बिजनेस स्टैंडर्ड - खेती-किसानी में बढ़ सकती है कृषि आमदनी
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खेती-किसानी में बढ़ सकती है कृषि आमदनी

नीलकंठ मिश्र /  05 03, 2017

मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश ने साबित कर दिया है कि असरदार नीतियां, सिंचाई सुविधाएं और बाजार तक किसानों की पहुंच को आसान बनाकर कृषि आय को सुधारा जा सकता है। बता रहे हैं नीलकंठ मिश्र

 
मध्य प्रदेश ने पिछले साल कृषि उत्पादन में 30 फीसदी की उल्लेखनीय विकास दर हासिल की है। दो वर्षों के खराब प्रदर्शन से उबरते हुए मध्य प्रदेश ने कृषि क्षेत्र में यह प्रदर्शन किया। इस तरह  वर्ष 2008 से ही मध्य प्रदेश ने कृषि उत्पादन में औसतन 20 फीसदी की वार्षिक वृद्धि हासिल की है। इसका नतीजा यह हुआ है कि राज्य के कुल उत्पादन में कृषि क्षेत्र का हिस्सा बढ़कर 38 फीसदी हो चुका जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह अनुपात 17 फीसदी ही है और इसमें लगातार गिरावट देखी जा रही है।
 
मध्य प्रदेश के उलट आंध्र प्रदेश ने सूखे के दौरान भी कृषि उत्पादन में अपनी रफ्तार कम नहीं होने दी है। हालांकि सूखे की वजह से फसलों के उत्पादन में कमी आई लेकिन मत्स्य उत्पादन में 30 फीसदी की वार्षिक विकास दर और मवेशियों के मामले में दो अंकों की वृद्धि दर हासिल कर आंध्र प्रदेश ने उस कमी की भरपाई कर ली। वर्ष 2016 में एक बार फिर इस राज्य ने फसल उत्पादन में तेजी दर्ज की है जिससे कृषि उत्पादन में उसकी विकास दर बढ़कर 14 फीसदी पर पहुंच गई।
 
भारत यूं तो कई आर्थिक समस्याओं का सामना कर रहा है लेकिन सबसे खराब स्थिति संभवत: कृषि क्षेत्र में है। इस क्षेत्र में अब भी देश की लगभग आधी कार्यशक्ति लगी हुई है लेकिन राष्ट्रीय उत्पादन में उसका हिस्सा महज छठा ही है। जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार धीमी पडऩे और प्रति व्यक्ति कैलरी मांग में कमी आने से कृषि क्षेत्र को मांग की कमी का भी सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में कृषि क्षेत्र में लगे लोगों का निर्वासन अपरिहार्य लग रहा है लेकिन इस बात को लेकर स्थिति साफ नहीं है कि इन लोगों को आखिर कहां खपाया जाएगा?
कर्नाटक के दृष्टांत से इस समस्या को समझा जा सकता है। पिछले साल कर्नाटक में कम बारिश हुई थी लेकिन उसके पहले करीब एक दशक तक अच्छी बारिश होती रही है। इसके बावजूद वहां पर कृषि उत्पादन की स्थिति अच्छी नहीं रही है। राज्य के कुल उत्पादन में कृषि क्षेत्र का हिस्सा गिरकर 12 फीसदी पर आ गया है। गौर करने वाली बात यह है कि कर्नाटक की करीब आधी आबादी कृषि कार्यों में ही लगी हुई है।
 
बहरहाल मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश की उपलब्धियां हमें सोचने के लिए मजबूर करती हैं। असलियत तो यह है कि इन दोनों ही राज्यों को पर्याप्त नैसर्गिक सौगात नहीं मिली है फिर भी लंबे समय तक सही सरकारी नीतियों के कुशल कार्यान्वयन के चलते वे अपने यहां बदलाव ला पाने में सफल रहे हैं। मध्य प्रदेश सरकार ने वर्ष 2006 के बाद से ग्रामीण इलाकों में करीब 60,000 किलोमीटर लंबी सड़कें बनवाई हैं। इन सड़कों के जरिये 14 हजार से भी अधिक गांव हरेक मौसम में मुख्य मार्गों से जुड़े रह पाते हैं। गांवों के किसानों के लिए इन सड़कों के जरिये अपने उत्पाद को बाजार तक पहुंचा पाना खासा आसान हो गया है। इसी तरह मध्य प्रदेश में सिंचित भूमि का रकबा भी वर्ष 2006 के बाद करीब 63 फीसदी बढ़ गया है जिससे सिंचाई सुविधा से युक्त बुआई वाली जमीन 38 फीसदी से बढ़कर 65 फीसदी हो गई है। खास बात यह है कि मध्य प्रदेश ने यह उपलब्धि कम खर्च के बावजूद हासिल की है। राज्य सरकार ने वर्ष 2015 और 2018 के बीच सिंचाई सुविधा पर होने वाले खर्च को दोगुना करने का लक्ष्य भी रखा है। दूसरी तरफ कर्नाटक ने पिछले दशक में लगातार मध्य प्रदेश से अधिक खर्च सिंचाई सुविधाओं पर किया है लेकिन नतीजे उतने अच्छे नहीं रहे हैं।
 
