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नीतिगत सुधार से ही रहेगा बाजार बरकरार

श्याम पोनप्पा /  May 07, 2017

यह बड़ा सवाल है कि क्या बेहतर नीतियों की मदद से बाजार की संभावनाओं का अधिक फायदा उठाया जा सकता है। इस संबंध में विस्तार से बता रहे हैं श्याम पोनप्पा

 
आखिर भारतीय प्रतिभूति बाजार में इस कदर निवेश क्यों आ रहा है? शायद भारतीय बाजार के आकार और तमाम कठिनाइयों और अनिरंतरताओं के बावजूद उसकी वृद्घि के चलते। क्या उच्च मूल्य वाले चर वांछित हैं? हां, अगर उनमें स्थायित्व हो क्योंकि बेहतर उत्पादकता के लिए ज्यादा पूंजी मौजूद है। वरना नहीं। सवाल यह है कि क्या बाजार की संभावनाओं का लाभ उठाने के लिए बेहतर नीतियां तैयार की जा सकती हैं। 
 
भारत का बाजार बड़ा है और वह कुछ हद तक अपनी गति से ही अपने लिए समृद्घि हासिल कर रहा है। जबकि कुछ नकदी की स्थिति भी इसकी एक वजह है। वर्ष 2016-17 में म्युचुअल फंड में कुल 3.43 लाख करोड़ रुपये का निवेश आया जो इससे पिछले वर्ष की तुलना में दोगुना था। यह पिछले पूरे दशक की अधिकतम राशि है। इक्विटी फंड में पिछले दो साल का पूरा घरेलू निवेश पूरी तरह विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआई) के स्तर को पार कर चुका है। इसके लिए कम एफपीआई और अधिक घरेलू निवेश वजह है। खुदरा निवेशकों में भी बढ़ोतरी हुई और गत तीन वर्ष में इनकी तादाद 2.86 करोड़ से बढ़कर 3.93 करोड़ हो गई। सरकार का मजबूत जनादेश और तेल कीमतों में गिरावट इसकी दो अन्य वजह रहीं। अब कुछ बड़ी कंपनियों की बेहतर आय और बढ़ता वैश्विक बाजार शुभ संकेत लेकर आए हैं। हालांकि यह आय मोटे तौर पर सुधरनी ही चाहिए लेकिन कई चुनौतियां बरकरार हैं। इनका संबंध फंसे हुए कर्ज, लौह और इस्पात, विनिर्माण, बिजली, दूरसंचार, परिवहन, कृषि आदि क्षेत्रों की ढांचागत समस्याओं से भी है। बुनियादी ढांचे और संस्थानों की निरंतर कमजोरी ने उत्पादकता को प्रभावित किया है। 
 
विभाजनकारी राजनीति के चलते कुछ सामाजिक दबाव भी हैं। दुनिया भर में अलग-थलग करने की प्रवृत्ति बढ़ी है और सरकारें भी अपने दायरे का विस्तार कर रही हैं। ऐसे संकट भी हैं जो खुद से पैदा किए गए हैं। इनका संबंध नीतिगत कमियों से है। दूरसंचार क्षेत्र, लोकलुभावनवाद, दूरसंचार, कोयला और बिजली क्षेत्र के न्यायिक आदेश ऐसे ही मामले हैं। उत्पादकता सुधार में भी कमी देखने को मिली है। ये सारे नकारात्मक घटनाक्रम हैं। प्रति व्यक्ति उत्पादकता में कमी ने सुधार की संभावना कम की है। ब्लूमबर्ग के मुताबिक अंतरराष्टï्रीय श्रम संगठन के अनुसार वर्ष 2017 में भारत में प्रति श्रमिक उत्पादन जर्मनी की तुलना में 20 गुना कम है। इसके बावजूद यूरोमॉनिटर, अंतरराष्टï्रीय मुद्रा कोष, लंदन स्थित आर्थिक एवं कारोबारी शोध केंद्र तथा प्राइसवाटरहाउस कूपर्स को भारत से कहीं बेहतर उम्मीद है। 
 
यूरोमॉनिटर के मुताबिक भारत का उपभोक्ता बाजार वर्ष 2030 तक दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बाजार होगा। तब तक यह जापान और जर्मनी को पीछे छोड़ चुका होगा। स्मार्ट फोन, वाहन और टिकाऊ वस्तुओं मसलन टेलीविजन, फ्रिज और एयर कंडिशनर आदि की मांग बढ़ेगी। उदाहरण के लिए भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्मार्टफोन बाजार है। अमेरिका और चीन उससे आगे हैं। वाहन क्षेत्र में हम पांचवें स्थान पर हैं और 2016 में देश में 33 लाख कारें बिकीं।
 
