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राजकोषीय घाटे का इलाज संस्थागत सुधार से मुमकिन

अजय शाह /  May 02, 2017

बजट को नियंत्रित करने के लिए संविधान में राजकोषीय उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने वाले प्रावधान हों और बॉन्ड बाजार की अड़चनें दूर कर दी जाएं। बता रहे हैं अजय शाह

 
भारत की राजकोषीय समस्या काफी विकट हो चुकी है। अर्थशास्त्रियों ने बजट को नियंत्रित करने वाले संसदीय नियम का खाका तैयार करने और उसे लागू करने पर 20 साल तक काम किया है। लेकिन इस राह में बड़ी बाधा संविधान में वर्णित धन विधेयक की अवधारणा के चलते खड़ी हो रही है। धन विधेयक की राह अपनाने से सरकार के लिए राजकोषीय उत्तरदायित्व से बचने के साथ ही बजट को क्रियान्वित कर पाना भी खासा आसान हो जाता है। बजट को नियंत्रित करने के लिए हमारे पास केवल दो रास्ते ही हैं। पहला, संविधान में राजकोषीय उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने वाले प्रावधान किए जाएं और दूसरा, बॉन्ड बाजार की अड़चनें दूर कर दी जाएं।
 
भारत लंबे समय से राजकोषीय घाटे का सामना कर रहा है। सशक्त सार्वजनिक वित्त में अक्सर मामलूी प्राथमिक आधिक्य भी शामिल होता है। इसके अलावा संकट के समय कभी-कभार भारी घाटे की भी स्थिति पैदा हो जाती है। अधिकांश समय हम प्राथमिक घाटे में ही रहते हैं। गत 15 वर्षों से हमारा घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का करीब 2.5 फीसदी तक रहा है। हमें ऐसे संस्थागत सुधार करने होंगे कि राजकोषीय घाटे को लंबे समय तक सीमित दायरे में रखा जा सके। 
 
अर्थशास्त्री पिछले दो दशकों से भारतीय राजकोषीय दशा को दुरुस्त करने वाले संसदीय कानून की रूपरेखा तैयार करने में लगे हुए हैं। भारतीय लोक नीति में यह लक्ष्य हासिल कर पाना काफी हद तक द्विदलीय व्यवस्था का अंग रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय यह काम शुरू हुआ था और मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते समय इसे लागू किया जा सका था। राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) अधिनियम के वजूद में आने पर भारत के सभी अर्थशास्त्रियों को गर्व का अहसास हुआ था।
 
हालांकि एफआरबीएम अधिनियम वांछित परिणाम दे पाने में नाकाम रहा। इस पूरी कवायद में 15 साल का वक्त बीत चुका है और हमारे पास नतीजों के रूप में 2.5 फीसदी जीडीपी का राजकोषीय घाटा ही है। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि यह कानून मनचाहे नतीजे दे पाने में क्यों नाकाम रहा है? प्रतीक दत्त, राधिका पांडेय, इला पटनायक और मैंने इस विषय पर एक शोधपत्र में विचार किया है। इस शोधपत्र के सारांश को यहां प्रस्तुत किया जा रहा है।
 
भारत के संविधान में धन विधेयक की अवधारणा मौजूद है। कर और खर्च का प्रावधान करने वाले वित्त विधेयक के रूप में हरेक साल एक धन विधेयक संसद में पेश किया जाता है। सत्ता पक्ष के लिए इस विधेयक पर चर्चा के दौरान बहुमत के साथ मौजूदगी आवश्यक होती है। ऐसा नहीं होने पर सरकार गिर जाती है। संविधान के 110वां अनुच्छेद में धन विधेयक में समाहित बिंदुओं का जिक्र है। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि एफआरबीएम कानून में किए गए सुधार धन विधेयकों में भी लागू किए जा सकते हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि राजकोषीय उत्तरदायित्व का संसदीय कानून अब सत्ताधारी दल के लिए बाधा नहीं रह गया है। वित्त विधेयक पेश करते समय राजकोषीय उत्तरदायित्व कानून में संशोधन भी कर देना आसान है जिससे यह कानून निष्क्रिय हो जाता है।
 
