन्होंने पार्टी को पटरी पर लाने और अपने आसपास के लोगों से छुटकारा पाने की सलाह दी थी। साफ है कि सत्ता का एकाधिकारवादी इस्तेमाल एक बार फिर अपना सिर उठा रहा था। कभी आप के समर्थक रहे कई लोग अब पार्टी के आलोचक बन गए हैं और वे भी करीब-करीब वही बात कह रहे हैं तो चेनॉय ने कही थी।

यही वजह है कि जब हर किसी को बॉस की तरह सोचने के लिए मजबूर किया जाता है तो कोई भी ज्यादा नहीं सोचता है। क्या दूसरी पार्टियों से अलग दिखने की चाह रखने वाली कोई लोकतांत्रिक पार्टी की नींव अलोकतांत्रिक हो सकती है? अपने छोटे से कार्यकाल में आप ने प्रशासन के कई क्षेत्रों में अपना अलग मुकाम बनाया। लेकिन पार्टी लोकतंत्र उनमें शामिल नहीं है। पंजाब की घटनाएं, नगर निगम चुनावों में हार के बाद दिल्ली में विद्रोह और वर्ष 2015 में प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को जिस तरह बाहर किया गया, उससे साबित होता है कि पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र नहीं है। भूषण, यादव और आनंद कुमार पर दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी के खिलाफ काम करने के आरोप लगाए गए।

इन तीनों नेताओं ने इन आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि वे तो बस यह कोशिश कर रहे थे कि पार्टी ज्यादा लोकतांत्रिक तरीके से काम करे। वर्ष 2014 के आम चुनावों से पहले पंजाब में शिरोमणि अकाली दल के आजाद प्रवृत्ति के विधायक सुच्चा सिंह छोटेपुर ने आप का दामन पकड़ा था। आप के नेताओं ने कहा कि छोटेपुर के तेजतर्रार भाषणों ने केजरीवाल को प्रभावित किया था। केजरीवाल ने पहली बार छोटेपुर को गुरुदासपुर में सुना था। जब पार्टी को पंजाब में दो विधानसभा उपचुनावों में हार का सामना करना पड़ा तो केजरीवाल ने वहां पार्टी की कमान छोटेपुर के हाथों में दे दी। लेकिन छोटेपुर किसी की जी हुजूरी करने वाले इंसान नहीं हैं। 

आप का कहना है कि छोटेपुर को एक वीडियो में पैसे का एक पैकेट लेते हुए दिखाया गया है। छोटेपुर के विरोधियों का कहना है कि उनकी कई और कमजोरियां हो सकती हैं लेकिन वह भ्रष्टï नहीं हैं। छोटेपुर ने कहा कि उन्हें इसलिए हटाया गया क्योंकि उन्होंने केजरीवाल और उनकी मंडली की जी हुजूरी करने से इनकार कर दिया था। कई नेताओं को पार्टी से निकालने के बाद केजरीवाल और उनके सहयोगी कुमार विश्वास जैसे मुखर और लोकप्रिय नेता को बाहर करना चाहते थे।

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि आप की राजनीतिक मामलों की समिति (पीएसी) में विश्वास के समर्थक नहीं के बराबर हैं। वह कवि और प्रतिभाशाली वक्ता हैं और पार्टी कार्यकर्ताओं में बहुत लोकप्रिय हैं। लेकिन पीएसी में बहुत लोग उन्हें अपने तक ही सीमित मानते हैं, वह अपने आप में ही मस्त रहते हैं और उनके पास पार्टी के लिए कोई समय नहीं है। 

इस मामले में रोचक मोड़ उस वक्त आया जब विश्वास ने कश्मीर में सुरक्षा बलों पर हुए हमले के बारे में एक वीडियो जारी किया। उन्होंने कश्मीर मुद्दे पर बात की और घाटी में जवानों के अपमान की आलोचना की लेकिन उसके बाद कहा, 'अगर आप भ्रष्टाचार खत्म करने के वादे के साथ दिल्ली में सरकार बनाते हैं और फिर भ्रष्टाचारियों को बचाते हैं तो सवाल तो उठेंगे।' उन्होंने लोगों को मोदी-मोदी, अरविंद-अरविंद, राहुल-राहुल और इंडिया इज इंडिया जैसे व्यक्तिगत पूजा वाले नारों से दूरे रहने की अपील की। उन्होंने कहा कि सरकार को कुछ साल रहेगी लेकिन देश 5,000 साल पुराना है।

