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महत्त्वाकांक्षा, व्यवहार्यता और अक्षमता

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  May 05, 2017

चीन ने जर्मनी के राइन प्रांत के डुइसबर्ग, ईरान की राजधानी तेहरान और यहां तक कि लंदन तक ट्रेन सेवा शुरू कर दी है। इसे लेकर खासा उत्साह देखने को मिला। इसे चीन की 'वन बेल्ट, वन रोड' (ओबीओआर) योजना का शुरुआती प्रमाण माना जा सकता है। इसके तहत उसका इरादा परिवहन नेटवर्क और आर्थिक एकीकरण करने का है। तेहरान सेवा के बारे में कहा जा रहा है कि वहां से कुछ दुर्गम मार्गों से होते हुए 14 दिन में चीन के पूर्वी इलाके तक पहुंचा जा सकता है। लेकिन एक औसत कंटेनर जहाज भी ईरान की खाड़ी में बंदर अब्बास से शांघाई लगभग इतने ही वक्त में पहुंच सकता है। जहाज से परिवहन की लागत भी कम आएगी क्योंकि समुद्री यात्रा सस्ती है। डुइसबर्ग से चीन तक चलने वाली ट्रेन पानी के जहाज की तुलना में तेजी से सफर करेगी। लेकिन ये माल ढुलाई करने वाली ट्रेनें प्रति ट्रेन 50 कंटेनर से कम ही ढोती हैं जबकि कंटेनर जहाज 12,000 तक कंटेनर लेकर यात्रा करते हैं। गत वर्ष चीन ने 1,700 टे्रन यूरोप को भेजीं। इनके जरिये जितना माल ढोया गया उतना तो सात या आठ कंटेनर जहाज के माध्यम से ही पहुंचाया जा सकता था। 

 
इसके बावजूद पूरी दुनिया न केवल चकित है बल्कि चिंतित भी है। इसका आकार, इससे जुड़ी सामरिक महत्त्वाकांक्षा और ओबीओआर परियोजना की गति इसकी वजह है। जानकारी के मुताबिक करीब 60 देश छह विशालकाय आर्थिक गलियारे बनाने को तैयार हैं जो चीन से विभिन्न दिशाओं में होंगे। यूरोप को लेकर भी उसने अहम समुद्री बढ़त हासिल की है। ग्रीस का दूसरा सबसे बड़ा बंदरगाह अब चीन के पास है। कहा जा रहा है कि चीन अपने कुछ कम लागत वाले विनिर्माण के काम को कम लागत वाले देशों में पुनस्र्थापित करेगा। यह काम इन गलियारों की मदद से किया जाएगा। वह अपनी बकाया निर्माण क्षमता का इस्तेमाल इस्पात जैसी चीजें बनाने में करेगा और दुनिया के अन्य हिस्सों को चीन से जोडऩे का काम करेगा ताकि क्षेत्र में चीन के तकनीकी व अभियांत्रिकी मानक स्थापित किए जा सकें। इससे चीन की मुद्रा रेनमिनबी के इस्तेमाल को बढ़ावा देने में भी मदद मिलेगी और आधा दर्जन देशों में वह अपनी बुलेट ट्रेन का मुजाहिरा कर सकेगा। यह चीन के लिए तो ठीक है लेकिन उन 60 देशों का क्या? 
 
थाईलैंड चीन को उस उच्च गति वाली ट्रेन के लिए मना कर चुका है जिसे सिंगापुर के दक्षिणी इलाके तक जाना था। श्रीलंका को लगा कि चीनी बंदरगाह और उससे जुड़ी परियोजनाओं के चलते उसने काफी कर्ज ले लिया है लेकिन चीन वहां अपनी राह बना चुका है। कई अफ्रीकी देश और दक्षिण अमेरिकी देशों को पछताना पड़ चुका है क्योंकि चीन के खनन उद्योग में निवेश ने उनको नुकसान पहुंचाया है। पाकिस्तान जैसे पिछलग्गू देश में भी कुछ परियोजनाओं की व्यवहार्यता पर प्रश्न किए जा रहे हैं। ये परियोजनाएं 46 अरब डॉलर के प्रस्तावित चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा योजना में होने वाले निवेश का हिस्सा हैं। ग्वादर से काराकोरम के रास्ते सिनकियांग तक प्रस्तावित रेलवे और पाइप लाइन परियोजना का बहुत अधिक तुक नहीं है। संभावित यातायात और लागत के मोर्चे पर इस पर सवाल हैं। लेकिन इनके बावजूद ओबीओआर चल रही है।  
 
ओबीओआर में भारत की रुचि नहीं है। रूस भी बहुत उत्साहित नहीं है लेकिन उसे चीन के निवेश की आवश्यकता है इसलिए उसने उच्चगति वाले रेल मार्ग पर सहमति जताई है। अकेला भारत पूरी योजना के खिलाफ है। इसके लिए कुछ हद तक पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की संप्रभुता का मुद्दा जिम्मेदार है जहां से यह गलियारा गुजरेगा। भारत, म्यांमार और भारत-बांग्लादेश के जरिये दक्षिण-पश्चिम चीन तक परिवहन संपर्क को लेकर भी उत्साहित नहीं है। चीन भारत की समुद्री शक्ति का मुकाबला करने के लिए वहां गहरे समुद्र में बंदरगाह बनाना चाहता है। भारत के लिए अच्छा होगा कि वह अपना क्षेत्रीय संचार विकसित करे। लेकिन इस राह में अक्षमता आड़े आएगी। ईरान का चाबहार बंदरगाह हमें अफगानिस्तान और मध्य एशिया में प्रवेश की राह दे सकता था लेकिन वहां कोई प्रगति नहीं है। म्यांमार के सित्तवे में भारत निर्मित बंदरगाह की मदद से पूर्वोत्तर में संचार और फिर नदी के जरिये संचार का काम आधा हुआ है लेकिन वह बेकार है क्योंकि मिजोरम में अंतिम संपर्क सड़क अभी बननी है। म्यांमार से थाईलैंड और आगे दक्षिण पूर्व एशिया तक सड़क और रेल संचार को लेकर काफी बात हो चुकी है लेकिन हकीकत में कुछ नहीं हो सका है। अगर हम नहीं चाहते कि अहम बाजारों के बीच हम अलग-थलग पड़ जाएं तो हमें शायद चीन से कहना चाहिए कि वह हमारे लिए भी संचार परियोजना शुरू करे।
Keyword: china, London, German, train,
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