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अमेरिकी डर और जिंसों की मजबूती का असर

कृष्ण कांत /  May 01, 2017

वर्ष 2013 के मौद्रिक संकट के बाद से वैश्विक विदेशी निवेशकों के पसंदीदा रहे भारत को मौजूदा वैश्विक रीफ्लेशन ट्रेड (व्यापार बढ़ाने के कदम) में अन्य उभरते बाजारों के हाथों अपना आकर्षण खोना पड़ सकता है। ऊंची जिंस कीमतों से ब्राजील, रूस, दक्षिण अफ्रीका और इंडोनेशिया जैसे उभरते बाजारों में आय वृद्घि मजबूत होगी, लेकिन ऊर्जा और औद्योगिक धातुओं की कीमतों में तेजी आने से भारतीय कॉरपोरेट जगत का मार्जिन प्रभावित होगा। इससे भारतीय बाजारों को अन्य उभरते बाजारों के मुकाबले अपनी मूल्यांकन बढ़त सुरक्षित बनाए रखने में कठिनाई होगी।

 
भारतीय इक्विटी बाजार 2013 के मौद्रिक संकट के बाद से तेज रफ्तार बरकरार रखने में कामयाब रहा है। बीएसई का सेंसेक्स अगस्त 2013 के निचले स्तर से लगभग 70 प्रतिशत तक चढ़ चुका है। अगस्त 2013 में भारतीय मुद्रा और शेयर बाजार फेडरल रिजर्व द्वारा बॉन्ड खरीदारी की समय-पूर्व वापसी की आशंका से बड़ी गिरावट के शिकार हुए थे। पिछले साढ़े तीन साल में विदेशी पूंजी के मजबूत प्रवाह बाजार में आई तेजी को अब घरेलू निवेशकों द्वारा किए जा रहे निवेश से मदद मिली है। सितंबर 2013 से भारतीय इक्विटी में सभी एफआईआई ने लगभग 37.5 अरब डॉलर का निवेश किया जो हर महीने के हिसाब से 85 करोड़ डॉलर (5500 करोड़ रुपये) है। भारत के डेट बाजार को इस अवधि के दौरान 31.7 अरब डॉलर का अतिरिक्त निवेश प्रवाह हासिल हुआ। विदेशी निवेशकों ने स्थिरता और भारत द्वारा दिए गए निवेश पूंजी पर ऊंचे प्रतिफल(आरओएनडब्ल्यू) को ऐसे समय पसंद किया जब अन्य उभरते बाजार कम जिंस कीमतों की वजह से दबाव में बने हुए थे। 
 
इन्हीं कारकों से 2014 से अन्य उभरते बाजारों को मंदी (जिंस कीमतों में भारी गिरावट) का शिकार होना पड़ा जबकि वह स्थिति भारत के लिए अनुकूल थी। अन्य बाजारों के विपरीत, दलाल पथ पर उपभोक्ता कंपनियों का दबदबा रहा है जिनमें छोटे ऋणदाता और आईटी सेवा तथा फार्मा जैसे रक्षात्मक क्षेत्रों के निर्यातक शामिल हैं जो इक्विटी पर अधिक प्रतिफल और मजबूत आय की पेशकश करते हैं। जिंस कीमतों, खासकर कच्चे तेल में नरमी से भारत के बाहरी क्षेत्रों को मजबूती मिली और बिक्री में महज एक अंक की वृद्घि के बावजूद भारतीय निर्माताओं के मार्जिन और मुनाफे में तेजी आई। विदेशी निवेशकों ने इसमें दिलचस्पी दिखाई। अब वैश्विक अर्थव्यवस्था में उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है और जिंस कीमतों में लगातार तेजी की वजह से उभरते बाजार पुन: मजबूत हो रहे हैं। इसका मतलब है कि भारत समेत उभरते बाजारों में अधिक निवेश हो रहा है। विदेशी निवेशकों ने 2017 के पहले तीन महीनों के दौरान उभरते बाजारों की इक्विटी और बॉन्ड फंडों में कुल मिलाकर 55 अरब डॉलर का निवेश किया जबकि 2016 के दौरान यह निवेश 44 अरब डॉलर पर था।
 
