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मोदी की नेतृत्व शैली का 'पंचतंत्र'

ए के भट्टाचार्य /  April 30, 2017

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने सभी पूर्ववर्तियों से काफी अलग दिखते हैं। मोदी की नेतृत्व शैली का विश्लेषण कर रहे हैं ए के भट्टाचार्य

 
प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी अगले महीने तीन साल पूरे कर लेंगे। किसी भी व्यक्ति कीनेतृत्व शैली का अंदाजा लगाने के लिए इतना वक्त पर्याप्त है। यह बात साफ हो चुकी है कि प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी अपने पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह से पूरी तरह अलग हैं। यहां तक कि अन्य सभी पूर्ववर्तियों से भी वह काफी अलग दिखते हैं। करीब 15 वर्षों तक देश की प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा गांधी ही शायद इकलौती ऐसी नेता हैं जिनके कामकाज का तरीका कुछ हद तक मोदी से मिलता-जुलता था। दोनों ही अपने दौर के सशक्त नेता रहे हैं। दोनों ही नेताओं का अपने देश की आम जनता के साथ मजबूत नाता कायम रहा है। इसके अलावा दोनों ही नेताओं को अपनी शक्ति और सत्ता का बखूबी अहसास रहा है और उन्हें यह भी पता है कि इनका इस्तेमाल किस तरह करना है? 
 
इन समानताओं के बावजूद मोदी कई मायनों में काफी अलग दिखते हैं। मोदी की नेतृत्व शैली को व्याख्यायित करने वाले पांच अहम पहलुओं से हम इसे समझ सकते हैं। इनमें से कुछ की इंदिरा गांधी से साम्यता हो सकती है लेकिन मोदी के दौर में उन पहलुओं को नया आयाम और नया रंग धारण करने का मौका मिला है। पहला, मोदी का नौकरशाही पर पूर्ण नियंत्रण है। जब उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में प्रवेश किया था तब वह पूरी तरह बाहरी व्यक्ति थे लेकिन बहुत कम समय में ही यह पता चल गया कि नौकरशाही पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए क्या कदम उठाने होंगे? लोकसेवकों को काबू में रखने के लिए मोदी ने मध्यस्थ की मौजूदगी को ही नकारने का तरीका अपनाया। मनमोहन सिंह की शैली के ठीक उलट मोदी ने यह सुनिश्चित किया कि सभी मंत्रालयों और विभागों में महत्त्वपूर्ण पदों पर होने वाली नियुक्तियों को अंतिम रूप देने में न केवल उनकी भूमिका हो बल्कि वह निर्णायक भी हो। इस तरह कई वरिष्ठ केंद्रीय मंत्रियों को यह आभास हो गया कि उनके शीर्ष अधिकारियों की प्रधानमंत्री और पीएमओ तक सीधी पहुंच रहती है।
 
इस रणनीति के अनुरूप मोदी ने तमाम मंत्रालयों के शीर्ष नौकरशाहों को जवाबदेह बनाने वाला रिश्ता विकसित किया। विभिन्न मंत्रालयों के सचिवों के साथ प्रधानमंत्री की समय-समय पर होने वाली समीक्षा बैठकों में सरकार की प्रमुख योजनाओं की प्रगति के बारे में ब्योरा दिया जाता रहा है। हालांकि इन बैठकों में संबंधित मंत्रालयों के प्रभारी मंत्री भी मौजूद रहते हैं लेकिन वहां बैठे हरेक शख्स को यह अहसास हो जाता है कि असली बॉस कौन है और आखिर में किसकी बात का वजन होगा? 
 
बजट तैयार करने के समय उठने वाले मुद्दों से लेकर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) या नोटबंदी जैसे अहम फैसलों को मूर्तरूप दिए जाने के समय भी प्रधानमंत्री का संबंधित अधिकारियों के साथ सीधा संपर्क होता रहा है। वह महत्त्वपूर्ण नीतियों के निर्माण एवं क्रियान्वयन से सीधे तौर पर जुड़े रहते हैं। यह मनमोहन सिंह की शैली के ठीक उलट है जो 10 वर्षों तक पीएमओ, अपने मंत्रियों और फाइलों के जरिये काम करते रहे।
 
