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भारतीय मीडिया कारोबार के लिए बढ़ता रूढि़वाद खतरनाक

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  May 02, 2017

पिछले कुछ महीनों से मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग में एक तरह की बेचैनी का भाव देखा जा रहा है। आप इसका दोष नोटबंदी को दे सकते हैं जिसने पिछली दो तिमाहियों में विकास को बाधित किया है। विश्लेषकों का कहना है कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही पर भी नोटबंदी का दुष्प्रभाव बना रह सकता है। इसके लिए आप मीडिया उद्योग में तेजी से पैर पसारते जा रहे रूढि़वादिता के दुर्भाग्य को भी दोषी मान सकते हैं। टेलीविजन में दिखाई जाने वाली सामग्री के मूल्य नियमन के अलावा फिल्मों में सेंसरशिप की सख्ती बढऩे और टेलीविजन को भी उसके दायरे में लाने जैसी प्रेतबाधाएं मौजूद हैं। 

 
इसके अलावा वैमनस्य फैलाने में लगे समाचार चैनलों में अपना अलग एजेंडा लेकर आने वाले धूर्त निवेशकों की भरमार है और सामग्री के मामले में भी सोशल मीडिया को मात देने वाला गुस्सा नजर आता है। टेलीविजन, फिल्मों, समाचारपत्रों, वेबसाइट और अन्य सूचना एवं मनोरंजन स्वरूपों में सक्रिय मीडिया कंपनियों के लिए अतिशय रूढि़वाद के उभार के मायने केवल सामाजिक मान्यताओं में बदलाव ही नहीं है। यह बिना किसी भय के ऐसी सामग्री बनाने की क्षमता से जुड़ा मामला है कि बेहद मामूली वजह से किसी फिल्म को सेंसर न कर दिया जाए या फिर वह रिलीज ही नहीं हो पाए। 
 
इसका ताल्लुक ऐसा माहौल बनाने से है जिसमें कोई समाचार रिपोर्ट उसके अंजाम की परवाह किए बगैर प्रकाशित-प्रसारित की जाए। भारत का उदार एवं समावेशी चरित्र बॉलीवुड को एक वैश्विक मंच देता है जहां की प्रतिभाओं को अमेरिकी स्टूडियो भी दिल खोलकर अपनाते हैं। अगर भारतीय मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग से उसका खुलापन और उदारवादी चरित्र छीन लिया जाए तो 1,26,000 करोड़ रुपये का यह उद्योग दो कारणों से सिकुड़कर रह जाएगा।
 
पहला, तेजी से बढ़ रहे मीडिया उद्योग का प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में हिस्सा तीन से पांच फीसदी तक पहुंच चुका है। वर्ष 2015 में अमेरिकी जीडीपी में मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग का योगदान 3.5 फीसदी रहा था। उस साल भारतीय अर्थव्यवस्था में भी इस उद्योग का अंशदान 0.8 फीसदी के सम्मानजनक स्तर पर दर्ज किया गया था। यह वर्ष 2016 में बढ़कर जीडीपी के 0.9 फीसदी तक पहुंच गया। यहां पर यह ध्यान रखना होगा कि भारतीय मीडिया उद्योग ने यह मुकाम अमेरिका में इस उद्योग के मददगार नीतिगत ढांचे के बगैर हासिल किया है। इससे लाखों लोगों को रोजगार भी मिलता है। केवल एक फिल्म के निर्माण में ही करीब दो सौ लोगों को रोजगार मिल जाता है। 
 
