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कश्मीर अशांति की हकीकत से अनजान कॉर्पोरेट जगत

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  May 01, 2017

कश्मीर की मौजूदा अशांति के बारे में लगभग सभी कॉर्पोरेट शख्सियतों की अपनी एक राय है। कॉर्पोरेट जगत का कहना है कि असहमति और विरोध की आवाज को सख्ती से कुचल देना चाहिए। कश्मीर के हालात को लेकर सोशल मीडिया पर एक तरह की जंग चल रही है। कश्मीरी युवकों की पिटाई कर रहे भारतीय जवानों का वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया गया है जिसमें उन्हें पाकिस्तान के खिलाफ नारे लगाने के लिए मजबूर किया जा रहा है। एक व्हाट्सऐप ग्रुप में जब यह वीडियो पोस्ट किया गया तो किसी ने कहा कि पथराव करने वालों के साथ एकदम सही सुलूक किया जा रहा है। ग्रुप के अन्य सदस्यों ने भी उस पर अपनी सहमति जताई। 

 
बहरहाल यह लेख इस पर नहीं है कि कश्मीर में पथराव कर रहे लोग अशांत नागरिक ही हैं जो ग्रेनेड फेंकने वाले दहशतगर्दों के रूप में भी तब्दील हो सकते थे। यह साबित करने की भी कोशिश नहीं की जाएगी कि कश्मीरी पंडितों के साथ हुई ज्यादती के चलते कश्मीरी बच्चों पर हो रहे जुल्म को न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता है। कश्मीर की जमीनी हकीकत को लेकर कॉर्पोरेट जगत में बनी धारणाओं के मद्देनजर इस लेख में यह परखने की कोशिश की जाएगी कि अगर कश्मीर में लागू वैधानिक ढांचे को पूरे देश के कॉर्पोरेट समुदाय पर लागू कर दिया जाय तो किस तरह की स्थिति पैदा हो सकती है? 
 
कश्मीर (और काफी हद तक पूर्वोत्तर भारत में भी) में सरकार को हासिल विशेष अधिकारों को कॉर्पोरेट क्षेत्र में लागू किए जाने के असर का आकलन इसका सबसे सरल तरीका होगा। भारत में कश्मीर के विलय को संवैधानिक आधार देने वाले अनुच्छेद 370 के प्रति कटु विचार रखने वाले अधिकतर लोगों ने संभवत: सशस्त्र बल विशेष शक्ति अधिनियम (अफस्पा), 1990 के प्रावधानों को पढ़ा भी नहीं है। अफस्पा के तहत कोई भी सरकारी अधिकारी किसी भी निवासी की जिंदगी और संपत्ति में किसी भी तरह का दखल देने के लिए स्वतंत्र है और उसके लिए उसे कभी जवाबदेह भी नहीं ठहराया जा सकता है।
 
अफस्पा कानून को पढऩा काफी आसान है। हालांकि इसे पढ़ते हुए आप खुद को काफी असहज महसूस कर सकते हैं। इसमें मुश्किल से आठ प्रावधान ही हैं। कंपनी जगत को विवादों के निपटान के लिए राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण या प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण जैसे कई मंच मिले हुए हैं जहां पर नियंत्रण एवं संतुलन की व्यवस्था लागू होती है। लेकिन अफस्पा में ऐसी व्यवस्था की कोई गुंजाइश नहीं है। अफस्पा जैसे कानून के रहते किसी भी अदालत में किसी सरकारी कर्मचारी को भ्रष्टाचार काआरोप चलाने की बात ही भूल जाइए। अफस्पा को कॉर्पोरेट जगत में लागू किए जाने की सूरत में पैदा होने वाले कुछ अन्य संभावित हालात पर एक नजर डालते हैं: 
 
1. अगर सरकार को ऐसा लगता है कि कोई भी उद्योग खतरा पैदा कर रहा है तो वह कानून का उल्लंघन रोकने के लिए सख्त कदम उठा सकती है और उस तरह के पूरे उद्योग या किसी खास हिस्से को ही 'अशांत उद्योग' घोषित कर सकती है।
 
2. इस तरह के अशांत उद्योग में अगर किसी सरकारी अधिकारी को ऐसा लगता है कि कोई व्यक्ति किसी भी कानून व्यवस्था के लिए खतरा पैदा कर रहा है तो वह गोली चलवाने या बल प्रयोग करने का भी आदेश दे सकता है, भले ही इसमें किसी की जान चली जाए।
 
3. किसी अशांत उद्योग से संबंधित किसी भी स्थान से अगर कानून के उल्लंघन की कोशिश होती है तो सरकारी अधिकारी उस स्थान को नष्ट करने का आदेश दे सकता है।
 
4. अगर किसी अधिकारी को ऐसा संदेह होता है कि कोई व्यक्ति कोई अपराध करने वाला है तो वह उसे वारंट के बगैर भी गिरफ्तार कर सकता है। गिरफ्तारी सुनिश्चित करने के लिए जरूरी ताकत इस्तेमाल करने का भी उसे अधिकार है। 
 
5. सरकारी अधिकारी को इस तरह की गिरफ्तारी सुनिश्चित करने के लिए बिना वारंट के किसी भी जगह जाकर तलाशी लेने की छूट है। अगर कोई संपत्ति चुराई गई है तो उसकी बरामदगी के लिए भी अधिकारी बल प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र है।
 
6. अगर किसी सरकारी अधिकारी को किसी वाहन की गतिविधियों को लेकर संदेह होता है तो वह उसे रोकने, उसकी तलाशी लेने और उसे जब्त करने के लिए अधिकृत है। इसके लिए अगर बल प्रयोग की जरूरत पड़ती है तो वह भी कर सकता है। 
 
7. अफस्पा कानून का इस्तेमाल कर रहे प्रत्येक अधिकारी के पास किसी भी दरवाजे, आलमारी, तिजोरी, बक्से या डिब्बे में लगे ताले को तोडऩे का अधिकार हासिल होगा।
 
8. अफस्पा कानून का इस्तेमाल करने वाले किसी भी अधिकारी के खिलाफ सरकार की मंजूरी के बगैर किसी भी अदालत में मुकदमा नहीं चल सकता है।
 
अधिक दिन नहीं हुए जब भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड अधिनियम में ऐसे संशोधन प्रस्तावित किए गए थे जिनमें किसी वारंट के बगैर ही तलाशी एवं जब्ती का अधिकार देने की बात थी। कहा जा रहा था कि प्रतिभूति बाजार की गड़बडिय़ों को दुरुस्त करने के लिए 'जंगी' तरीका अपनाना जरूरी हो गया है लेकिन संसद की स्थायी समिति ने तमाम पक्षों से चर्चा के बाद उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। इसी तरह वित्त विधेयक 2017 में आयकर विभाग को छापे एवं जब्ती की कार्रवाई के बारे में संरक्षण देने की बात कही गई है। जब सरकार की तरफ से इस तरह की शक्तियों का हल्का इस्तेमाल होने लगेगा तो कॉर्पोरेट परिवेश में रहने वाले लोगों को यह आभास होगा कि कश्मीर या पूर्वोत्तर भारत में छोटी दुकान चलाना कितना मुश्किल हो सकता है। जब तक ऐसा नहीं होता है तब तक कश्मीर में प्रदर्शन कर रहे नागरिकों को दंडित करने के लिए सोशल मीडिया पर छिड़ी जंग से कोई राहत नहीं मिलेगी।
 
(लेखक स्वतंत्र विधि परामर्शदाता हैं)
Keyword: jammu kashmir, mahboba mufti, narendra modi,,
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