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तुर्की की भूमिका

संपादकीय /  May 03, 2017

तुर्की के राष्ट्रपति रेजेप तायिप एर्दोआन की दो दिवसीय भारत यात्रा को पूरी तरह सफल नहीं माना जा सकता है। हाल ही में नए सिरे से जनता का भरोसा जीतने वाले एर्दोआन ने यात्रा से ऐन पहले एक टेलीविजन साक्षात्कार में कश्मीर को लेकर बहुपक्षीय वार्ता का सुझाव दिया और परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में दोहरी सदस्यता की वकालत की। कूटनयिकों ने उन्हें याद दिलाया कि ये दोनों बातें भारत की दृष्टिï से उचित नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि एनएसजी में भारत की सदस्यता और पारंपरिक हथियार निर्यात नियंत्रण संबंधी वासेनार समझौते को लेकर तुर्की का समर्थन इस बात पर निर्भर है कि भारत आध्यात्मिक गुरु फतहुल्लाह गुलेन के संगठन के सदस्यों को बाहर निकाले। गुलेन एर्दोआन के चिर प्रतिद्वंद्वी हैं। भारत ने तत्काल कहा कि वह इस बात का ध्यान रखेगा। तुर्की के राष्ट्रपति की स्पष्टï उद्दंडता के बावजूद भारतीय राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने आतिथ्य में कोई कसर नहीं छोड़ी और साझा मुद्दों पर स्पष्टïता से अपनी बात रखी। राजग सरकार पश्चिम एशिया के इस्लामिक देशों के साथ सावधानीपूर्ण कूटनीति अपना रही है और तुर्की इस क्षेत्र का अहम मुल्क है। 
 
आधुनिक तुर्की पारंपरिक रूप से पाकिस्तान का समर्थक रहा है। यूरोप के इस बड़े नाटो साझेदार और पाकिस्तान के बीच करीबी सैन्य रिश्ता इसकी बानगी है। कश्मीर के मुद्दे पर बढ़ते तनाव और चीन की छत्रछाया में पाकिस्तानी उभार ने यह जरूरत पैदा कर दी थी कि हम तुर्की के साथ रिश्ते मजबूत करें। हालांकि दोनों ही पक्षों ने इस यात्रा में अपना रुख नहीं बदला है लेकिन फिर भी उनके बीच समझ का एक नया आधार तो बना है। तुर्की में भारतीय कारोबारी निवेश बढ़ रहा है। महिंद्रा ऐंड महिंद्रा से लेकर एस्सार और वस्त्र से लेकर दवा कंपनियां और ओएनजीसी विदेश तक इसमें सहयोग कर रहे हैं। ओएनजीसी विदेश तो अजरबैजान और दक्षिणी तुर्की के बीच तेल एवं गैस पाइपलाइन में भी सहयोगी है। वहीं भारत से तुर्की आने वाले पर्यटकों की तादाद भी बढ़ रही है। दोनों देशों के बीच अभी करीब 6 अरब डॉलर का कारोबार है जिसमें भारत को व्यापार अधिशेष हासिल है। आर्थिक मंदी, बढ़ते आतंकवाद और पारंपरिक बाजार रहे यूरोप के साथ तुर्की के बढ़ते तनाव के बीच यह रिश्ता अहम है। एर्दोआन ने भारत की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट हासिल करने की कोशिश के प्रति जो मजबूत समर्थन जारी किया था, उसने महत्त्वपूर्ण कूटनयिक बदलाव की ओर संकेत किया था। 
 
एर्दोआन की यात्रा को पाकिस्तान के साथ उनके पारंपरिक रिश्तों के बरअक्स व्यापक कूटनयिक सहयोग के एक हिस्से के तौर पर देखा जा सकता है। उदाहरण के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सन 2015 में तीन दशक में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने जबकि वहां 26 लाख भारतीय रहते हैं। इसके बाद अबूधाबी के राजकुमार और यूएई के सैन्य बल के कमांडर इस वर्ष भारत की यात्रा पर आए। खाड़ी सहयोग परिषद और इस्लामिक सहयोग संगठन में यूएई की भूमिका अहम है। संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर मसले पर उसने अक्सर भारत के खिलाफ मतदान किया है इसलिए यह भी कूटनयिक क्षेत्र में अहमियत रखता है। पाकिस्तान का एक अन्य अहम सहयोगी सऊदी अरब भी भारत की पहुंच से बाहर नहीं है। मोदी ने वर्ष 2016 में रियाद की यात्रा की और कई अहम शिखर बैठकों के मौके पर सऊदी अधिकारियों से बातचीत की। भारत दुनिया के सबसे तेज विकसित होते मुल्कों में से एक है और वह सऊदी अरब के हितों के लिहाज से भी अहम है। क्योंकि भारत काफी मात्रा में कच्चा तेल वहीं से आयात करता रहा है। अब यह नीति लंबी अवधि में कैसा प्रदर्शन करती है, यह हमारे आर्थिक विकास पर काफी हद तक निर्भर करेगा। तुर्की इसमें अहम भूमिका निभा सकता है। 
Keyword: तुर्की राष्ट्रपति रेजेप तायिप एर्दोआन,
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