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वित्त वर्ष में बदलाव के मायने

एन सुंदरेश सुब्रमण्यन और सुदीप्त दे /  05 07, 2017

वित्त वर्ष में परिवर्तन का मंथन

भारतीय लेखा मानकों एवं जीएसटी प्रणाली के लिए तैयारी कर रहीं कंपनियां बिना किसी अनिश्चितता एवं खास लागत के कर सकती हैं वित्त वर्ष में बदलाव

अप्रैल 2014 से प्रभावी होने वाले कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 2 (41) के तहत यह अनिवार्य किया गया है कि कंपनियां अप्रैल से मार्च तक के वित्त वर्ष का अनुकरण करें। किसी अन्य अवधि को वित्त वर्ष मानने वाली कंपनियों को इस प्रणाली में आने के लिए दो वर्षों का समय दिया गया था। लेकिन यदि कोई कंपनी आधिकारिक वित्त वर्ष से इतर किसी अवधि को लेखा वर्ष के तौर पर इस्तेमाल करना चाहती है तो इसके लिए उसे नैशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल से मंजूरी लेने की जरूरत होगी।

साल 2013 में करीब 226 सूचीबद्ध कंपनियों का वित्त वर्ष मार्च में खत्म नहीं होता था, जबकि 74 कंपनियां कैलेंडर वर्ष को ही अपना लेखा वर्ष मानती थीं। इसी प्रकार 58 सूचीबद्ध कंपनियों का वित्त वर्ष सितंबर में खत्म होता था जबकि 89 कंपनियों का वित्त वर्ष जुलाई से जून की अवधि थी। कुछ कंपनियों का वित्त वर्ष अप्रैल में (2), अगस्त में (2) और अक्टूबर में (1) भी खत्म होता था।

यह इसलिए संभव था क्योंकि उस समय कंपनी अधिनियम 1956 प्रभावी था और वित्त वर्ष के रूप में किसी विशेष अवधि का उल्लेख नहीं किया गया था। लेकिन कंपनी अधिनियम 2013 के पारित होने के साथ ही कंपनियों के लिए अपना वित्त वर्ष चुनने का यह विकल्प खत्म हो गया। अब साल 2017 के आंकड़ों पर गौर करते हैं। बीएस रिसर्च ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, लगभग सभी बड़ी कंपनियां- सेंसेक्स में शामिल सभी 30 कंपनियां और निफ्टी 50 में शामिल 48 कंपनियां- अप्रैल से मार्च की अवधि को अपना वित्त वर्ष मानती हैं। बीएसई 500 सूचकांक में शामिल कंपनियों में से महज 17 कंपनियां अप्रैल से मार्च की अवधि के इतर अपना वित्त वर्ष मानती हैं। इनमें से 14 कंपनियां कैलेंडर वर्ष को ही अपना वित्त वर्ष मानती हैं।

बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों की कुछ सहायक इकाइयों को छोड़कर अधिकतर कंपनियां अप्रैल से मार्च की अवधि को अपना वित्त वर्ष मानने लगी हैं। अपनी मूल विदेशी कंपनी के साथ तालमेल बिठाने के कारण इन सहायक इकाइयों को अपना लेखा वर्ष भी उसी के अनुरूप रखना पड़ता है। हालांकि तीन साल बाद वित्त वर्ष में बदलाव के नए प्रस्ताव से भारतीय कारोबारियों की परेशानी बढ़ गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि वित्त वर्ष में किसी भी नए बदलाव से उन कंपनियों के लिए बोझ बढ़ सकता है जो फिलहाल अप्रैल से मार्च की अवधि को वित्त वर्ष मान रही हैं। नीति आयोग द्वारा प्रस्तुत एक चर्चा पत्र में इस बदलाव से प्रभावित होने वाले कानूनों में कंपनी अधिनियम 2013 की भी पहचान की गई है।

एक वरिष्ठ कंपनी सचिव एसएन विश्वनाथन ने कहा कि कंपनियां अप्रैल से मार्च के वित्त वर्ष के अनुरूप खुद को ढाल चुकी हैं। विश्वनाथन ने कहा, 'इसे आयकर अधिनियम के तहत आकलन वर्ष और लेखा वर्ष से भी संबद्ध करना पड़ेगा। यदि सरकार वित्त वर्ष में बदलाव करना चाहती है तो उसके अनुरूप आईटी अधिनियम में भी संशोधन किए जा सकते हैं। इससे विस्थापन संबंधी तमाम समस्याएं पैदा होंगी।'

