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असरदार स्वास्थ्य देखभाल की चाह पूरा करेगी किफायती दवा की राह

मुद्रा मंत्र
सुबीर रॉय /  May 04, 2017

सरकार ने बड़ी संख्या में औषधि फॉर्मूले को आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची में शामिल करने के बाद ऐसे संकेत दिए हैं कि वह चिकित्सकों के लिए दवाओं के जेनेरिक या मॉलेक्यूलर नाम ही लिखना अनिवार्य करने के बारे में सोच रही है। इसका मतलब है कि चिकित्सकों को दवाओं के ब्रांड नाम की जगह उनके फॉर्मूले का नाम ही पर्ची पर लिखना होगा। जैसे कि चिकित्सक को सिफ्रान ब्रांड वाली दवा न लिखकर उसका फॉर्मूला नाम सिप्रोफ्लॉक्सेसिन ही लिखना होगा। केंद्रीय बजट पेश करते समय ही सरकार की ऐसी मंशा देखने को मिली थी। 

 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बात पर जोर दे चुके हैं कि पर्ची पर महंगे ब्रांड वाली दवाओं के बजाय जेनेरिक नाम ही लिखे जाएं। भारत में स्वास्थ्य देखभाल के बेहद महंगे होने से चिंतित प्रधानमंत्री यह कह चुके हैं कि मध्यवर्गीय परिवार में जब कोई सदस्य गंभीर बीमारी का शिकार हो जाता है तो पूरा परिवार ही गहरे तनाव में आ जाता है। (यहां पर केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है कि बेचारे गरीब परिवारों की क्या हालत होती होगी?) उन्होंने 15 साल बाद आ रही नई राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति का भी जिक्र किया। साफ है कि सरकार स्वास्थ्य देखभाल को समाज के सभी समूहों की पहुंच में लाना चाहती है। एक अहम सामाजिक क्षेत्र पर सरकार का इस तरह ध्यान देना निश्चित रूप से तारीफ के लायक है। लेकिन यह ध्यान में रखना होगा कि सरकार क्या वाकई में बीमारी की गंभीरता को देखते हुए सही इलाज करने जा रही है? 
 
सबसे पहले पर्ची पर केवल जेनेरिक दवाओं का ही नाम लिखने के मुद्दे पर गौर करते हैं। हकीकत तो यह है कि चिकित्सक अपनी पसंद से कोई भी दवा लिख सकता है लेकिन भारत में अमूमन फार्मासिस्ट ही दवाओं के मामले में निर्णय लेने वाला होता है। इसकी वजह यह है कि गरीब और अशिक्षित लोग चिकित्सक के पास जाने के बजाय सीधे फार्मासिस्ट के पास जाते हैं और उन्हें अपनी बीमारी के लक्षण बताकर दवा देने को कहते हैं। थोड़ी अधिक समझ रखने वाले लोग डॉक्टर की पर्ची लेकर तो जाते हैं लेकिन फार्मासिस्ट से समान औषधि विन्यास वाली ब्रांडेड दवा मांगते हैं। कुछ खास कंपनियों की दवाओं पर अधिक भरोसा होने के चलते ऐसा होता है। लेकिन फार्मासिस्ट तो ग्राहक को उसी कंपनी की दवा देगा जो उसे अधिक कमीशन देती है। 
 
