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संपादकीय /  May 01, 2017

गत वित्त वर्ष की चौथी तिमाही के नतीजे जारी कर चुकी 135 कंपनियों को देखें तो उनके राजस्व आधार में एक साल पहले की तुलना में 17.6 फीसदी बढ़ोतरी हुई है। पहली नजर में तो यह परिणाम अच्छा लगता है लेकिन अगर इनमें से देश की सबसे बड़ी राजस्व वाली कंपनी और सबसे असरदार धातु निर्माता कंपनी को निकाल दिया जाए तो यह वृद्धि घटकर केवल 7.9 फीसदी रह जाती है। एक साल पहले की तुलना में इन कंपनियों का शुद्ध लाभ भी 8.6 फीसदी ही बढ़ा है। इसमें भी चुनिंदा कंपनियों का बड़ा योगदान है। अगर जनवरी-मार्च तिमाही में सर्वाधिक मुनाफा कमाने वाली शीर्ष पांच कंपनियों में से तीन- रिलायंस इंडस्ट्रीज, एचडीएफसी बैंक और हिंदुस्तान जिंक को हटा दिया जाए तो शुद्ध लाभ महज 3.2 फीसदी पर आ जाता है। 

 
रिलायंस इंडस्ट्रीज के राजस्व में वृद्धि की बड़ी वजह पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में हुई बढ़ोतरी और क्षमता विस्तार रही है। हिंदुस्तान जिंक का भी राजस्व बढऩे का कारण यह रहा कि जस्ते और सीसे के दाम क्रमश: 60 फीसदी और 30 फीसदी बढ़े। इसके अलावा उत्पादन में भी 66 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। वैसे एचडीएफसी बैंक और मारुति सुजूकी का भी प्रदर्शन तुलनात्मक रूप से अच्छा रहा है लेकिन अपने दीर्घकालिक औसत से वे फिर भी नीचे ही हैं। खुदरा कर्ज बढऩे, ब्याज दर कम होने और ट्रेजरी आय बढऩे से वित्तीय क्षेत्र भी अच्छे नतीजे दे पाने में सफल रहा है। इसका नतीजा यह हुआ है कि अधिकांश बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय सेवा कंपनियों का राजस्व और शुद्ध लाभ दोनों बढ़ा है। 
 
हालांकि तिमाही परिणाम घोषित कर चुकी सभी कंपनियों का परिचालन लाभ अन्य आय को छोड़कर 4.3 फीसदी दर से बढ़ा है जो पिछली 12 तिमाहियों में सबसे कम है। कच्चे माल की लागत बढऩे से परिचालन मार्जिन भी नौ तिमाहियों में सबसे कम रहा। एक साल पहले की तुलना में मार्जिन के 4.8 फीसदी रहने से मुनाफे पर भी दबाव देखा गया। वैसे कंपनियों ने अन्य आय जुटाकर और निम्न कर दरों की मदद से इस तिमाही में शुद्ध लाभ के मोर्चे पर थोड़ा बेहतर प्रदर्शन किया है। 
 
घरेलू बिक्री पर केंद्रित कंपनियों के आंकड़े बताते हैं कि नवंबर-दिसंबर 2016 के दौरान लागू रही नोटबंदी का असर जनवरी-मार्च 2017 में भी बरकरार रहा। अगर सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों, धातु निर्माताओं, वित्तीय सेवा कंपनियों और रिलायंस इंडस्ट्रीज को इस विश्लेषण से बाहर रख दिया जाए तो मुख्यत: घरेलू बाजार पर केंद्रित कंपनियों के राजस्व और शुद्ध लाभ में क्रमश: 6.4 फीसदी और 5.3 फीसदी की ही बढ़ोतरी हुई है। 
 
हालांकि पिछली तिमाही में कंपनी जगत के समग्र प्रदर्शन का अनुमान लगाने के लिए 135 कंपनियों का नमूना काफी नहीं माना जाएगा लेकिन इससे इतना तो साफ है कि कई वर्षों से भारतीय कंपनी जगत के लिए विकास का इंजन रहे सॉफ्टवेयर सेवा क्षेत्र में विकास धीमी होने से छटपटाहट आने लगी है। इस दौरान 16 आईटी कंपनियों का राजस्व चार फीसदी से भी कम बढ़ा है। इन कंपनियों का शुद्ध लाभ तो केवल 0.6 फीसदी ही बढ़ा है। अर्थव्यवस्था के दो अन्य क्षेत्रों फार्मा और दूरसंचार के भी खास प्रदर्शन की संभावना कम ही दिख रही है। 
 
भारतीय फार्मा कंपनियों पर अमेरिकी खाद्य एवं औषधि विभाग की गुणवत्ता निगरानी बढऩे से काफी दबाव देखा जा रहा है। इसी तरह दूरसंचार क्षेत्र भी रिलायंस जियो की शुरुआत के बाद से ही शुल्क दरों को लेकर जंग में उलझा हुआ है। चौथी तिमाही के अब तक के प्रदर्शन को देखकर यही कहा जा सकता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को दोबारा पटरी पर आने में अभी वक्त लगेगा।
Keyword: economy, राजकोषीय दायित्व एवं बजट प्रबंधन, एफआरबीएम, समिति, राजकोषीय परिषद, गठित,
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