मोदी की कार्यशैली की दूसरी खासियत सरकार चलाने और फैसले लेने के उनके तरीके में नजर आती है। पी वी नरसिंह राव सरकार के समय अक्सर यह मजाक चलता था कि उसमें केवल डेढ़ लोग ही सुधार-समर्थक हैं। लेकिन मोदी सरकार में सुधारों को लेकर अनिच्छा जताने वाले लोगों को लेकर ऐसा नहीं कहा जा सकता है। निश्चित तौर पर इस सरकार में हरेक फैसले पर खुद प्रधानमंत्री मोदी की सीधी या परोक्ष मंजूरी जरूर होती है। तभी तो कोयला खदानों का आवंटन नीलामी के जरिये करने का फैसला मोदी की अगुआई वाली बैठक में ही लिया जाता है। यहां तक कि किसी विशेषज्ञ पैनल की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने या नहीं करने का फैसला भी प्रधानमंत्री या उनके कार्यालय द्वारा ही लिया जाता है। कैबिनट बैठकों में भी केंद्रीय नेता के तौर पर मोदी की प्रधानता परिलक्षित होती है। मोदी बेहद सख्ती से अपनी सरकार चलाते हैं और अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों के किसी भी विरोध या असहमति को शायद ही बर्दाश्त करते हैं। मसलन, नोटबंदी का फैसला जिस कैबिनेट बैठक में लिया गया उसमें उस पर नाममात्र की ही चर्चा हुई थी। इसी तरह वीआईपी शख्सियतों की कारों पर लाल बत्ती का इस्तेमाल बंद करने का फैसला भी पहले प्रधानमंत्री ने लिया और बाद में उसे कैबिनेट की मंजूरी के लिए रखा गया था।
 
तीसरा, मोदी की नेतृत्व शैली में मुद्दों को लेकर लचीला रुख अपनाने का भाव नजर आता है। मई 2014 में सरकार गठन के समय मोदी ने विकास, रोजगार सृजन और काले धन के खात्मे पर ध्यान केंद्रित किया था। लेकिन सरकार के दो साल पूरा होते ही उन्हें अहसास हो गया था कि विकास का एजेंडा लंबे समय तक चलने वाला कार्य है और नौकरियों का सृजन भी मौजूदा आर्थिक परिदृश्य में काफी दुष्कर होगा। इसके अलावा काले धन के मोर्चे पर भी जल्दी कुछ ठोस कदम उठाने होंगे। ऐसे में अचरज नहीं है कि मोदी के भाषणों में अब नौकरियों का जिक्र नहीं होता है। सरकार का ध्यान अब आधारभूत ढांचे के विकास पर केंद्रित हो चुका है और उनमें से कई योजनाओं के लिए वर्ष 2022 तक का लक्ष्य रखा गया है जो कि 2019 में होने वाले आम चुनावों के बहुत बाद है। नोटबंदी के फैसले को भी काले धन के खात्मे के लिए उठाया गया कदम बताया गया। जैसे ही नोटबंदी से काले धन के उन्मूलन का मकसद पूरा नहीं होने की आशंका जताई जाने लगी, सरकार ने उसका केंद्र बिंदु डिजिटल भुगतान पर कर दिया। यह इस बात की निशानी है कि नाकामी की आशंका देख सरकार अपना रास्ता बदलने को तैयार है। 
 
चौथा, प्रधानमंत्री मोदी को अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में संचार की अहमियत का बखूबी अहसास है। फर्क यह है कि वह दोतरफा संवाद के बजाय एकतरफा संचार ही पसंद करते हैं। यही कारण है कि उनकी तरफ से अब तक कोई भी संवाददाता सम्मेलन नहीं किया गया है जहां उनसे विभिन्न मुद्दों पर सवाल पूछे जा सकें। वह लोगों तक जो भी संदेश पहुंचाना चाहते हैं, उसके लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं। ऐसा लगता है कि संचार का यह तरीका उन्हें पसंद है क्योंकि न तो वह और न ही उनकी सरकार असहमति के स्वर सुनना पसंद करती है।
 
पांचवां और अंतिम, मोदी पहले से चल रही योजनाओं को नए कलेवर में पेश करने में माहिर हो चुके हैं। वह इन योजनाओं के प्रोत्साहन में बेहद आक्रामक तरीके से लग जाते हैं। इन योजनाओं के क्रियान्वयन को प्रभावी तरीके से लागू करने पर उनका खास जोर होता है। इसके अलावा वह उन योजनाओं को इतनी शिद्दत से अपनाते हैं कि वह उन्हीं से जुड़ जाती है और बहुत सारे लोग यह भूल जाते हैं कि उन योजनाओं की शुरुआत तो पिछली सरकार ने की थी। आधार पहचान योजना और गरीबों के लिए बैंक खाते खोलने जैसी योजनाएं इसकी मिसाल के तौर पर देखी जा सकती हैं। इन सभी पहलुओं से मिलकर मोदी की नेतृत्व-शैली का पंचतंत्र बनकर तैयार होता है। इस बात को लेकर बहस हो सकती है कि उनकी नेतृत्व-शैली कई अन्य सिद्धांतों से भी प्रभावित हो सकती है। लेकिन ये पांच सिद्धांत मोदी की नेतृत्व-शैली के आकलन के प्रारंभिक बिंदु हो सकते हैं। 
Keyword: narendra modi, development,,
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