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आरबीआई के पाले में

संपादकीय /  May 07, 2017

देश के बैंकिंग क्षेत्र की फंसे हुए कर्ज की समस्या को लेकर आया नया नियमन ही मौजूदा परिस्थितियों में सबसे बेहतर हल साबित हो सकता है। बैंकिंग नियमन अधिनियम में संशोधन का अध्यादेश भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को अधिकार देता है कि वह बैंकों को देनदारी चूकने वाली कंपनियों को दिवालिया करने की प्रक्रिया शुरू करने को कह सके। आरबीआई फंसे कर्ज पर निर्णय भी ले सकता है। फंसे हुए कर्ज की समस्या का आकार सात लाख करोड़ रुपये का है और अगर पुनर्गठित परिसंपत्ति को जोड़ दिया जाए तो यह राशि 10 लाख करोड़ रुपये हो जाएगी। इसमें अधिकंाश हिस्सा सरकारी बैंकों का है। फंसे हुए कर्ज से निपटने के अलावा बैंकिंग नियामक एक निगरानी समिति बनाएगा जो बैंकों और संयुक्त ऋणदाता मंचों को फंसे हुए कर्ज से निपटने का तरीका बताएगा। 

 
जनवरी 2014 के बाद से आरबीआई के फंसे कर्ज से निपटने के प्रयास नाकाम थे। फंसे कर्ज के मामले में बैंक को अधिक ताकत की आवश्यकता थी। केंद्रीय बैंक की अधिकांश योजनाएं मामूली सफलता हासिल करके रह गईं। जोखिम यह भी था कि बैंकर द्वारा लिए गए निर्णय पर जांच अधिकारी या न्यायपालिका सवाल उठा सकते हैं। अब आरबीआई द्वारा दी गई राहत के बाद बैंकर अगले कुछ महीनों में सक्रियता दिखा सकते हैं। दूसरी बात, ऋणदाताओं के संयुक्त मंच में आम सहमति नहीं है। इसलिए कम जोखिम वाले छोटे बैंक अक्सर प्रवेश प्रक्रिया में ढिलाई बरतते हैं। आरबीआई ने इस समस्या से निपटने का मन बना लिया है और सुधार योजना को लागू करने तथा उसे अंतिम रूप देने की पूरी जिम्मेदारी ऋणदाताओं पर डाल दी है। अब आकार में 60 फीसदी ऋणदाता तथा तादाद में 50 फीसदी ऋणदाता सहमत होंगे तो सबको बात माननी होगी। पहले यह बाध्यता क्रमश: 75 फीसदी और 60 फीसदी थी। 
 
इसके बावजूद कुछ अहम मुद्दे हैं जिन पर और अधिक स्पष्टïता की आवश्यकता है। इनके चलते ही शेयर बाजार में बैंकिंग शेयरों के दामों में श्ुाक्रवार को गिरावट आई जबकि पहले वे इस योजना को लेकर आशान्वित नजर आ रहे थे। उदाहरण के लिए आरबीआई को निगरानी समितियों की स्थापना करनी होगी जिसके लिए अनुभवी अधिकारियों को चिह्निïत करना होगा और उनको तैनात करना होगा। यही लोग ऐसे निर्णय ले सकेंगे। यहां मुद्दा यह है कि क्या ये समितियां इस स्थिति में रहेंगी कि तनावग्रस्त परिसंपत्ति के संपूर्ण या कुछ हिस्से को बेचने का निर्णय कर सकें, वह भी कमजोर आर्थिक माहौल में। अधिकांश खरीदार अब तक केवल परिसंपत्ति का वही हिस्सा खरीदने में रुचि दिखाते आए हैं जो मुनाफा दे सके। यह देखने वाली बात होगी कि क्या समिति इसका हल तलाश कर पाती है?
 
यह सच है कि फंसा हुआ कर्ज ऐसी समस्या है जिसका हल तत्काल तलाश करना आवश्यक है लेकिन अगर सरकार सरकारी बैंकों की समस्याओं पर व्यापक दृष्टिï डालें तो कहीं अधिक बेहतर होगा। आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने इस संबंध में एक विस्तृत खाका पेश किया है। इसका कुछ हिस्सा ऐसा है जिस पर विचार किया जाना चाहिए। आचार्य ने फंसी परिसंपत्ति के निदान के लिए पांच तरीके बताए हैं। पहला, सेहतयाब सरकारी बैंक निजी पूंजी जुटा सकते हैं और सरकार का बैंकों में पूंजी डालने का दबाव कम हो सकता है। दूसरा, कुछ बैंक जो बेहतर स्थिति में हैं वे अपनी कुछ हिस्सेदारी बेच सकते हैं। तीसरा, समावेशन की मदद से बैंकों की संख्या कम की जा सकती है लेकिन उनकी हालत दुरुस्त हो सकती है। चौथा, कमतर पूंजी वाले बैंकों के लिए योजना तैयार की जा सकती है और पांचवां सरकार को बैंक पुनर्गठन के दौरान अपनी हिस्सेदारी कम करने पर विचार करना चाहिए। ये अच्छे सुझाव हैं जिनकी मदद से देश के वित्तीय क्षेत्र की तस्वीर बदली जा सकती है।
Keyword: bank, loan, debt, भारतीय रिजर्व बैंक,
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