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कश्मीर में कौशल से काम

संपादकीय /  May 04, 2017

गत सोमवार को नियंत्रण रेखा के समीप पाकिस्तान की बॉर्डर एक्शन टीम ने दो भारतीय सैनिकों का सर धड़ से अलग करने का घृणित और शर्मनाक कृत्य किया। इसके बाद भारतीय खेमे में क्रोध की लहर उचित ही है। सरकार के मुताबिक भारत के पास यह साबित करने के लिए पर्याप्त प्रमाण हैं कि पाकिस्तानी सेना ने कृष्णा घाटी क्षेत्र में नियंत्रण रेखा पार करके यह जघन्य काम किया। विदेश सचिव एस जयशंकर ने पाकिस्तानी उच्चायुक्त अब्दुल बासित को भारत की नाराजगी से अवगत करा दिया है। हालांकि पाकिस्तान ने अपनी सेना के इसमें शामिल होने से इनकार किया है। इस घटना के बाद भारत में कोलाहल बढ़ रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ओर से ऐसी आवाजें उठ रही हैं कि सेना को पूरी ताकत से इसका माकूल जवाब देना चाहिए। बहरहाल सरकार को ऐसी किसी भी प्रतिक्रिया से पहले कई बार सोचना चाहिए। 

 
दरअसल जैसे को तैसा की नीति कतई कामयाब नहीं नजर आ रही है। हमारे रक्षा प्रतिष्ठïान की कमजोरी हालात को और बुरा बना रही है। वर्ष 2016 के आरंभ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की औचक पाकिस्तान यात्रा के एक सप्ताह के भीतर पठानकोट में वायुसेना के अड्डïे पर हमला हुआ और तब से ऐसे कई हमले हो चुके। हर हमले में भारतीय सेना और उसके ठिकानों को निशाना बनाया गया और अभेद्य समझे जाने वाले सैन्य ठिकानों में दहशत पैदा की गई। उड़ी में सेना के ठिकाने पर हुए आतंकवादी हमले के बाद भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक (अचानक किया गया नियंत्रित हमला) करके अपनी प्रतिक्रिया दी थी। लेकिन इसके बावजूद पाकिस्तान ने नवंबर में नगरोटा में भारतीय क्षेत्र में घुसकर हमला किया। हताहत होने वाले भारतीय सैनिकों की तादाद तेजी से बढ़ रही है जबकि जमीन पर कोई सुधार देखने को नहीं मिल रहा है। 
 
दूसरी बड़ी वजह है कश्मीर में लगातार खराब हो रहे हालात। सीमापार आतंकी गतिविधियों में तेजी से इजाफा हुआ है। इस बीच कश्मीर घाटी में राजनीतिक माहौल भी अशांत बना हुआ है। राज्य में शांति व्यवस्था कायम रहने पर ऐसी घटनाएं कम ही देखने को मिलती हैं। ऐसे में घाटी में तेजी से बढ़ रहे तनाव को दूर करने के लिए एक राजनीतिक पहल की शीघ्र आवश्यकता है। ऐसा करके ही लोगों के बीच अलग-थलग पडऩे की भावना को कम किया जा सकता है, खासतौर पर युवाओं के बीच। अगर राजनीतिक ढंग से हल हो सकने वाले मुद्दों को छोड़कर सीधे कड़े सुरक्षा उपायों पर ध्यान केंद्रित किया गया तो इससे पाकिस्तान के लिए ही नए अवसर तैयार होंगे। उनका फायदा उठाकर वह हमारी मुसीबतें और बढ़ा सकता है। इस लिहाज से देखा जाए तो राष्ट्रपति शासन लागू करने की मांग हर लिहाज से बेतुकी है। इसका उलटा असर देखने को मिल सकता है। 
 
पाकिस्तान के हालिया उकसावे पर भले ही सेना को अपने तरीके से प्रभावी कार्रवाई करने दी जाए लेकिन भारत को घाटी में संवाद और भरोसा कायम करने की कोशिश तेज करनी चाहिए। इसके अलावा भारत पाकिस्तान के साथ भी बातचीत शुरू कर सकता है। इस मंच का इस्तेमाल पाकिस्तान सरकार का ध्यान उसकी तमाम हरकतों की ओर आकृष्टï करने में भी किया जा सकता है। यह भी सच है कि केवल पाकिस्तान सरकार से बातचीत करना निरर्थक है इसलिए बेहतर यह होगा कि पाकिस्तानी सेना से भी समांतर संवाद कायम किया जाए। इसके अलावा कश्मीर को एजेंडे पर रखने को लेकर बहुत रक्षात्मक होने की आवश्यकता भी नहीं है। आखिरकार हम पाकिस्तान के साथ प्रदेश के एक हिस्से पर अवैध कब्जे को लेकर ही उलझे हैं। ऐसे में उसे खाली कराना हमारे एजेंडे में प्रमुख होना चाहिए। पाकिस्तान के साथ संवाद को झुकने के रूप में नहीं बल्कि एक युक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए।
Keyword: jammu kashmir, military, pakistan,,
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