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एनपीए का समाधान होगा आसान

बीएस संवाददाता / मुंबई May 05, 2017

बैंकरों का कहना है कि देश में फिलहाल समाधान प्रक्रियाओं के लिए उपयुक्त माहौल है। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की चेयरमैन अरुंधति भट्टïाचार्य ने कहा, 'बैंकिंग नियमन कानून में संशोधन, इनसॉल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी कोड लागू करने और एसएआरएफएईएसआई ऐंड डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल ऐक्ट्ïस में संशोधन से एनपीए समस्या का संतोषजनक समाधान तलाशने के लिए सरकार की मजबूत प्रतिबद्घता का पता चलता है।'
 
भट्टïाचार्य ने कहा, 'स्पष्टï जनादेश के साथ आरबीआई को मिली मजबूती से एनपीए के प्रभावी समाधान के लिए विभिन्न हितधारकों को प्रेरित करने में मदद मिलेगी। देश और उसके बैंकिंग तंत्र तेज बनाए जाने और इन प्रावधानों का लाभ उठाने के लिए निर्णायक बनाए जाने की जरूरत है।' देश के सबसे बड़ी निजी क्षेत्र के ऋणदाता आईसीआईसीआई बैंक की प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी चंदा कोछड़ ने कहा है कि इन संशोधनों से समाधान प्रक्रिया शुरू होगी और एक बार जब कंपनी को समाधान का मजबूत रास्ता मिल जाए तो बैंकिंग व्यवस्था के लिए राह आसान होगी। 
 
कोछड़ ने कहा, 'यह और अधिक टूल्स के साथ आगे आने का सवाल नहीं है। जिस पर जोर दिए जाने की जरूरत है, वह यह है कि निगरानी समितियों का क्षेत्राधिकार बढ़ाया जाए और इन समितियों को कड़े निर्णय लेने के लिए सक्षम बनाया जाए। जब निर्णय ले लिया गया है तो यह महत्त्वपूर्ण है कि सभी बैंक मिलकर उस निर्णय पर अमल करें और समयबद्घ ढंग से प्रक्रिया के समाधान पर जोर दें।' बैंकरों के अनुसार अधिक से अधिक निगरानी समितियां बनाई जानी चाहिए और उन समितियों में अधिक सदस्य शामिल होने चाहिए। मौजूदा समय में ऐसी समिति में सिर्फ दो सदस्य हैं। 
 
इन समाधान प्रक्रियाओं में एक खास चुनौती यह है कि यह जरूरी नहीं है कि बैंकों को उनके द्वारा खरीदी गई परिसंपत्तियों के लिए खरीदार मिल ही जाएं। यह उन प्रमुख वजहों में से एक है जिनसे आरबीआई की पिछली पुनर्गठन पहल (जिसमें बैंकों ने डेट को इक्विटी में तब्दील किया) काफी हद तक विफल रही थी। कोछड़ ने कहा, 'समाधान अलग अलग मामलों के लिए अलग अलग तरह का होगा। यह जरूरी नहीं है कि हरेक मामले में पूरी कंपनी को बेच दिया जाए। नकदी लाने के लिए गैर-प्रमुख परिसंपत्तियों को बेचा जा सकेगा। इसका यह भी मतलब हो सकता है कि मौजूदा ऋण ही पुनर्गठन करना।'
 
उन्होंने कहा कि यहां तक कि खरीदार उपलब्ध होने के बाद भी, सभी कंसोर्टियम सदस्यों द्वारा समय पर प्रतिक्रिया नहीं दिखाई जा सकती है जिससे प्रक्रिया प्रभावित होगी। पिछले साल दिसंबर तक 38 सूचीबद्घ बैंकों का फंसा हुआ कुल कर्ज 6.96 लाख करोड़ रुपये था। यदि इसमें कम से कम 2.5 लाख करोड़ रुपये की पुनर्गठित आस्तियां जोड़ दी जाएं तो फंसी हुई कुल आस्तियां 9.5 लाख करोड़ से अधिक हैं। कुछ पर्यवेक्षकों का यह भी कहना है कि व्यवस्था में कुल दबावग्रस्त परिसंपत्तियां कम से कम 12 लाख करोड़ रुपये की हो सकती हैं। बैंकों का कहना है कि इसमें से लगभग 40 प्रतिशत प्रमुख 40-50 खातों से जुड़ी हुई हैं। उद्योग दिग्गज इसे लेकर भी सहमत हैं कि वाकई एक ठोस समाधान प्रक्रिया और कुछ सख्त कदम उठाए जाने की जरूरत महसूस की जा रही है। हालांकि आरबीआई को उद्योगपतियों पर प्रत्यक्ष रूप से निर्भर रहने के बजाय इन समस्याओं के समाधान पर स्वयं जोर देना चाहिए।
Keyword: bank, loan, debt, भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई),
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