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दक्षिण कोरिया के हालात से सबक

नितिन पई /  May 08, 2017

अपने सहयोगियों और साझेदारों की सुरक्षा संबंधी अमेरिकी प्रतिबद्घता अब कतई विश्वसनीय नहीं रह गई है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं नितिन पई 

 
अगर आपको लगता है कि आप समस्याओं से घिरे हैं तो जरा दक्षिण कोरिया के बारे में सोचिए। उसका पड़ोसी मुल्क उत्तर कोरिया परमाणु हथियार विकसित कर रहा है जिसे मिसाइल के जरिये दक्षिण कोरिया के किसी भी हिस्से में दागा जा सकता है। उसके पास पहले ही इतना गोला बारूद और पारंपरिक मिसाइल हैं जिनकी मदद से वह कुछ ही घंटों में दक्षिण कोरिया की राजधानी में लाखों लोगों की जान ले सकता है। वह अक्सर ऐसा करने की धमकी देता रहता है। 
 
दक्षिण कोरिया चाहे तो अपनी रक्षा के लिए मिसाइल तैनात कर सकता है लेकिन उसका एक अन्य पड़ोसी देश चीन ऐसा नही करने देता। यह मिसाइल रक्षा कवच जिसे टर्मिनल हाई एल्टिट्यूड एरिया डिफेंस (थाड) कहा जाता है, वह आने वाली मिसाइलों को रास्ते मे ही रोक लेता है। ऐसे में चीन को कोई खतरा नहीं होना चाहिए लेकिन उसके बावजूद वह नहीं चाहता कि दक्षिण कोरिया ऐसी मिसाइल तैनात करे। उत्तर कोरिया की क्षमताएं और उसकी धमकी बढऩे के बाद आखिरकार दक्षिण कोरिया तय करता है कि वह थाड की स्थापना करेगा लेकिन संयोगवश उसी समय चीन का एक पर्यटक समूह अपनी बुकिंग रद्द कर देता है और चीन के अधिकारी अपने देश में दक्षिण कोरियाई सुपर बाजार की चेन बंद कर देते हैं। कहा जाता है कि वहां सुरक्षा मानकों का उल्लंघन हो रहा है। बैरॉन की विश्लेषक शुली रेन के मुताबिक अगर चीन केवल इस वर्ष अपने पर्यटकों का जाना रोक दे तो दक्षिण कोरिया के सकल घरेलू उत्पाद में 0.5 फीसदी की कमी आएगी। यह कुल जीडीपी वृद्घि में 20 फीसदी के बराबर कमी है। 
 
अगर ऐसे पड़ोसी हों तो आपको मजबूत साझेदारों की जरूरत होती है। उदाहरण के लिए अमेरिका ने दशकों से अपने सैनिक दक्षिण कोरिया में तैनात कर रखे थे और अभी भी वहां करीब 28,000 अमेरिकी सैनिक हैं। वह उसे थाड की सुविधा भी दे रहा है। अमेरिका से मजबूत साझेदार भला कौन होगा लेकिन एक दिक्कत है: अमेरिका के नए राष्ट्रपति डॉनल्ड टं्रप का कहना है कि साझेदारों को अपनी रक्षा की कीमत अमेरिका को चुकानी होगी। उन्होंने थाड के लिए दक्षिण कोरिया से एक अरब डॉलर की राशि मांगी है। इस संकट के बीच ही उन्होंने यह इरादा भी दोहराया है कि वे अमेरिका-दक्षिण कोरिया मुक्त व्यापार समझौते पर नए सिरे से चर्चा करेंगे। गौरतलब है कि कुछ ही दिन पहले चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग से मुलाकात के बाद उन्होंने कहा था कि उन्हें पता लगा कि कोरिया चीन का हिस्सा हुआ करता था। इन तमाम चीजों के बीच वहां राष्ट्रपति पद के लिए अप्रत्याशित चुनाव हुए क्योंकि पिछले राष्ट्रपति पर महाभियोग लगाने के बाद हटा दिए गए थे। जाहिर है समस्याओं की बात की जाए तो दक्षिण कोरिया हम पर बहुत बीस ठहरता है। 
 
आप उत्तर कोरिया के शासक किम जोंग उन को परमाणु हथियार बनाने के लिए भी दोषी नहीं ठहरा सकते आखिरकार वह इराक, लीबिया और पाकिस्तान के अलग-अलग हश्र से वाकिफ हैं। पश्चिमी देशों ने पहले इसलिए आक्रमण किया कि सद्दाम हुसैन के पास परमाणु हथियार नहीं थे। लीबिया में उन्होंने विद्रोहियों को बढ़ावा दिया क्योंकि मुअम्मर कज्जाफी ने परमाणु हथियार बनाए ही नहीं। वहीं दूसरी ओर अमेरिका और अन्य पश्चिमी देश पाकिस्तान के हितों का पोषण करते हैं क्योंकि उसने परमाणु हथियार बना रखे हैं। 
 