पिछले साल भारत में बनी कुल 1902 फिल्मों की गिनती करें तो इसमें रोजगार पाने वाले लोगों की संख्या लाखों में पहुंच जाती है। अगर टेलीविजन क्षेत्र की बात करें तो अकेले जी समूह ने ही वर्ष 2013 में करीब 8,000 लोगों को सीधे तौर पर रोजगार दिया था। टेलीविजन में निर्माण के अलावा पोस्ट प्रोडक्शन, स्पेशल इफेक्ट, एनिमेशन, संपादन और लेखन जैसी तमाम विधाओं में लोगों को काम मिलता है। दुर्भाग्य से मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग ने अर्थव्यवस्था में अपने योगदान के बारे में जागरूकता फैलाने की बहुत कम कोशिश की है। हालत यह है कि अभी तक मीडिया कंपनियों के कामकाज से वितरकों, केबल ऑपरेटरों, डीलरों, अभिनेताओं, तकनीकी जानकारों और अन्य लाखों लोगों को मिलने वाले रोजगार की संख्या के बारे में जानकारी जुटाने के लिए अभी तक कोई अध्ययन नहीं किया गया है। इसी तरह भारतीय कर संग्रह में मीडिया उद्योग के योगदान या वैश्विक बाजार में भारत के बढ़ते असर के बारे में भी अध्ययन नहीं किए गए हैं। 
 
वैसे लोग कह सकते हैं कि लोकतांत्रिक देश नहीं होते हुए भी चीन में मीडिया एवं मनोरंजन कारोबार बड़ी तेजी से बढ़ा है और आज के समय में यह दुनिया के सर्वाधिक विकासशील फिल्म, टीवी एवं डिजिटल बाजार के रूप में तब्दील हो चुका है। वाकई में ऐसा ही है। चीन ने मीडिया उद्योग के लिए जरूरी ढांचागत आधार तैयार करने में उत्कृष्ट कार्य किया है। वहीं भारत का इस मामले में प्रदर्शन काफी खराब है। ब्रॉडबैंड की गति और सिनेमाघरों की संख्या के मामले में भारत दुनिया के सबसे पिछड़े देशों की कतार में शामिल है। फर्क सिर्फ यह है कि चीन के सिनेमाघरों या टीवी सेटों पर दिखने वाली फिल्में या तो हॉलीवुड की हैं या फिर कोरियाई धारावाहिक और संगीतमय कार्यक्रम हैं। 
 
इसके उलट भारत में मीडिया एवं मनोरंजन जगत की अधिकांश सामग्री का निर्माण देश के भीतर ही होता है। हालांकि भारत में हॉलीवुड की फिल्मों का कारोबार है लेकिन कुल बाजार में उसकी हिस्सेदारी नाममात्र की ही है। अगर भारतीयों को विकल्प दिया जाए तो वे घरेलू स्तर पर बनी फिल्में या टीवी कार्यक्रम ही पसंद करते हैं। ऐसे में जैसे ही सामग्री निर्माण में रचनात्मक स्वतंत्रता छिन जाएगी, भारतीय मीडिया एवं मनोरंजन जगत में विदेशी सामग्रियों की भरमार होने लगेगी। 
 
यह एक और वजह है कि बढ़ता रुढि़वाद मीडिया उद्योग के लिए किस कदर नुकसानदायक हो सकता है। आखिर में, दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश होने के नाते भारत को अपने यहां विश्वस्तरीय मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग के विकास की दिशा में कारगर पहल करनी चाहिए। फिलहाल अमेरिका में बनी फिल्में और अन्य मनोरंजक सामग्रियों का वैश्विक मीडिया बाजार पर दबदबा है। अमेरिका के अलावा ब्रिटेन और नीदरलैंड्स भी इस कारोबार के अन्य अहम किरदार हैं। इन सामग्रियों के जरिये पश्चिमी देशों की मान्यताएं हमारे मानस पर असर डालती हैं और दुनिया को लेकर हमारा नजरिया भी उससे तय होता है। 
 
चीन एवं कोरियाई मनोरंजक सामग्री का असर काफी कम होता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर भारत ऐसी कोशिशें क्यों नहीं करता है कि खुद वह भी अन्य देशों के जनमानस को प्रभावित करने वाला मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग विकसित कर सके? इसके बजाय यह उद्योग तेजी से रूढि़वाद की चपेट में आता जा रहा है जिससे इसका असर खुद भारत के भीतर भी कमतर हो सकता है।
Keyword: media, AVDT, india,,
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