इस वीडियो दो कारणों से हलचल पैदा की। यह ऐसे वक्त आया जब दिल्ली नगर निगम का चुनाव प्रचार अपने चरम पर था और इसमें केजरीवाल का नाम लिए बगैर उन पर हमला किया गया था। जब चुनाव परिणाम आए तो विश्वास ने कहा कि आप की हार के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पार्टी को आत्ममंथन करने की जरूरत है।

यह केजरीवाल के लिए नया बम था जो पंजाब और दिल्ली चुनावों में हार के कारण परेशान थे। केजरीवाल और उनके सबसे करीबी साथी मनीष सिसौदिया ने उन्हें सबक सिखाने के लिए एक अलग रणनीति अपनाई। वे विश्वास को पार्टी से बाहर नहीं निकालने चाहते थे लेकिन पार्टी में उनका कद नीचा करना चाहते थे। पीएसी की बैठक में दक्षिण दिल्ली की एक सीट से विधायक अमानतुल्ला खान ने विश्वास पर खासकर वीडियो को लेकर हमला किया। खान जब विश्वास के खिलाफ जहर उगल रहे थे तो दूसरे नेता चुपचाप सुन रहे थे।

खान अपनी विधानसभा में लोकप्रिय हैं और पीएसी में शामिल एकमात्र अल्पसंख्यक चेहरा हैं। इस समुदाय के दो अन्य नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। जब खान ने विश्वास की आलोचना की तो हर किसी को लग रहा था कि पार्टी टूट के कगार पर है। लेकिन क्या विश्वास पर इस तरह का हमला आलाकमान की शह पर किया गया था? केजरीवाल विश्वास के घर गए, उन्हें अपने घर लाए, उन्हें अपना छोटा भाई बताया और उन पर प्यार लुटाया। दूसरी तरफ खान को पीएसी से बाहर कर दिया गया और पार्टी से निलंबित कर दिया गया। लेकिन इस बात की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया कि खान के निलंबित होने के बाद सिसोदिया उनके घर गए। विश्वास को शांत करने के लिए उन्हें राजस्थान इकाई का संयोजक बनाने की पेशकश की गई। अलबत्ता राजस्थान चुनाव अहम नहीं हैं और न ही निकट भविष्य में होने वाले हैं। 

पार्टी ने अभी तक गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव लडऩे के बारे में ही फैसला नहीं किया है। इसलिए पार्टी के भीतर और बाहर कई  लोगों का मानना है कि यह विवाद जानबूझकर पैदा किया गया था। इसका मकसद विश्वास को उनकी जगह बताना था और साथ ही यह सुनिश्चित करना था कि उनके पास पार्टी छोडऩे का कोई बहाना न रह जाए। आप में जारी मतभेद अभी जारी हैं। विरोधी आप के पड़ी फूट का फायदा उठाना चाहते हैं, वे मजबूत हैं और उनके पास सत्ता है। दिल्ली सरकार इस समय भले ही मुश्किल दौर से गुजर रही है लेकिन शिक्षा, बिजली और स्वास्थ्य के क्षेत्र के उसकी पहल ने लोगों का ध्यान खींचा है। लेकिन क्या आप अलोकतांत्रिक माध्यमों से लोकतांत्रिक परिणाम दे सकते हैं? आप को इस विरोधाभास का समाधान करने की जरूरत है।

विवादों का साया

मुख्यमंत्री बनाम उप राज्यपाल

2015 में आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार के बनने से पहले ही मुख्यमंत्री और उप राज्यपाल के बीच जंग शुरू हो गई थी। किसी भी मुद्दे पर दोनों में सहमति नहीं थी चाहे वह नियुक्तियों का मामला हो, पुलिस का, सार्वजनिक व्यवस्था का या फिर जमीन का। जब यह विवाद सीमा से बाहर निकल गया तो फिर न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ा। लेकिन इससे भी कोई फायदा नहीं हुआ। आखिरकार दिसंबर 2016 में नजीब जंग ने उप राज्यपाल के पद से इस्तीफा दे दिया

