Search BS HindiWeb         Follow us on 
Business Standard
Tuesday, June 27, 2017 05:50 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|
 
होम विशेष खबर

कुछ देशों में भारत से विदेशी निवेश बढऩा चिंता का सबब

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  May 07, 2017

भारत में होने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) में पिछले कुछ वर्षों में आई तेजी से हर कोई परिचित है। मनमोहन सिंह सरकार के अंतिम वित्त वर्ष 2013-14 में भारत में लगभग 24 अरब डॉलर का विदेशी निवेश हुआ था। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में नई सरकार आने के बाद पहले ही साल में एफडीआई प्रवाह 27 फीसदी उछाल के साथ 30 अरब डॉलर को भी पार कर गया था। उस समय यही माना गया था कि नई सरकार के आने से विदेशी निवेशक नई ऊर्जा से लबरेज हुए हैं। उसके अगले साल एफडीआई प्रवाह और अधिक तीव्र गति से बढ़ते हुए 30 फीसदी वृद्धि लेकर 40 अरब डॉलर तक पहुंच गया। 

 
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2016-17 के पहले नौ महीनों में भी एफडीआई प्रवाह 22 फीसदी की दर से बढ़ा है। भले ही पिछले दो वर्षों की तुलना में यह बढ़ोतरी थोड़ी कम है फिर भी यह वैश्विक स्तर पर सर्वाधिक ऊंची दरों में से एक है। लेकिन यह लेख भारत में होने वाले एफडीआई प्रवाह के बारे में न होकर भारत से बाहर जाने वाली एफडीआई निकासी के बारे में है। विदेश में होने वाले भारतीय निवेश पर ध्यान केंद्रित करें तो वास्तविक एफडीआई निकासी के बारे में एक रोचक पहलू पता चलता है जिसके गहन अध्ययन की जरूरत है। दरअसल मनमोहन सरकार के अंतिम साल में भी भारत से करीब 13.4 अरब डॉलर की निकासी हुई थी। वह राशि उस साल हुए कुल एफडीआई प्रवाह के आधे से भी अधिक थी। उस समय राजनीतिक पंडितों ने इसे मनमोहन सरकार के प्रति भारतीय उद्योग जगत के भरोसे में कमी के तौर पर देखने को कहा था।
 
ऐसे में कोई अचरज नहीं कि उसके अगले साल 2014-15 में एफडीआई प्रवाह बढऩे के बावजूद भारत से बाहर जाने वाली डॉलर निकासी केवल 6.73 अरब डॉलर ही रही थी। इस कमी में कुछ योगदान तो मुद्रा विनिमय दरों में आई गिरावट का भी रहा होगा लेकिन वास्तविक डॉलर निकासी में 50 फीसदी गिरावट को मोदी सरकार के प्रति उद्योग जगत का भरोसा बहाल होने की निशानी के तौर पर ही देखा गया था। लेकिन वह सिलसिला उसके बाद नहीं जारी रह पाया। 
 
वर्ष 2015-16 में भारत से बाहर जाने वाली एफडीआई निकासी 10.4 अरब डॉलर हो गई। इसी तरह वर्ष 2016-17 की अप्रैल-जनवरी अवधि के दौरान वित्त मंत्रालय के पास उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक एफडीआई निकासी 9.7 अरब डॉलर रही है। एक साल पहले की समान अवधि में 8.3 अरब डॉलर की एफडीआई निकासी के मुकाबले यह 17 फीसदी अधिक है। साफ है कि भारतीय उद्योग जगत पिछले कुछ वर्षों से विदेश में निवेश करना पसंद कर रहा है और इसमें लगातार तेजी भी आ रही है। हालांकि अपने आप में यह कोई चिंताजनक रुझान नहीं है लेकिन हमें यह समझना होगा कि इससे सरकार के प्रति उद्योग जगत के भरोसे में आ रही कमी उजागर हो रही है। मनमोहन सरकार के अंतिम वर्षों में इसके संकेत देखे भी जा चुके हैं। सवाल यह है कि मोदी सरकार के वजूद में आने के बाद जो प्रवृत्ति शिथिल हो गई थी वह समय बीतने के साथ अचानक फिर से मजबूत क्यों होने लगी है? आखिर इससे क्या संकेत मिलता है?
 
