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विमानन क्षेत्र के लिए 'उड़ान' की कामयाबी जरूरी

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  05 03, 2017

मोदी सरकार की विभिन्न योजनाओं के विश्लेषण में सबसे अधिक समस्या उनके नामकरण से आगे देखने से संबंधित होती है। अब उड़ान योजना का ही उदाहरण लीजिए, प्रधानमंत्री ने इसी हफ्ते छोटे शहरों को हवाई संपर्क से जोडऩे के लिए इसकी शुरुआत की है। इसे 'उड़े देश का आम नागरिक' शब्दावली के पहले अक्षरों को मिलाकर उड़ान नाम दिया गया है। बहरहाल यह योजना अपने नाम से इतर रोचक तरीके से डिजाइन भी की गई है। प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) की तरफ से इस योजना में हवाई किराये को किफायती रखने का विचार पेश किया गया था। नीति आयोग और नागरिक उड्डïयन मंत्रालय ने इस योजना के मौलिक विचार को और तराशने का काम किया और अब यह अधिक कारगर नजर आ रही है। इसमें देश भर में पहले से मौजूद लेकिन कम इस्तेमाल होने वाले 43 हवाईअड्डों का व्यावसायिक उपयोग शुरू करने पर जोर दिया गया है। 

 
इस योजना का जो मौजूदा खाका है उसमें सरकार पर सालाना 205 करोड़ रुपये प्रत्यक्ष बोझ पडऩे का अनुमान है। कुछ हवाई मार्गों पर टिकटों को किफायती सीमा में रखने के लिए सरकार अपनी तरफ से सब्सिडी भी देगी। मसलन, दिल्ली-शिमला मार्ग पर सरकार एक सीट पर करीब 3,000 रुपये की सब्सिडी देगी। इसके अलावा सरकार को कई तरह के परोक्ष खर्च भी उठाने होंगे। उड़ान योजना में शामिल विमानों को ईंधन पर केवल एक फीसदी कर ही देना होगा और उन्हें हवाईअड्डïा उपयोग शुल्क से भी छूट दी जाएगी।
 
अब यह परखने की कोशिश करते हैं कि आखिर इसकी जरूरत क्या है? वर्तमान समय में देश के कुल हवाई यातायात का आधा हिस्सा केवल दिल्ली-मुंबई मार्ग पर ही केंद्रित है। कुल हवाई यातायात में छोटे शहरों की हिस्सेदारी केवल 10 फीसदी ही है। ऐसे में नए हवाईअड्डों को परिचालन के लिए तैयार करना खासा अहम है। नागरिक उड्डïयन क्षेत्र के विस्तार के लिए सरकार का एक सुचिंतित और बाजार-अनुकूल योजना के जरिये हस्तक्षेप करना भी लाजिमी है।
 
ऐसे में जब सरकार ने विमानन क्षेत्र में खुद को एक साथ गरीब-समर्थक और बाजार-समर्थक दोनों होने का गुर हासिल कर लिया है तो यहां पर मेरा सरकार से यही सवाल है कि वह इसी क्षेत्र में धनी लोगों के अनुकूल और बाजार-विरोधी हस्तक्षेप की अपनी मौजूदा परिपाटी कब छोड़ेगी? दूसरे शब्दों में, सरकार एयर इंडिया का बोझ अपने कंधे से कब उतारेगी? इस सरकार के सत्ता संभालने के बाद से ही तेल की कीमतों में आई गिरावट का एक दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम यह हुआ है कि लोगों को यह अहसास ही नहीं हो पाया  कि एयर इंडिया का परिचालन किस हद तक घाटे में है। अन्य विमानन कंपनियों की तरह एयर इंडिया भी सस्ते ईंधन के चलते न नफा न नुकसान की स्थिति में नजर आ रही है। सरकार का दावा है कि एयर इंडिया को वर्ष 2015-16 में 105 करोड़ रुपये का परिचालन लाभ हुआ था। यह आकलन नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की उस रिपोर्ट के ठीक उलट है जिसमें एयर इंडिया को 321 करोड़ रुपये की परिचालन हानि होने की बात कही गई थी। एयर इंडिया अपनी आर्थिक सेहत के लिए तेल कीमतों का मोहताज बना हुआ है। देश के कुल हवाई यातायात में एयर इंडिया की हिस्सेदारी घटकर महज 15 फीसदी पर आ गई है।
 
