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उभरते बाजार और प्रदर्शन शानदार

पवन बुरुगुला /  May 01, 2017

लगता है कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की जोखिम सहन करने की क्षमता में सुधार से उभरते बाजारों को 2017 में मजबूती मिली है। इस कैलेंडर वर्ष में अब तक अमेरिकी बाजारों में तेजी के बाद उभरते बाजारों ने भी अच्छी बढ़त दर्ज की है। जहां भारतीय बाजार डॉलर के संदर्भ में 20 फीसदी की वृद्घि के साथ 2017 में श्रेष्ठï प्रदर्शन वाले बाजार के तौर पर उभरे हैं वहीं चीन को छोड़कर अन्य सभी उभरते बाजारों ने भी एसऐंडपी 500 की तुलना में डॉलर संदर्भ में बेहतर प्रदर्शन दर्ज किया है। विदेशी पूंजी प्रवाह की वापसी और स्थानीय मुद्राओं की मजबूती उभरते बाजारों के इस शानदार प्रदर्शन के प्रमुख कारक हैं।

 
बाजार कारोबारियों का कहना है कि उभरते बाजारों में यह तेजी तथाकथित 'रीफ्लेशन ट्रेड' की वजह से आई है। रीफ्लेशन का मतलब वृद्घि की रफ्तार मजबूत बनाने के लिए पूंजी की आपूर्ति बढ़ाकर या कर घटाकर अर्थव्यवस्था को वित्तीय प्रोत्साहन मुहैया कराना है। पिछले साल नवंबर में डॉनल्ड ट्रंप की जीत के बाद बड़े आकार के वैश्विक फंडों ने कर कटौती, वृद्घि में सुधार और बाजार-अनुकूल उपायों की उम्मीद में इक्विटी पर दांव लगाया। नवंबर तक, वृद्घि का परिदृश्य चीन से जुड़ी चिंताओं और ब्रिटेन के ब्रेक्सिट से निकलने जैसे राजनीतिक घटनाक्रम की वजह से अस्पष्टï बना रहा। मुख्य तौर पर, रीफ्लेशन ट्रेड एक ऐसा घटनाक्रम है जिसमें निवेशक बेहतर वृद्घि और प्रतिफल की उम्मीद में बॉन्ड जैसे सुरक्षित उत्पादों से इक्विटी जैसे अधिक जोखिम वाले उत्पादों की ओर रुख करते हैं। एफपीआई ने 2017 में अब तक चीन को छोड़कर उभरते बाजारों की इक्विटी में 18 अरब डॉलर का निवेश किया है और वे दक्षिण अफ्रीका को छोड़कर सभी बाजारों में शुद्घ खरीदार बने हुए हैं। जहां मैक्सिको ने 9.5 अरब डॉलर का निवेश प्रवाह आकर्षित किया वहीं भारत ने 6.5 अरब डॉलर का प्रवाह आकर्षित किया। एफपीआई ने 2 अरब डॉलर की इक्विटी खरीदीं और रूस और ब्राजील में 0.9 अरब डॉलर का निवेश हुआ।
 
फ्रैंकलिन टेम्पलटन फिक्स्ड इनकम गु्रप के मुख्य निवेश अधिकारी क्रिस्टोफर मोलम्फी और उनकी टीम ने एक रिपोर्ट में कहा, 'कई उभरते बाजारों को अनुकूल हालात से मदद मिली है। उन्हें अमेरिकी डॉलर में नरमी, चीन से अच्छी मांग और ट्रंप प्रशासन से अब तक संरक्षणवादी व्यापार उपायों से परहेज किए जाने आदि से मदद मिली है।' मोलम्फी ने हालांकि यह भी चेताया कि उभरते बाजारों में तेजी टिकाऊ नहीं रह सकती है क्योंकि वैश्विक आर्थिक वृद्घि सुस्त बनी हुई है। उन्होंने कहा, 'दुनियाभर में धारणा संबंधी संकेतकों में तेजी देखी जा सकती है, लेकिन बड़े पैमाने पर वैश्विक अर्थव्यवस्था मौद्रिक प्रोत्साहन पर निर्भर है और राजनीतिक जोखिम यूरोप और अमेरिका दोनों में निवेशकों के लिए प्रमुख चिंता बना हुआ है।'
 
बाजार कारोबारियों का कहना है कि भविष्य में निवेशक प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में केंद्रीय बैंकों की मौद्रिक नीति के बजाय राजनीतिक परिणाम को लेकर अधिक चिंतित होंगे। इन अनिश्चितताओं में से एक 7 मई को निर्धारित फ्रांसीसी चुनाव का दूसरा दौर हो सकता है। निवेशकों को आशंका है कि मैरिन ली पेन की जीत फ्रांस में ब्रेक्सिट जैसे हालात को बढ़ावा दे सकती है। एवेंडस कैपिटल अल्टरनेट स्ट्रेटेजीज के मुख्य कार्याधिकारी एंड्रयू हॉलैंड का कहना है, 'फ्रांस चुनाव के पहले दौर के परिणाम ने निवेशकों को ब्रेक्सिट जैसी अनिश्चितता के संदर्भ में कुछ राहत प्रदान की है। भविष्य में बाजारों की नजर ट्रंप प्रशासन द्वारा अपनाए जाने वाले नीतिगत उपायों पर लगी रहेगी। चीन की अर्थव्यवस्था की स्थिति और सीरिया में भू-राजनीतिक तनाव भी भारत के लिए अनुकूल घटनाक्रम होंगे।' 
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