लेकिन यूरोमॉनिटर देश में बढ़ती असमानता को लेकर हमें आगाह भी करता है। गिनी सूचकांक वर्ष 2011 के 39.9 फीसदी से बढ़कर 2016 में 41.6 फीसदी हो गया और 2030 तक इसके बढ़कर 43.4 फीसदी होने की उम्मीद है। सीईबीआर के अनुमान के मुताबिक वर्ष 2028 तक भारत का सकल घरेलू उत्पाद चीन और अमेरिका के बाद सबसे अधिक होगा। प्राइसवाटरहाउस कूपर्स का अनुमान है कि 2050 तक भारत चीन के बाद दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बन जाएगा। अमेरिका और इंडोनेशिया क्रमश: तीसरे और चौथे स्थान पर होंगे। लेकिन वह साथ ही यह भी कहता है कि उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों को अपने संस्थानों और बुनियादी ढांचे में अहम सुधार करना होगा। तभी वे दीर्घावधि की क्षमताओं का लाभ उठा सकेंगे। 
 
क्या हमारी नीतियां इस बाजार संभावना का लाभ उठाने में मददगार हो सकती हैं? जरा विकल्पों पर विचार कीजिए। एक रुख है मुक्त शोषण का जिसमें इस बात पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता कि मुनाफे और स्वामित्व का वितरण देसी है या विदेशी। मूल्य निर्धारण केवल मांग और आपूर्ति के आधार पर होता है। सरकार या किसी अन्य प्राधिकार का कोई नियमन नहीं होता। दूसरा छोर वह है जहां सरकार ही सबकुछ तय करती है। यह तरीका भी विफल रहा है। तीसरा विकल्प मिलाजुला है। इसमें खुले बाजार की नीतियों के साथ-साथ समुचित नियमन भी अपनाया जाता है। आदर्श स्थिति में नीतियां लंबी अवधि को ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए जिन तक आमतौर पर सबकी समान पहुंच हो। नियमन वहां आवश्यक है जहां नेटवर्क अर्थशास्त्र लागू होता है और सीमित कारोबारी होते हैं। बिजली और संचार क्षेत्र इसके उदाहरण हैं। हमारे यहां ऐसा नहीं है क्योंकि वास्तविक परिस्थितियां अलग हैं और लोकलुभावनवाद के चलते लाभकारी नीतियां नहीं बन पा रही हैं। स्वामित्व के मामलों में भी हमारी नीतियां कई बार अलग हैं और कई बार ये समस्या पैदा करती हैं। 
 
उदाहरण के लिए भारी उद्योग अथवा बड़ी इलेक्ट्रॉनिक्स विदेशी कंपनियों को अक्सर सरकारी मदद मिलती है। भारतीय उद्यमियों को ऐसी शुरुआत नहीं मिलती क्योंकि पूंजी तक उनकी पहुंच सीमित होती है और लागत ज्यादा आती है। एक बात यह भी है कि हमारे यहां विनिर्माण क्षेत्र के स्टार्टअप के लिए उचित माहौल नहीं है। जबकि वाणिज्यीकरण, वित्तीय मदद, उत्पादन और खरीद इसमें मदद कर सकते हैं। हमारे यहां पूरा ध्यान शुरुआती स्टार्टअप अथवा छोटे और मझोले उद्यमों तक सीमित है। ऐसे में उनका स्तर व्यापक बनाने की दिशा में कोई प्रयास नहीं हो पाता है। 
 
इस बीच बेहतर बुनियादी ढांचे की कमी हमारी सबसे बड़ी दिक्कत बनी हुई है। इसमें सुधार के लिए दूरदर्शी नीति, पूंजी आदि कई चीजों की आवश्यकता है। यह पूरी प्रक्रिया एक चुनावी चक्र में निपटने वाली भी नहीं है। ऐसे में अक्सर बेहतर कदमों को लोकलुभावन कदमों के लिए परे कर दिया जाता है। इस क्षेत्र में सामूहिक और प्रतिबद्घ प्रयासों की आवश्यकता है। दूरसंचार और ब्रॉडबैंड को इसके उदाहरण के रूप में लिया जा सकता है जहां स्पेक्ट्रम की नीलामी एक बार फिर संकट में है। विभिन्न सेवा प्रदाता कम राजस्व और पुरानी नीलामी के कर्ज के बोझ तले जिंदा हैं। 
 
सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में दो अल्ट्रा मेगा पॉवर परियोजनाओं में क्षतिपूर्ति शुल्क व्यवस्था के विरुद्घ निर्णय दिया है। इनमें से एक टाटा की 4,000 मेगावॉट क्षमता वाली मुंद्रा परियोजना है और दूसरा 4,620 मेगावॉट क्षमता वाली अदाणी की परियोजना है। पुराना टैरिफ बरकरार रखा जाता तो पांच बिजली खरीदने वाले राज्यों को औसत से कम कीमत चुकानी पड़ती जो मौजूदा बाजार मूल्य से कम होती। परियोजनाओं के अव्यवहार्य होने का अर्थ है उनका फंसे हुए कर्ज में तब्दील हो जाना। इसका असर बैंकों पर भी पड़ेगा। बुनियादी ढांचे को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उसके बाद लक्ष्य हासिल करने के लिए नीति बनानी चाहिए। मसलन बिजली परियोजनाओं से उत्पन्न बिजली का मूल्य उचित हो, दूरसंचार में सेवा का उचित मूल्य हो। जब तक यह सब नहीं किया जाएगा तब तक पूरी संभावनाओं का दोहन मुश्किल है। 
Keyword: sebi, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी),
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