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महत्त्वपूर्ण है जीएसटी निकल आएगी राह

अशोक लाहिड़ी /  May 04, 2017

वित्त मंत्री अरुण जेटली का आगामी 1 जुलाई से जीएसटी विधेयक लागू करने का प्रस्ताव एकदम उचित है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अशोक लाहिड़ी 

 
वित्त मंत्री अरुण जेटली इस बात पर टिके हुए हैं कि आगामी 1 जुलाई से वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू कर दिया जाएगा। जीएसटी को स्वतंत्र भारत के एक अप्रतिम कर सुधार के रूप में पेश किया गया है और आठ केंद्रीय तथा नौ राज्य स्तरीय कर इसमें शामिल होंगे। इसकी व्यापक प्रकृति को इस बात से समझा जा सकता है कि एक अनुमान के मुताबिक देश में 80 लाख करदाता प्रति वर्ष 37 कर रिटर्न भरते हैं और हर महीने करीब 350 करोड़ इनवॉयस भरे जाते हैं। 
 
हमारा देश इस बदलावपरक सुधार के लिए कितना तैयार है? केंद्रीय जीएसटी (सीजीएसटी), एकीकृत जीएसटी (आईजीएसटी), केंद्रशासित प्रदेश जीएसटी (यूजीएसटी) और राज्यों को जीएसटी क्षतिपूर्ति अधिनियम, इन चारों को 12 अप्रैल को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल चुकी है। बिहार, चंडीगढ़, झारखंड, राजस्थान और तेलंगाना राज्य जीएसटी अधिनियम पारित कर चुके हैं। उम्मीद है कि इस माह के अंत तक अन्य राज्य भी ऐसा ही करेंगे। 
 
जीएसटी नेटवर्क (जीएसटीएन)की स्थापना मार्च 2013 में की गई थी। इसका लक्ष्य रहा है एक साझा सूचना प्रौद्योगिकी नेटवर्क तैयार करना ताकि केंद्र और सभी राज्यों में जीएसटी चुकाने वालों को एक समान इंटरफेस मुहैया कराया जा सके। जीएसटीएन खासतौर पर अहम है क्योंकि इसकी मदद से आईजीएसटी की निगरानी की जा सकती है और इनपुट कर क्रेडिट को वैध करने और आवश्यकतानुसार इसे वापस करने या इसका दोबारा दावा करने में इसकी अहम भूमिका है। जीएसटी में शामिल होने वाले मौजूदा करों के करदाताओं को जीएसटीएन में शामिल होना होगा और नया पंजीयन क्रमांक हासिल करना होगा। 
 
इस बदलाव में नए जीएसटी कानून के अधीन नामांकन और पंजीयन शामिल है। नामांकन की प्रक्रिया नवंबर 2016 में आरंभ हुई थी। हर राज्य के लिए चरणबद्घ तरीके से नामांकन की व्यवस्था की गई। इसकी तय मियाद कम से कम दो बार बढ़ाई गई। इसे 31 जनवरी से बढ़ाकर 31 मार्च किया गया और उसके बाद 30 अप्रैल 2017। चूंकि कई मौजूदा करदाता, उदाहरण के लिए सेवा करदाताओं में से करीब दो तिहाई, अब तक नामांकित नहीं हैं इसलिए अटकल हैं कि इस मियाद को एक बार और बढ़ाया जाएगा। 
 
सीजीएसटी, आईजीएसटी, एसजीएसटी, यूटीएसटी और जीएसटी के अधीन राज्यों के नुकसान की भरपाई की बात करें तो जरूरी नियमों के बारे में विशिष्टï जानकारी सामने नहीं है। केंद्र अथवा राज्य सरकारों द्वारा अधिसूचित किए जाने वाले द्वितीयक अथवा अन्य नियम परिचालन पहलू के लिहाज से अहम हैं। अब तक जीएसटी परिषद ने केवल पांच नियमों को अंतिम मंजूरी दी है। ये हैं कर रिटर्न दाखिल करने, संस्थानों के पंजीयन, जीएसटी भुगतान, इनवॉयसिंग और रीफंड यानी पुनर्भुगतान संबंधी नियम। चार अन्य इनपुट कर क्रेडिट्र, वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्यांकन,, लेवी के आकलन और बदलाव संबंधी प्रावधान को लेकर नियम स्पष्टï नहीं हैं। एक बार नियम तय होने के बाद स्वचालित जीएसटीएन व्यवस्था के लिए जरूरी सॉफ्टवेयर में भी बदलाव करने होंगे। 
 
