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देसी फंडों का निवेश बढऩे पर भी एफआईआई का आधिपत्य कायम

समी मोडक / मुंबई May 05, 2017

देसी इक्विटी में म्युचुअल फंडों के बढ़ते महत्व के बावजूद बाजार की दिशा के लिहाज से विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) का आधिपत्य अभी भी बना हुआ है। एफआईआई और म्युचुअल फंडों के तीन महीने के निवेश का विश्लेषण करने से पता चलता है कि बेंचमार्क बीएसई सेंसेक्स एफआईआई की चाल पर ज्यादा कमाल दिखाता है। मार्च में समाप्त तीन महीने की अवधि में एफआईआई ने 44,220 करोड़ रुपये का निवेश किया और सेंसेक्स में 11 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज हुई। दिसंबर 2016 में समाप्त तिमाही में विदेशी निवेशकों ने 31,222 करोड़ रुपये निकाले थे और सेंसेक्स 4 फीसदी टूटा था जबकि म्युचुअल फंडों ने 32,083 करोड़ रुपये का निवेश किया था। इसी तरह फरवरी 2016 में समाप्त तीन महीने में भारतीय बाजार 12 फीसदी टूटा था जबकि म्युचुअल फंडों ने 17,818 करोड़ रुपये का निवेश किया था। एफआईआई ने इस अवधि में करीब 20,000 करोड़ रुपये निकाले थे।
 
अगर हम साल 2014 से (जब म्युचुअल फंड वर्चस्व वाला निवेशक था) एफआईआई और म्युचुअल फंडों के तीन महीने या छह महीने के निवेश की तुलना करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि बाजार का रिटर्न विदेशी निवेश से ज्यादा सहसंबंध दिखाता है। आईसीआईसीआई सिक्योरिटीज के उपप्रमुख (शोध) रवि सुंदर मुत्थुकृष्णन ने कहा, एफआईआई मोटे तौर पर गुणवत्ता वाले शेयरों में निवेश करते हैं और मूल्यांकन के प्रति बहुत ज्यादा सचेत नहीं होते। देसी निवेशक मूल्यांकन को लेकर ज्यादा सतर्क होते हैं। ये चीजें उन्हें कॉन्ट्रा खरीदार बनाता है, इसी वजह से वे मजबूत खरीदार के तौर पर तब उभरते हैं जब एफआईआई की तरफ से भारी बिकवाली होती है। एफआईआई लार्जकैप पसंद करते हैं क्योंकि वे अपने पोर्टफोलियो में स्थिरता चाहते हैं। इसलिए विदेशी निवेश का सूचकांक की चाल में देसी निवेशकों के मुकाबले ज्यादा प्रत्यक्ष असर दिखता है।
 
साल 2015 व 2016 में देसी फंड मजबूत खरीदार थे, लेकिन बेंचमार्क सूचकांक स्थिर बने रहे। साल 2015 में म्युचुअल फंडों ने 72,199 करोड़ रुपये का निवेश किया, लेकिन बाजार पांच फीसदी टूट गया और विदेशी निवेश सुस्त बना रहा। साल 2016 में बाजार बिना बदलाव के बंद हुआ, म्युचुअल फंडों ने 48,170 करोड़ रुपये का निवेश किया क्योंकि एफआईआई की तरफ से खरीदारी का समर्थन नहीं मिल रहा था।
 
डीएसपी ब्लैकरॉक म्युचुअल फंड के इक्विटी प्रमुख अनूप माहेश्वरी ने कहा, सबसे अच्छा संयोजन वह होता है जहां एफआईआई व म्युचुअल फंड सकारात्मक हों। अगर आप पिछले वर्षों पर नजर डालें तो पता चलेगा कि जब दोनों खरीदारी करते थे तो बाजार का प्रदर्शन बेहतर होता था। लेकिन ज्यादातर समय दोनों अलग-अलग दिखते रहे हैं। हम उम्मीद कर रहे हैं कि यह ऐसे सालों में एक है जब दोनों का रवैया सकारात्मक है।
 
साल 2017 में अब तक एफआईआई ने करीब 42,000 करोड़ रुपये निवेश किया, वहीं म्युचुअल फंडों ने 21,000 करोड़ रुपये से ज्यादा के शेयर खरीदे और इस तरह से सेंसेक्स में 13 फीसदी की उछाल दर्ज हुई। फरवरी व मार्च में मजबूत विदेशी निवेश के बीच बाजार में अच्छी मासिक तेजी दर्ज हुई। अप्रैल में रिटर्न सुस्त हो गया क्योंकि विदेशी निवेश में सुस्ती रही, हालांकि म्युचुअल फंड मजबूत खरीदार बने रहे।
 
एक फंड मैनेजर ने कहा, एफआईआई निवेश मोटे तौर पर वैश्विक जोखिम व जोखिम विहीन माहौल पर निर्भर करता है। इसका मतलब यह है कि जब माहौल सकारात्मक होता है तो वे एकमुश्त निवेश करते हैं और जब माहौल खराब होता है तो वे बड़े पैमाने पर बिकवाली करते हैं। यह प्रत्यक्ष तौर पर बाजार को प्रभावित करता है। मुत्थुकृष्णन ने कहा, एफआईआई अभी भी बड़े निवेशक हैं और इनका वर्चस्व बना रहेगा। एक फंड मैनेजर ने कहा, म्युचुअल फंड हालांकि लगातार निवेश के साथ मजबूत ताकत बन रहे हैं। शायद एक या दो साल बाद रुख अलग नजर आएगा, जब देसी फंड बाजार को दिशा देने के लिहाज से ज्यादा प्रभावशाली होंगे।
Keyword: share, market, sensex, बीएसई, कंपनी, शेयर,,
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