मध्य प्रदेश ने बाजार की स्थिति और कामकाज के तरीकों को भी सुधारा है। यह देश के उन कुछ गिने-चुने राज्यों में से एक है जहां दालों की पैदावार को सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदती है। उसने वित्तीय समावेशन के लिए समृद्धि योजना भी चलाई थी जिसके तहत 76.5 लाख बैंक खाते खोले गए। सीधे इन बैंक खातों में ही किसानों को सरकारी खरीद के पैसे भेज दिए जाते हैं। राज्य सरकार ने किसानों की सौदेबाजी क्षमता को बढ़ाने के लिए किसान उत्पादक संगठन के साथ भी मिलकर करना शुरू किया है। किसानों की यह बुनियादी समस्या रही है कि उन्हें अपने उत्पाद थोक में बेचने पड़ते हैं लेकिन खरीदारी फुटकर ही करनी पड़ती है। (अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी ने सबसे पहले 1960 में अमेरिकी किसानों के लिए इस समस्या का जिक्र किया था लेकिन यह एक सार्वभौम समस्या रही है।) शुरुआती गणना से पता चलता है कि मध्य प्रदेश की कृषि क्षेत्र में प्रति व्यक्ति आय कर्नाटक की तुलना में 65 फीसदी अधिक है जबकि एक दशक पहले वह पीछे हुआ करता था।
 
इसी तरह आंध्र प्रदेश पिछले कुछ वर्षों से भारत में मत्स्य उत्पादन के मामले में काफी अहम हो चुका है। हालत यह है कि साफ पानी की पसंदीदा रोहू मछली के उत्पादन में भी आंध्र प्रदेश आगे है। बिहार के बाजारों में भी मिलने वाली रोहू मछली अमूमन आंध्र की ही उपज होती है। खास तौर पर पिछले दो वर्षों में मत्स्य उत्पादन की विकास दर 30 फीसदी तक जा पहुंचा है जिसके लिए राज्य सरकार की मत्स्य-पालन नीतियों को ही श्रेय दिया जाना चाहिए। आंध्र सरकार ने वर्ष 2015 में नई मत्स्य पालन नीति लागू की थी।
 
कृषि मांग बढ़ाने के लिए उत्पादन में बढ़ोतरी भी जरूरी है। इसकी वजह यह है कि केवल तीन स्रोतों- निर्यात, आयात स्थानापन्न और बेहतर वहन क्षमता से ही इसे हासिल किया जा सकता है। जहां तक आयात स्थानापन्न का सवाल है तो भारत ने पिछले साल करीब 24 अरब डॉलर मूल्य के कृषि उत्पाद आयात किए थे जिनमें से बड़ी मात्रा खाद्य तेल एवं दालों की थी। वहीं वहन क्षमता बढ़ाने की अहमियत को वसा एवं प्रोटीन की प्रति व्यक्ति उपभोग के निम्न स्तर से समझा जा सकता है। हालांकि अगर ये उत्पाद कम मूल्य पर मिलें तो उनकी मांग बढ़ सकती है। देश में उपजे कृषि उत्पादों का निर्यात बढ़ाने और आयात किए जाने वाले उत्पादों का विकल्प तलाशने के लिए उत्पादन लागत को प्रतिस्पद्र्धी बनाने की जरूरत है। 
 
उदाहरण के लिए, भारत में पैदा हुए खाद्य तेलों की लागत इतनी अधिक है कि सरकार को घरेलू तेल उत्पादकों के हितों का ध्यान रखने के लिए लगातार आयात शुल्क लगाना पड़ता है। खाद्य तेल के उत्पादन में भी यही बात लागू होती है। आम तौर पर भारत में तिलहन से ही खाद्य तेल का उत्पादन होता है लेकिन पाम ऑयल की पैदावार कहीं बेहतर होती है। इसी तरह गेहूं के मामले में यूक्रेन, रूस और ब्राजील की मुद्राओं में गिरावट आने से उनके किसान कहीं अधिक प्रतिस्पद्र्धी हो गए हैं। रुपये की कीमत में हाल ही में हुए ह्रास ने भी भारतीय किसानों की मुश्किलें बढ़ाने का काम किया है। कृषि निर्यात का काफी अधिक घरेलू मूल्य-संवद्र्धन होता है। (कुछ लोगों को लगता है कि रुपये के अवमूल्यन से भारतीय किसानों को काफी लाभ हुआ है।)
 
बहरहाल मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश ने हमें यह दिखा दिया है कि असरदार नीतियां बनाकर, सिंचाई सुविधाओं को बेहतर कर और बाजार एवं जानकारी तक किसानों की पहुंच को आसान बनाकर कृषि आय को सुधारने की राह पर आगे बढ़ा जा सकता है। सवाल यह है कि क्या दूसरे राज्य भी इस कामयाबी को दोहरा सकते हैं? 
 
(लेखक क्रेडिट सुइस के इक्विटी रणनीतिकार-भारत हैं)
Keyword: agri, आधुनिक मशीन, किसान, कृषि उपकरण,,
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