दूसरा, भारतीय कंपनियां अपना विदेशी निवेश जिन देशों में कर रही हैं, वह भी अपने आप में कई सवाल खड़ा कर रहा है। यह अजीब इत्तफाक है कि भारत में सर्वाधिक निवेश न केवल मॉरीशस और सिंगापुर के जरिये होता है बल्कि भारत से बाहर सर्वाधिक निवेश के मामले में भी ये दोनों देश ही सबसे आगे हैं। मॉरीशस से बाहर जाने वाले एफडीआई में लगातार बढ़ोतरी हो रही है और भारत एवं मॉरीशस के बीच हुई दोहरा कराधान मुक्त संधि में संशोधन के बाद भी यह सिलसिला बरकरार है। मॉरीशस से बाहर होने वाला एफडीआई प्रवाह 2013-14 में पांच अरब डॉलर था जो वर्ष 2014-15 में बढ़कर 9 अरब डॉलर हो गया था। वर्ष 2016-17 के पहले नौ महीनों में यह प्रवाह 13 अरब डॉलर तक पहुंच गया। सिंगापुर में भी एफडीआई निवेश के मामले में काफी हद तक यही प्रवृत्ति देखी गई है। पिछले चार वर्षों में मॉरीशस और सिंगापुर से होने वाला एफडीआई प्रवाह 44 से लेकर 55 फीसदी तक बढ़ गया है। भारत से इन दोनों देशों को हो रहे एफडीआई प्रवाह में भी ऐसा ही रुझान देखा जा रहा है। इन दोनों देशों को होने वाले एफडीआई प्रवाह में पिछले साल खास उछाल देखी गई। मनमोहन सरकार के अंतिम साल में भारत से बाहर होने वाले एफडीआई प्रवाह में मॉरीशस एवं सिंगापुर का हिस्सा 20 फीसदी हुआ करता था लेकिन मोदी सरकार के पहले दो वर्षों में यह बढ़कर 29-31 फीसदी हो गया। पिछले साल तो इसमें 58 फीसदी की जबरदस्त वृद्धि दर्ज की गई है। निश्चित रूप से इस रुझान का परीक्षण करने की जरूरत है ताकि एफडीआई प्रवाह की प्रकृति, उसकी मौलिकता और उसके स्थायित्व जैसे पहलुओं को समझा जा सके।
 
आखिर में, मॉरीशस और सिंगापुर के अलावा तीन अन्य देश भी भारत से बाहर हो रहे एफडीआई प्रवाह के आकर्षक निवेश स्थल के तौर पर अगली कतार में हैं। ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स, जर्सी और स्विट्जरलैंड भी भारत से बड़े पैमाने पर एफडीआई निवेश आकर्षित करते हैं। इनके अलावा अमेरिका, नीदरलैंड्स, संयुक्त अरब अमीरात, ब्रिटेन और रूस भी इस सूची में शामिल हैं। इस सूची को देखें तो यह काफी रोचक लगती है। हालांकि हमें निवेश स्थलों की इस सूची के बारे में तत्काल कोई भी धारणा बनाने से परहेज करना चाहिए। लेकिन सरकार को इनमें से कुछ निवेशों की प्रकृति की पड़ताल करने को लेकर चुप्पी नहीं साध लेनी चाहिए।
Keyword: india, FDI, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई),
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
Advertisements 
Cover from Natural Calamities. Buy Home Insurance
Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
  आपका मत
 क्या तय विनिवेश लक्ष्य को हासिल कर पाएगी सरकार?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS General News   Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.