मसलन, एफआरबीएम अधिनियम 2003 में राजस्व घाटे को 31 मार्च 2008 तक खत्म कर दिए जाने की बात कही गई थी। लेकिन अगले ही साल पेश किए गए बजट में इस समयसीमा को संशोधित कर वर्ष 2009 कर दिया गया। वर्ष 2012 में एक बार फिर इस सीमा को बदलकर 2015 कर दिया गया। जब 2015 का समय आया तो समयसीमा को बढ़ाकर 2018 कर दिया गया। कानून की नाकामी के पीछे यह बड़ी वजह रही है। 
 
बजट प्रक्रिया को नियंत्रित करना इस कानून का सार रहा है। दुनिया भर में लगभग हरेक जगह राजकोषीय उत्तरदायित्व संरचना को शक्तियां दी गई हैं। अमेरिका में अगर तय सीमा के भीतर बजट पारित नहीं हो पाता है तो एक तरह से सरकार ही बंदी की स्थिति में पहुंच जाती है। जर्मनी के संविधान में फेडरल डेट ब्रेक का जिक्र है जिसका उल्लंघन करने पर सरकारी भुगतान रोक दिया जाता है। वहीं भारत में एफआरबीएम कानून केवल वित्त विधेयक में कुछ पंक्तियां जोडऩे तक ही सीमित रह गया है। अगर किसी राजकोषीय उत्तरदायित्व कानून में बजट प्रक्रिया नियंत्रित करने की शक्तियां नहीं दी गई हैं तो वह खुद ही अप्रासंगिक हो जाता है।
 
इस कानून की नाकामी विधायी अभियांत्रिकी में भी निहित है। जब तक धन विधेयक की मौजूदा प्रवृत्ति संविधान में बनी रहती है, तब तक राजकोषीय उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने का इकलौता असरदार कानून संविधान में वर्णित नियम ही रहेगा। इन अवरोधों का सम्मान करने के लिए वित्त विधेयक को लागू करना होगा। इस संवैधानिक संशोधन को राजनीतिक रूप से व्यवहार्य बनाने के लिए आम लोगों को यह अहसास करना जरूरी है कि राजकोषीय समस्या उन्हें गहरी चोट पहुंचा रही है। इसके लिए तकनीकी और क्रियान्वयन स्तर पर दोतरफा प्रयास करने की जरूरत होगी। एक तरफ तो हमें जर्मनी की तरह संविधान में ही इंडियन डेट ब्रेक का प्रावधान करना होगा और फिर आम लोगों को उसके बारे में बताना भी होगा।
 
कुछ जानकारों का मानना है कि भारत में राजकोषीय उत्तरदायित्व कानून को कुछ ज्यादा ही तवज्जो दी जाती है। उनका कहना है कि राज्य को नियंत्रित करना अपने आप में एक जटिल समस्या है और ऐसे में केवल इस कानून पर ही सारा बोझ नहीं डाला जा सकता है। हमें बजट प्रक्रिया को दुरुस्त करने के लिए कर्ज लेने की लागत जैसे साधन का भी इस्तेमाल करना चाहिए।
 
किसी भी सुचारु व्यवस्था में बॉन्ड बाजार को किसी भी केंद्रीय, राज्य या स्थानीय सरकार की कर्ज लेने की क्षमता का आकलन करना चाहिए। अगर सार्वजनिक वित्त की स्थिति सही नहीं हो तो बॉन्ड बाजार को ऊंची ब्याज दरों की मांग भी करनी चाहिए। लेकिन भारत में बॉन्ड बाजार पर अवरोध के चलते इस तरह का नियंत्रण एवं संतुलन नहीं रहा है। मसलन, बैंकों को अपने जमा का 21 फीसदी सरकार को कर्ज के तौर पर देना पड़ता है भले ही उन्हें जितनी भी ब्याज दर क्यों न दी जाए? इस समस्या को दूर करने के लिए पीडीएमए और बॉन्ड बाजार सुधारों की भी जरूरत होगी। 
Keyword: budget, संसद बजट सत्र, narendra modi,,
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