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सतर्कता के साथ करें स्वास्थ्य बीमा कंपनी का चयन

संजय कुमार सिंह /  May 07, 2017

हाल में जब न्यू इंडिया इंश्योरेंस (एनआईसी) ने अपनी मेडिक्लेम पॉलिसी पर प्रीमियम 20 प्रतिशत तक बढ़ाया था तो उसने इसके पीछे यह तर्क दिया कि उसके स्वास्थ्य बीमा दावों का अनुपात बहुत अधिक है। उसने जो वृद्घि की है, उसे इस तथ्य से भी सही ठहराया जा सकता है कि उसने पांच साल बाद ऐसा किया है। लेकिन क्या आपको पता है कि सार्वजनिक मंच पर उपलब्ध खास अनुपात आपको यह समझने में मददगार साबित हो सकते हैं कि कौन सी बीमा कंपनी द्वारा निकट भविष्य में अपना प्रीमियम बढ़ाने की अधिक आशंका रहेगी? खरीदारों को आजकल सही स्वास्थ्य बीमा योजना का चयन करने के लिए मात्रात्मक और गुणात्मक दोनों मानदंडों का इस्तेमाल करने की जरूरत है। 

 
इनकर्ड क्लेम रेशियो 
 
यह बीमा कंपनी द्वारा एक साल में प्राप्त शुद्घ प्रीमियम पर दिए गए कुल दावों का अनुपात है। सिक्योर नाउ इंश्योरेंस ब्रोकर के सह-संस्थापक एवं प्रबंध निदेशक कपिल मेहता ने कहा, 'उन बीमा कंपनियों से परहेज करें जिनका इनकर्ड क्लेम रेशियो बहुत ज्यादा या बहुत कम होता है।' बहुत ज्यादा इनकर्ड क्लेम रेशियो (मान लीजिए 100 प्रतिशत) ग्राहकों के लिए अनुकूल दिख सकता है, लेकिन इससे कुछ जोखिम भी जुड़े होते हैं। इससे संकेत देता है कि बीमा कंपनी अपने प्रीमियम के जरिये प्राप्त रकम की तुलना में दावे में अधिक रकम खर्च कर रही है। 
 
हालांकि इसका पूरी तरह से यह मतलब नहीं है कि बीमा कंपनी नुकसान उठाती है (बीमा कंपनियां निवेश के जरिये भी कमाई करती हैं और केवल अंडरराइटिंग लाभ पर ही निर्भर नहीं रहती हैं), लेकिन ऐसा हर समय नहीं चल सकता। पॉलिसीबाजार डॉटकॉम में स्वास्थ्य बीमा के प्रमुख ध्रुव सरीन कहते हैं, 'यदि इनकर्ड क्लेम रेशियो अधिक है तो इसकी संभावना रहती है कि बीमा कंपनी जल्द ही अपनी प्रीमियम दरों में संशोधन कर सकती है।' हालांकि कानून किसी कंपनी को तीन साल से पहले अपने प्रीमियम में बदलाव की अनुमति नहीं देते हैं। बहुत कम इनकर्ड क्लेम रेशियो (मान लीजिए 50 प्रतिशत से नीचे) यह संकेत देता है कि या तो कंपनी कुछ ही दावे निपटाती है या उसकी पॉलिसी महंगी है। सभी बीमा कंपनियों के इनकर्ड क्लेम रेशियो से संबंधित आंकड़े भारतीय बीमा एवं नियामक विकास प्राधिकरण (आईआरडीए) द्वारा हैंडबुक ऑफ इंश्योरेंस स्टेटिस्टिक्स में उपलब्ध कराए गए हैं, जो नियामक की वेबसाइट पर उपलब्ध है।
 
दावों के निपटान का अनुपात
 
यह ग्राहक के नजरिये से अन्य महत्त्वपूर्ण आंकड़ा है और इससे पता चलता है कि ग्राहकों द्वारा किए गए कुल दावों में से कितने प्रतिशत को बीमा कंपनी द्वारा एक साल में निपटाया गया। गणक के पास कंपनी द्वारा निपटाए गए कुल दावों की जानकारी होती है। गणना के तौर पर आपको दज किए गए कुल दावों पर नजर रखनी होगी। इसके लिए साल के शुरू में बकाया दावे देखें और साल के अंत में बकाया दावों को इनमें से घटाएं। 
 