अनिवार्य वस्तुओं पर शून्य दर के अलावा जीएसटी में चार स्तरीय दर व्यवस्था है जो क्रमश: 5 फीसदी, 12 फीसदी, 18 फीसदी और 28 फीसदी के हिसाब से लगेगी। आम लोगों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली वस्तुओं पर 5 फीसदी और विलासिता की वस्तुओं पर 28 फीसदी की दर से कर लगेगा। इस बीच 12 और 18 फीसदी की दर दो मानक दरें हैं। व्यापक तौर पर देखा जाए तो वस्तुओं अथवा सेवाओं पर जीएसटी दर लगभग उन करों के बराबर होगी जो जीएसटी में समाहित किए गए हैं। लेकिन उन शुल्कों की कुल दर चार स्तरीय कर दायरे के बीच में आए तो कुछ अनिश्चितता पैदा होती है कि इसे ढांचे के समरूप करने के लिए बढ़ाया या घटाया जाएगा। 
 
इतना ही नहीं महंगी धातुओं पर क्या कर दर लगेगी यह भी अभी तय नहीं है। विशिष्टï विलासिता वाली वस्तुओं या नुकसानदेह व्यसन वाली वस्तुएं जिन पर 28 फीसदी की उच्चतम दर के बाद उपकर भी लगेगा। यह पांच साल की अवधि के लिए होगा ताकि राज्यों को जीएसटी क्रियान्वयन के बाद होने वाले किसी भी राजस्व नुकसान से बचाया जा सके। जीएसटी परिषद की अगली बैठक 18-19 मई को श्रीनगर में होनी है, यानी जीएसटी की शुरुआत की तयशुदा तारीख से बमुश्किल छह सप्ताह पहले। 
 
सवाल यह है कि क्या हम जीएसटी की ओर किसी हड़बड़ी में बढ़ रहे हैं? निश्चित तौर पर इसका उत्तर नहीं है। वस्तुओं एवं सेवाओं के बीच का अंतर समाप्त करने का विचार ही अप्रत्यक्ष कर ढांचे और जीएसटी के मूल में है। यह विचार सन 1994 से ही सामने है। उस वक्त अमरेश बागची की रिपोर्ट रिफॉर्म ऑफ डोमेस्टिक ट्रेड टैक्सेस इन इंडिया: इश्यूज ऐंड ऑप्शंस सरकार के सामने पेश की गई थी। यह रिपोर्ट नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी ने तैयार कराई थी। वर्ष 2000 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने राज्यों के वित्त मंत्रियों की एक अधिकार प्राप्त समिति बनाई थी जिसकी अध्यक्षता पश्चिम बंगाल के तत्कालीन वित्त मंत्री असीम दासगुप्ता को सौपंी गई थी ताकि जीएसटी मॉडल को अपनाने के लिए सुसंगत व्यवस्था कायम की जा सके। या कहें वर्ष 2006 में जब तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने अपने बजट भाषण में कहा था कि जीएसटी को 1 अप्रैल 2010 से लागू किया जा सकता है। 
 
भारतीय राजनीति और नौकरशाही में हमेशा यह होता है कि संकट के वक्त सबसे बेहतरीन निकलकर आता है। शायद अमेरिकी लेखक रेयान ब्लेयर को इस सबके बारे में बेहतर मालूम था। इसीलिए तो उन्होंने लिखा था, 'अगर यह आपके लिए महत्त्वपूर्ण है तो आप राह निकाल ही लेंगे। अगर नहीं तो आप कोई न कोई बहाना तलाश लेंगे।Ó मौजूदा वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 1 जुलाई से जीएसटी लागू करने का प्रस्ताव रखकर सही कदम उठाया है। हो सकता है जो चीजें वर्षों में नहीं हो सकीं वे मई के मध्य के बाद के छह सप्ताह में हो जाएं। 
 
(लेखक अर्थशास्त्री हैं। लेख में प्रस्तुत विचार पूर्णतया निजी हैं।)
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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