यहां पर किसी व्यक्ति को किफायती दवा मिलने के साथ ही उसकी गुणवत्ता का भी मामला खड़ा होता है। असल में बड़े पैमाने  पर बनने वाली दवाओं और उनकी गुणवत्ता इससे भी जुड़ी हुई है कि आपको उस औषधि कंपनी पर कितना भरोसा है? विभिन्न राज्यों में औषधि निर्माण की निगरानी का अलग स्तर होने से भी इन दवाओं की गुणवत्ता का मसला खड़ा होता है। 
दरअसल दवाओं की कीमतें नियंंत्रित करने से गुणवत्ता नियंत्रण सुनिश्चित नहीं हो पाता है। हृदयरोगियों की धमनियों का अवरोध दूर करने में इस्तेमाल होने वाले स्टेंट की कीमत पर लगे नियंत्रण से इसे समझा जा सकता है। सर्वविदित है कि उत्पादक के स्तर पर स्टेंट की लगाई गई कीमत से काफी अधिक दाम में उसे अस्पताल बीमार को बेचते हैं। ऐसे में सरकार का इस मूल्य-वृद्धि को बेअसर करने के लिए कदम उठाना निहायत ही जरूरी हो गया था। अब अस्पतालों के लिए स्टेंट का अलग बिल देना भी अनिवार्य कर दिया गया है ताकि बीमार को आसानी से उसकी जानकारी हो सके। 
 
हालांकि इसका एक परिणाम यह हो सकता है कि अस्पताल स्टेंट की सही कीमत लगाने से हुए नुकसान की भरपाई के लिए अन्य बिलों में बढ़ोतरी का रास्ता अपनाने लगें। मूल्य नियंत्रण का एक और नतीजा यह हुआ है कि कुछ स्टेंट निर्माताओं ने अपने आला स्तर के स्टेंट को बाजार से हटाना शुरू कर दिया है। कहा जा रहा है कि अब केवल चीन-निर्मित स्टेंट ही अपने कम कीमत के चलते बाजार में आसानी से मिलेंगे। चीन में बने स्टेंट की गुणवत्ता पर पहले से ही सवाल उठते रहे हैं।
 
पहली बात तो यह है कि चीन-निर्मित स्टेंट को अगर सरकार निम्न गुणवत्ता वाला मानती है तो उसे भारत में बिकने की मंजूरी ही नहीं देनी चाहिए। जहां तक महंगे स्टेंट का सवाल है तो लाख रुपये से भी अधिक कीमत होने से यह अधिकतर भारतीयों के लिए दूर की कौड़ी ही साबित होंगे। इस तरह जेनेरिक दवाओं और सस्ते स्टेंट दोनों ही मामलों में मूल्य-नियंत्रण यह सुनिश्चित करने में नाकाम हुआ है कि किफायती होने के साथ ही वह गुणवत्तापरक भी हो।
 
अगर दवाओं के मूल्य नियंत्रण और जेनेरिक नाम लिखने से बात नहीं बनेगी तो फिर कैसे बनेगी? असल में सरकार दवाओं की कीमतों को काबू में रखने के साथ ही उनकी गुणवत्ता भी सुनिश्चित कर सकती है। अगर सरकार पहले से तय किफायती दाम पर जेनेरिक दवाओं और गुणवत्ता परखे जा चुके स्टेंट को उनके निर्माताओं से थोक में खरीदती है और फिर उसे सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा के जरिये आम लोगों तक पहुंचाती है तो यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। दवाएं तो पहले से ही जन औषधि केंद्रों के जरिये बेची जा रही हैं लेकिन उनकी संख्या और क्षमता बढ़ाकर अधिक लोगों को लाभ पहुंचाया जा सकता है। इन दुकानों पर स्टेंट भी बेचे जा सकते हैं।
 
एक बार फिर राज्यों में सरकारी खरीद के अलग मानदंडों के चलते समस्या हो सकती है। तमिलनाडु और राजस्थान में दवा खरीद की व्यवस्था बेहतर मानी जाती है लेकिन इससे अन्य राज्यों की बदइंतजामी का भी खुलासा होता है। इतना जरूर है कि सरकारी स्वास्थ्य सेवा में किफायती दरों पर गुणवत्ता वाली दवाएं और मेडिकल उपकरण मुहैया कराने पर मूल्य नियंत्रण के लिए नौकरशाही की भारी-भरकम फौज की जरूरत नहीं रह जाएगी। सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा में किफायती दवाएं मिलना सुनिश्चित होने के बाद इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि निजी कंपनियां अधिक कीमत दे सकने वाले लोगों से कितना वसूलती हैं।
Keyword: pharma, medicine,,
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