एसबीआई जनरल इंश्योरेंस में उत्पाद विकास प्रमुख पुनीत साहनी कहते हैं, 'ऐसी स्वास्थ्य बीमा कंपनियों पर विचार करें जिनका दावा निपटान अनुपात 90 प्रतिशत से ऊपर रहा हो।' इसके अलावा यह सुनिश्चित करने के लिए पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े पर भी विचार करें कि बीमा कंपनी इस मोर्चे पर लगातार मजबूत स्थिति में रही है इससे संबंधित जानकारी बीमा कंपनियों की वेबसाइटों पर 'पब्लिक डिस्क्लोजर' सेक्शन में उपलब्ध होती है। 
 
जरूरत के मुताबिक लें पॉलिसी
 
युवा दंपती के लिए ऐसी पॉलिसी महत्त्वपूर्ण है जो मातृत्व अर्थात मैटरनिटी कवर मुहैया कराती हो। छोटे बच्चों वाले परिवारों को ऐसी पॉलिसी की जरूरत महसूस हो सकती है जिसमें ओपीडी (बहिरंग रोगी विभाग) कवर और मुफ्त नियमित जांच की सुविधा शामिल हो। वरिष्ठï नागरिकों के लिए ऐसी पॉलिसी अच्छी हो सकती है, जिसमें एंबुलेंस के शुल्क का भुगतान भी किया जाता हो।
 
प्रतीक्षा अवधि 
 
यह स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी चयन करने का एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। मेहता कहते हैं, 'ज्यादातर दावों को प्रतीक्षा अवधि के दौरान ठुकराया जाता है।' इस मामले में दो प्रकार की प्रतीक्षा अवधि होती है। एक प्रतीक्षा अवधि बीमारियों के नाम से संबंधित है। इसमें मुख्य रूप से ऐसी चिकित्सा स्थिति शामिल होती है, जिससे सुनियोजित ढंग से निपटा जा सकता है। इन बीमारियों में मोतियाबिंद, हर्निया, पथरी का इलाज, कूल्हा बदलना आदि शामिल हैं। इसके लिए बीमा पॉलिसी में 90 दिन से दो वर्ष के दायरे में प्रतीक्षा अवधि निर्धारित की जा सकती है। प्रतीक्षा अवधि का दूसरा प्रकार पहले से मौजूद बीमारियों से संबंधित है। इसमें प्रतीक्षा अवधि दो से चार साल तक अलग अलग हो सकती है। कम प्रतीक्षा अवधि वाली पॉलिसी का चयन करें।
 
सब-लिमिट यानी उप-सीमाएं
 
बीमा पॉलिसी खरीदते वक्त आपको उप-सीमाओं का ध्यान रखे जाने की जरूरत होगी। इसमें कमरे के किराए पर कोई सीमा नहीं होगी जिसमें अस्पताल में भर्ती होने के बाद हुए खर्च का लगभग 25 फीसदी शामिल है। सरीन कहते हैं, 'यदि आप अपनी जेब से स्वयं खर्च कर उच्च श्रेणी का कमरा चुनते हैं तो मामला आपको महंगा पड़ सकता है।' याद रखें कि जब आप उच्च श्रेणी का कमरा चुनते हैं तो हर प्रकार का खर्च बढ़ जाएगा साथ ही मैटरनिटी और सर्जिकल, ऑपरेशन रूम और आईसीयू कवरेज से संबंधित उप-सीमाओं आदि पर भी विचार करें।
 
आंशिक भुगतान (को-पेमेंट)
 
इस प्रावधान का मतलब है कि मरीज को अस्पताल में भर्ती होने के दौरान आए कुल बिल का कुछ हिस्सा चुकाना होगा। इस तरह के भुगतान की देनदारी सामान्य तौर पर दो तरह की परिस्थितियों में देखी जाती है। पहली, जब पॉलिसी वरिष्ठï नागरिकों को जारी की गई हो तो वह को-पेमेंट क्लॉज से जुड़ी हो सकती है। यदि आप को-पेमेंट क्लॉज से जुड़ी पॉलिसी खरीद रहे हैं तो इस बात का ध्यान रखें कि आपके द्वारा भुगतान का प्रतिशत बहुत ज्यादा न हो। आखिर में खर्च की तुलना करें। कई पॉलिसी कई तरह की सहूलियतें देती हैं, जिनसे प्रीमियम बढ़ जाता है। इन सहूलियतों पर गंभीरता से विचार करें और ऐसी पॉलिसी का चयन करें जो आपकी जेब के अनुकूल भी हो
Keyword: health, insurance, न्यू इंडिया इंश्योरेंस (एनआईसी),
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