हालांकि ट्रंप के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार लेफ्टिनेंट जनरल एच आर मैकमास्टर ने स्पष्टï किया कि अमेरिका दक्षिण कोरिया को एक अरब डॉलर का बिल नहीं भेजेगा, हालांकि तब तक अमेरिका की साझेदारों के प्रति सुरक्षा प्रतिबद्घता को जो नुकसान पहुंचना था वह पहुंच चुका था। अब जाहिर है अमेरिकी सुरक्षा की अनिश्चितता के बाद दक्षिण कोरिया और जापान इस क्षेत्र में अपना निवेश बढ़ाएंगे। लब्बोलुआब यह कि ये दोनों देश अब अपने यहां परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में काम करेंगे। उनको इसमें बहुत अधिक मुश्किल आएगी ऐसा भी नहीं लगता। उनको उत्तर कोरिया से जितना खतरा महसूस होगा, चीन उन पर जितना दबाव बढ़ाएगा और उन्हें अमेरिकी मदद की आश्वस्ति जितनी कम होगी। वे उतनी ही आसानी से परमाणु हथियारों की ओर बढ़ेंगे। 
 
हम पहले भी जिक्र कर चुके हैं कि दक्षिण एशिया में सुरक्षा ढांचा तैयार करने की संभावना इस बात पर केंद्रित है कि हम परमाणु प्रतिरोध के विकल्प के रूप में बहुपक्षीय मंच खड़े करें। यह उम्मीद भी अब गलत साबित हो चुकी है। गत सप्ताह आसियान देशों के नेताओं की बैठक बिना रस्मी संयुक्त वक्तव्य जारी किए समाप्त होने को थी। जब वक्तव्य जारी भी किया गया तो उसमें चीन द्वारा दक्षिण चीन सागर में किए जा रहे कब्जे, निर्माण और सैन्य गतिविधियों का कोई जिक्र नहीं था। शायद ऐसा इसलिए हुआ होगा क्योंकि मनीला में आसियान शिखर बैठक में चीनी राजनयिक भी मौजूद थे। संदेश साफ है: अगर आप आसियान सदस्य हैं और आपका चीन के साथ विवाद है तो आप अपने स्तर पर उससे निपटिए। फिलीपींस के राष्ट्रपति रोड्रिगो डुटर्ट के शब्दों में कहें तो, 'चीन पर भला कौन दबाव डाल सकता है? क्या हम?'
 
ट्रंप ने दक्षिण कोरिया के साथ जो व्यवहार किया है उसके बाद इस बात की संभावना कम ही है कि कोई देश अमेरिकी सुरक्षा की गारंटी पर भरोसा करेगा। किसी भी देश के लिए अब अमेरिका से सैन्य उपकरण खरीदना भी खासा जोखिम भरा हो चला है। वर्षों से मैं यह दलील देता रहा हूं कि भारत को अमेरिका के साथ रक्षा साझेदारी बढ़ानी चाहिए और प्रमुख सैन्य उपकरण खरीदने चाहिए। मैंने ऐसा इसलिए कहा था क्योंकि अपने प्रमुख कारोबारी साझेदार से सैन्य उपकरण खरीदना बेहतर बात है। रूस को हमारे साथ मूल्य और लेनदेन करने की क्षमता हासिल है क्योंकि दोनों के बीच गैर रक्षा कारोबार कम ही है। 
 
अगर अमेरिकी व्यापार नीति में संरक्षणवाद का प्रभाव बढ़ता है और रक्षा उपकरणों की बिक्री के साथ शर्त जुड़ती हैं तो भारत को अपना आकलन बदलना होगा। क्या हम चाहते हैं कि चीन या पाकिस्तान के साथ युद्घ जैसी स्थिति बने तो हमें भी एक अरब डॉलर का चेक सौंप दिया जाए? इसी प्रकार जब तक स्पष्ट आश्वासन नहीं हों हम भी यह नहीं मान सकते कि भारत-चीन और पाकिस्तान को लेकर अमेरिका आगे उसी नीति पर चलता रहेगा जिस पर बुश और ओबामा चल रहे थे। अब यह अमेरिका पर निर्भर करता है कि वह भारत को कितनी जल्दी ऐसी आश्वस्ति प्रदान करता है। 
 
(लेखक तक्षशिला इंस्टीट्यूशन नामक स्वतंत्र जन नीति शोध एवं शिक्षण केंद्र के सह संस्थापक और निदेशक हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं। )
Keyword: india, koria, दक्षिण कोरिया,
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