अधिकतर विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रस्ताव फिलहाल चर्चा के स्तर में है और इसे लागू होने में दो से तीन साल लग सकते हैं। इस मुद्दे पर कोई अंतिम निर्णय लेने से पहले उद्योग और सरकार सहित सभी हितधारकों के बीच व्यापक परिचर्चा हो सकती है। पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार शंकर आचार्य की अध्यक्षता में पिछले साल एक विशेषज्ञ समिति गठित की गई थी। उद्योग संगठन एसोचैम ने एक नोट जारी कर इस प्रस्ताव पर सवाल उठाया है। उद्योग संगठन ने कहा कि वित्त वर्ष में बदलाव करने का मतलब बहीखाते, एचआर गतिविधियों, लेखा सॉफ्टवेयर और कराधान प्रणाली में भी बदलाव होगा। ऐसे में बड़े एवं छोटे उद्योगों के लिए इसकी लागत हजारों करोड़ रुपये होगी।

उद्योग चैम्बर का कहना है कि उसके सदस्यों से मिली प्रतिक्रियाओं के अनुसार यह एक बेकार पहल है। एसोचैम ने अपने एक नोट में कहा है, 'किसी भी सूरत में इस पहल से कारोबारी सुगमता को बढ़ावा नहीं मिलेगा। जबकि इससे बेवजह तमाम बाधाएं पैदा होंगी और अफसरशाही एवं प्रणाली संबंधी देरी होगी। इस समय भारत ऐसे किसी भी विघटन की अनुमति नहीं दे सकता।' वकीलों और सलाहकारों का कहना है कि जो कंपनियां भारतीय लेखा मानक और आगामी जीएसटी प्रणाली जैसे बड़े बदलावों के लिए अभी भी तैयारी कर रही हैं वे निश्चित तौर पर बिना किसी अनिश्चितता और खास लागत के ऐसा कर सकती हैं। विशेषज्ञों ने बताया कि लेखांकन के लिहाज से कंपनियों को लेखा वर्ष में बदलाव के लिए नौ महीने के खाते का हिसाब करना पड़ेगा और उसके बाद वे आसानी से कैलेंडर वर्ष की ओर रुख कर सकती हैं। इसके लिए तमाम प्रक्रियाओं की तैयारी पहले से ही करनी पड़ेगी जैसे गुडविल इम्पेयरमेंटटेस्टिंग, मूल्य हस्तांतरण संबंधी अध्ययन और बहीखातों में तालमेल बिठाना आदि।

नांगिया ऐंड कंपनी के मैनेजिंग पार्टनर राकेश नांगिया का मानना है कि वित्त वर्ष में बदलाव शुरुआती तौर पर विघटनकारी हो सकता है। उन्होंने कहा, 'उद्योग जीएसटी प्रणाली को अपनाने के लिए पहले से ही संक्रमण काल से गुजर रहा है। ऐसे में वित्त वर्ष में बदलाव जैसे एक अन्य परिवर्तन से कारोबार पर दबाव बढ़ेगा।' ईवाई ग्लोबल के पार्टनर संदीप खेतान का कहना है कि इस प्रकार की पहल से उन सभी कंपनियों का कारोबार प्रभावित होगा जो सरकारी क्षेत्र के साथ लेनदेन करती हैं। उन्होंने कहा, 'इससे बजट बनाने और संसाधन आवंटन संबंधी सरकार की प्रक्रिया बदल जाएगी और ऐसे में कंपनियों को उनके अनुरूप खुद को ढालना पड़ेगा।'

खेतान ने बताया कि हरेक बदलाव से संक्रमण की लागत बढ़ेगी लेकिन लंबी अवधि में इस पहल के फायदे से उससे निपटने में मदद मिलेगी। नांगिया का मानना है कि इसका सकारात्मक पहलू यह होगा कि भारत का वित्त वर्ष भी दुनिया के अधिकतर विकसित देशों की तरह हो जाएगा। उन्होंने कहा, 'भारतीय कंपनियों के साथ कारोबारी गतिविधियों में विदेशी कंपनियों की बढ़ती सहभागिता के मद्देनजर भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक अर्थव्यवस्था के अनुरूप ढालना आवश्यक हो गया है। इसके लिए मानकीकरण एवं एकरूपता पर ध्यान देने की जरूरत होगी।'
Keyword: वित्त वर्ष, लेखा, मानक, जीएसटी, कंपनी अधिनियम, आईटी अधिनियम, विशेषज्ञ, एसोचैम,
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