गजेंद्र सिंह की आत्महत्या का मामला

अप्रैल 2015 में जब केजरीवाल जंतर मंतर में एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे तो राजस्थान के एक किसान गजेंद्र सिंह ने पेड़ से लटककर आत्महत्या कर ली। इस पर दिल्ली सरकार की काफी किरकिरी हुई। केजरीवाल केंद्र सरकार के भूमि विधेयक के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। केजरीवाल की आलोचकों का कहना था कि उन्होंने जितेंद्र की मौत के बावजूद अपना भाषण नहीं रोका

तोमर की फर्जी डिग्री 

केजरीवाल ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी डिग्री हासिल नहीं की। लेकिन दिल्ली के कानून मंत्री जितेंद्र सिंह तोमर की एलएलबी की डिग्री फर्जी निकली। तोमर को पार्टी से निकाल दिया गया और उन पर मुकदमा चल रहा है।

दिल्ली पुलिस बनाम केजरीवाल

दिल्ली सरकार और दिल्ली पुलिस के बीच रिश्ते तनावपूर्ण रहे हैं। दिल्ली पुलिस उप राज्यपाल को रिपोर्ट करती है और इस तरह केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि केजरीवाल दिल्ली पुलिस को नापंसद करते हैं लेकिन उसका नियंत्रण अपने हाथों में लेना चाहते हैं

संदीप कुमार सेक्स कांड

अगस्त 2016 में दिल्ली के पूर्व सामाजिक कल्याण एवं बाल विकास मंत्री संदीप कुमार का एक विवादास्पद वीडियो सामने आया। इसमें उन्हें दो महिलाओं के साथ आपत्तिजनक स्थिति में दिखाया गया था। इनमें से एक महिला की शिकायत के बाद संदीप के खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज किया गया।

विज्ञापनों के जरिये अपना प्रचार

आप सरकार ने 2015-16 में रेडियो विज्ञापनों पर 526 करोड़ रुपये खर्च किए। विपक्षी दलों का आरोप है कि अपना प्रचार भ्रष्टाचार के बराबर है

प्रमुख सचिव के कार्यालय पर छापा

दिसंबर 2015 में केजरीवाल ने उनके कार्यालय पर छापे के बाद प्रधानमंत्री को सनकी और वित्त मंत्री अरुण जेटली को झूठा कहा था। अलबत्ता सीबीआई का कहना था कि छापा मुख्यमंत्री के कार्यालय पर छापा नहीं बल्कि उनके प्रधान सचिव राजेंद्र कुमार के कार्यालय पर मारा गया था। मार्च, 2016 में उच्चतम न्यायालय ने सीबीआई को केजरीवाल के कार्यालय से लिए गए दस्तावेज लौटाने को कहा। केंद्र सरकार ने इस साल फरवरी में कुमार के स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के आवेदन को खारिज कर दिया और सीबीआई को उन पर भ्रष्टाचार का मुकदमा चलाने का आदेश दिया।

लाभ के पद का मामला

2015: राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा ने दिल्ली उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर कर दिल्ली के 21 विधायकों को संसदीय सचिव के फैसले को चुनौती दी। याचिका में कहा गया कि यह लाभ के पद का मामला है।
2016: न्यायालय ने इन विधायकों की नियुक्ति को निरस्त कर दिया
जून 2015: दिल्ली सरकार ने कानून में बदलाव कर संसदीय सचिव को लाभ के पद से बाहर कर दिया।
जून 2016: संशोधन विधेयक दिल्ली के उप राज्यपाल, केंद्रीय गृह मंत्रालय और राष्ट्र्पति के पास पहुंचा। इसे रोक दिया गया और मामले को जांच के लिए चुनाव आयोग के पास भेज दिया गया।
मई 2017: इस मामले में कभी भी फैसला आ सकता है। विधायकों ने चुनाव आयोग के समक्ष अपने बचाव में कहा है कि उन्हें कोई वेतन नहीं मिलता है इसलिए यह लाभ के पद का मामला नहीं है। लेकिन संविधान विशेषज्ञ सुभाष काश्यप के अनुसार अगर कोई विधायक सरकार में किसी पद पर है, भले ही वह कोई वेतन नहीं लेता है मगर सुविधाएं लेता है तो इसे लाभ का पद माना जाएगा।

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