निवेशकों का अनुमान है कि अगले दो साल में उभरते बाजारों में प्रमुख कंपनियां मजबूत आय दर्ज करेंगी जबकि पिछले तीन वर्षों में उन्हें महज एक अंक की वृद्घि से संतुष्टï होना पड़ा है। सेंसेक्स-30 कंपनियों का संयुक्त शुद्घ लाभ अगले 12 महीनों में 20.8 फीसदी तक बढऩे का अनुमान है जबकि पिछले 12 महीनों में यह वृद्घि महज 0.3 फीसदी पर रही। दक्षिण अफ्रीका जैसे बाजारों द्वारा बेहतर प्रदर्शन किए जाने का अनुमान है जबकि चीन और मैक्सिको में कंपनियों का प्रदर्शन काफी हद तक उनके भारतीय प्रतिस्पर्धियों के समान रह सकता है। 
 
हालांकि कई विश्लेषक अब भारत में इक्विटी मूल्यांकन को लेकर सतर्क रुख अपना रहे हैं। इक्नोमिक्स रिसर्च ऐंड एडवायजरी के संस्थापक एवं मुख्य कार्याधिकारी जी चोक्कालिंगम कहते हैं, 'उभरती दुनिया में भारत सबसे महंगे बाजारों में से एक बना हुआ है। पिछले समय में यह तेजी उचित थी क्योंकि रक्षात्मक क्षेत्रों - आईटी, फार्मा और एफएमसीजी की कंपनियों ने 2009 के लीमन संकट के बाद से लगातार दो अंक की आय वृद्घि दर्ज की है जिससे भारत निवेशकों के लिए पसंदीदा बन गया। अब रक्षात्मक क्षेत्र एक अंक की धीमी वृद्घि दर्ज कर रहे हें और इसमें कम से कम दो वर्षों तक कोई बदलाव आने के आसार नहीं हैं। इससे हमें अन्य देशों की तुलना में अपने महंगे मूल्यांकन को जायज ठहराना मुश्किल होगा।'
 
आईटी निर्यातकों ने लीमन संकट के बाद से अपनी सबसे कम राजस्व वृद्घि दर्ज की है जबकि फार्मा निर्यात पिछले वित्त वर्ष में डॉलर के संदर्भ में तीन फीसदी घटा। आय के मामले में आईटी भारत का सबसे बड़ा क्षेत्र है और फार्मा के साथ मिलाकर बात की जाए तो इसका प्रमुख सूचीबद्घ कंपनियों की आय में लगभग एक-तिहाई का योगदान है। जब पूंजी पर प्रतिफल की बात की जाए तो सात प्रमुख उभरते बाजारों के सूचकांकों में सेंसेक्स मौजूदा समय में चौथा सबसे ज्यादा महंगा सूचकांक है जिसके बाद ब्राजील, इंडोनेशिया और चीन का स्थान है। 
 
हालांकि आगामी आय अनुमानों के आधार पर सेंसेक्स के वर्ष के अंत तक सबसे महंगा सूचकांक बन जाने की संभावना है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि खपत-आधारित वृद्घि के एक और वर्ष को वित्तीय प्रोत्साहनों से मदद मिलेगी। एमके ग्लोबल फाइनैंशियल सर्विसेज में इंस्टीट्ïयूशनल इक्विटीज के शोध प्रमुख धनंजय सिन्हा का कहना है, 'मुझे वित्त वर्ष 2018 में आय वृद्घि में हल्की चक्रीय तेजी की उम्मीद है और इसे केंद्र सरकार द्वारा खर्च में तेजी लाए जाने से मदद मिलेगी। इसका लाभ मुख्य रूप से उपभोक्ता कंपनियों और छोटे ऋणदाताओं को होगा।' हालांकि यदि जिंस कीमतें ऊंची बनी रहीं तो मजबूत राजकोषीय खर्च से चालू खाते के घाटे और मध्यावधि से दीर्घावधि में ब्याज दरों में बदलाव की स्थिति पैदा हो सकती है। 
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