अब यह कहने की जरूरत नहीं है कि एयर इंडिया के बने रहने का कोई औचित्य नहीं रह गया है। एक शहर से दूसरे शहर में जल्द आवागमन की जरूरतों का निजी क्षेत्र की प्रतिस्पद्र्धी कंपनियां ध्यान रख रही हैं। गत दिनों जर्मन मार्शल फंड के इंडिया ट्राईलेटरल फोरम की एक बैठक में नागरिक उड्डïयन राज्यमंत्री जयंत सिन्हा ने कहा था कि दुनिया का सर्वाधिक मुक्त विमानन बाजार भारत में है जहां पर करीब दो-तिहाई अंतरराष्ट्रीय उड़ानें विदेशी विमानन कंपनियां संचालित कर रही हैं। हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि देश के बाहर जाने वाले कुछ सबसे अच्छे हवाई मार्गों पर एयर इंडिया का ही वर्चस्व है, निजी कंपनियों का नहीं। अब क्षेत्रीय हवाई संपर्क को बढ़ावा देने के लिए शुरू उड़ान योजना पर सरकार की नई एवं बाजार-आधारित प्रणाली निगरानी रखेगी।
 
अब भी एयर इंडिया के भारी कर्जों का बोझ सरकार पर ही है। पिछली सरकार ने एयर इंडिया की हालत सुधारने के लिए 10 साल की अवधि वाला 30 हजार करोड़ रुपये का बेलआउट पैकेज शुरू किया था लेकिन पिछले साल इस विमानन कंपनी पर फिर भी 46,000 करोड़ रुपये का कर्ज बाकी था। अंतिम रूप से तो यह राशि करदाताओं की जेब से ही दी जाएगी। सरकार यह समझने को तैयार नहीं है कि बेहद अनुकूल समय में भी नफा न नुकसान की स्थिति में पहुंच पाने में नाकाम रही यह कंपनी कभी भी इस राशि को वापस कर पाएगी?
 
प्रधानमंत्री और उनकी सरकार की प्राथमिकताओं के संदर्भ में 46,000 करोड़ रुपये की इस राशि की अहमियत को समझने की कोशिश करते हैं। इतनी बड़ी रकम से 3.8 करोड़ घरों को शौचालय सुविधा दी जा सकती है। इसी तरह इससे देश भर के स्कूलों में खाली पड़े करीब 10 लाख शिक्षकों को एक साल तक वेतन दिया जा सकता है। इस रकम से प्रधानमंत्री की महत्त्वाकांक्षी गैस सिलिंडर वितरण योजना को अगले ढाई वर्षों तक वित्तीय मदद दी जा सकती है। करीब एक करोड़ गरीब बेघरों को पूरी तरह ब्याज-मुक्त आवासीय कर्ज भी इससे दिया जा सकता है।
 
ऐसे में सवाल उठता है कि सरकार की असली चिंता क्या है? क्या यह सरकार वाकई में खुद को गरीब-समर्थक मानती है और देशवासियों को सशक्त करने के लिए नए, नवोन्मेषी एवं बाजार-आधारित प्रक्रियाएं तलाश सकती है? या फिर यह पिछली तमाम सरकारों जैसी ही है और आम करदाताओं के चुकाए कर का इस्तेमाल देश के सबसे धनी लोगों की सेवा करने वाली नकारा एवं नाकाबिल एयरलाइन को सब्सिडी देने के लिए करेगी? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब केवल सरकार और उसके मुखिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही दे सकते हैं। 
Keyword: aviation, विमानन,
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