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फंसे कर्ज पर रिजर्व बैंक को अब ज्यादा अधिकार

अरूप रायचौधरी, दिलाशा सेठ और अभिजीत लेले / नई दिल्ली/मुंबई May 05, 2017

कर्ज चुकाने में नाकाम रही कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए रिजर्व बैंक को अब व्यापक अधिकार मिल गए हैं। राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने बैंकिंग नियमन कानून में संशोधन से जुड़े अध्यादेश को मंजूरी दे दी है। इससे केंद्रीय बैंक अब बैंकों को डिफॉल्टर कंपनियों को दिवालिया घोषित करने की प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दे सकता है और फंसे कर्ज की समस्या से निपटने में बैंकों की तरफ से फैसला ले सकता है। 

 
सरकार का मानना है कि नए कदम से बैंकों के फंसे 6 लाख करोड़ से अधिक के कर्ज के समाधान की प्रक्रिया तेज करने में मदद मिलेगी। सरकार ने मंजूरी के बाद शुक्रवार को इस अध्यादेश को अधिसूचित कर दिया और यह तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है। अब केंद्रीय बैंक दिवालिया कानून के तहत डिफॉल्टर कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए बैंकों को आदेश दे सकता है। कर्जदार संपत्तियों के बारे में फैसला करने का भी केंद्रीय बैंक को अधिकार मिल गया है। रिजर्व बैंक निगरानी समितियां बनाएगा जो कर्जदार संपत्तियों से निपटने के लिए बैंकों और संयुक्त ऋणदाता फोरम को निर्देश देंगी।
 
बैंकिंग अधिनियम की धारा 35 ए में दो धाराओं के जरिये इन अधिकारों को परिभाषित किया गया है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पत्रकारों से कहा कि खास कर्जदार परिसंपत्तियों के मामले में रिजर्व बैंक को अधिकार दिए जाने जरूरी थे। सरकार को शक था कि धारा 35 ए की परिभाषा के दायरे में ये अधिकार आएंगे या नहीं। लिहाजा रिजर्व बैंक को इस सिलसिले में अधिकार देना जरूरी समझा गया। जेटली ने कहा कि सरकार और केंद्रीय बैंक इस मसले से जुड़े बैंकों और कंपनियों के साथ बातचीत कर रहे थे। यह फैसला इसलिए लिया गया कि इससे बैंक वाणिज्यिक रूप से तुरंत आवश्यक फैसले ले सकेंगे। रिजर्व बैंक का फैसला सभी बैंकों को मानना होगा। 
 
यह पूछे जाने पर कि सरकार अब बैंकों के व्यापार फैसलों में आवश्यक रूप से दखल देगी, जेटली ने कहा कि यह बंटवारा नहीं है। रिजर्व बैंक कामकाज देखता है, इसलिए बैंकों की मजबूती बनाए रखने केंद्रीय बैंक के कामकाज का एक हिस्सा है। उन्होंने कहा कि रिजर्व बैंक कर्जदार संपत्तियों की सूची बना रहा है। सरकार का मकसद भारी भरकम 35-40 कर्जदार संपत्तियों की प्रगति पर निगरानी रखना है। उन्होंने कहा कि अध्यादेश का उद्देश्य यह है कि मौजूदा स्थिति लगातार नहीं चल सकती। एक गतिरोध बन गया था जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा नहीं था, इसलिए इस गतिरोध को तोडऩे की जरूरत थी।
 
वित्त मंत्रालय के प्रमुख आर्थिक सलाहकार संजीव सान्याल ने कहा कि निगरानी समितियां तीन काम कर सकती हैं। एक, उन ऋणदाताओं को रोकना जो इस प्रक्रिया में शामिल नहीं हो रहे। दूसरा, समझौते के बाद उसे लागू कराना और तीसरा एक बार जब निगरानी समिति किसी कर्ज का मसला हल कर देगी तो बैंकों की पुरानी समस्या खत्म हो जाएगी कि भविष्य में उनके फैसले की जांच हो सकती है। 
 
कर्जदार संपत्तियों वाली कंपनियों के दिवालिया होने की प्रक्रिया कानून के अनुसार होगी। वित्त मंत्री ने कहा कि भ्रष्टïाचार निवारक कानून में भी संशोधन किया जाएगा जिससे कि सरकारी बैंकों के अधिकारियों को अपने वाणिज्यिक फैसले के लिए जांच एजेंसियों की पूछताछ से राहत मिल जाए। उल्लेखनीय है कि सरकारी बैंक कर्जदार संपत्तियों की सार्वजनिक नीलामी करेंगे और नकदी संपन्न सरकारी उपक्रमों को इनमें हिस्सा लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। वित्तीय सेवा सचिव अंजलि छिब दुग्गल ने कहा कि अगर कोई सरकारी उपक्रम ऐसी संपत्तियां खरीदता है तो केंद्र सरकार उसमें कोई दखल नहीं देगी।
 
इस्पात क्षेत्र को भी मिलेगी मजबूती
 
बैंकिंग व्यवस्था में गैर-निष्पादित आस्तियों की समस्या को दूर करने के लिए सरकारी प्रयास का इस्पात क्षेत्र को भी लाभ मिलने की संभावना है। इस्पात मंत्रालय को चालू वित्त वर्ष 2017-18 के अंत तक 3 लाख करोड़ रुपये की एनपीए खत्म होने का अनुमान है। बैंकों द्वारा भी दबाव से जूझ रही कंपनियों को मदद प्रदान करने के लिए विभिन्न पुनर्गठन योजनाओं के तहत कई सुविधाएं मुहैया कराए जाने की संभावना है। 
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