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मप्र: खेती में करिश्मा

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  April 28, 2017

दुनिया में कुछ अर्थव्यवस्थाएं ही लंबे समय तक दो अंकों की विकास दर कायम रख पाई हैं। आम तौर पर कृषि क्षेत्र की विकास दर सबसे कम होती है लेकिन जिस राज्य में यह क्षेत्र दो अंकों की विकास दर हासिल कर लेता है, वह हैरत में डालने वाली बात है। मध्य प्रदेश ने वर्ष 2010 से लेकर 2015 तक पांच वर्षों में कृषि क्षेत्र में 13.9 फीसदी की दर से विकास किया है। अगर इन पांच वर्षों के सालाना विकास दर को एक साथ जोड़कर देखें तो यह कुल 92 फीसदी हो जाता है। अर्थव्यवस्था के सभी मौजूदा आंकड़ों के बीच मध्य प्रदेश का कृषि क्षेत्र में प्रदर्शन अचंभे में डाल देता है। राष्ट्रीय स्तर पर कृषि विकास दर के चार फीसदी से भी कम होने के संदर्भ में इस राज्य का प्रदर्शन और भी खास है। 

 
असलियत तो यह है कि खुद मध्य प्रदेश की भी वर्ष 2005-10 के दौरान कृषि विकास दर पांच फीसदी से अधिक नहीं रही थी। हालांकि गुजरात और झारखंड जैसे कुछ राज्यों ने भी हाल में कृषि के मोर्चे पर काफी अच्छा प्रदर्शन किया है लेकिन मध्य प्रदेश की तुलना में उनके आंकड़े फीके नजर आते हैं। मध्य प्रदेश की इस अनूठी कामयाबी की वजह जानी-पहचानी हैं। इन्हें आम तौर पर बिजली, सड़क और पानी के तौर पर पेश किया जाता है। बड़े पैमाने पर सिंचाई सुविधाओं के विकास, कृषि क्षेत्र को मिलने वाली बिजली आपूर्ति में खासा सुधार होने और ग्रामीण सड़कों का बेहतर नेटवर्क होने से बाजारों तक पहुंच होने का भी इसमें खास योगदान रहा है। इन सुविधाओं के चलते फसलों की उपज में उछाल आई है। 
 
राज्य में फसलों की बुआई का रकबा बढ़ा है और अब वहां के किसान साल भर में तीन-तीन फसलें उगाने लगे हैं। आज मध्य प्रदेश केंद्रीय गेहूं भंडार में योगदान के मामले में पंजाब के बाद दूसरे स्थान पर पहुंच गया है। लेकिन मध्य प्रदेश कृषि क्षेत्र में हासिल कामयाबी को अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों- सेवाओं और उद्योगों में दोहरा पाने में नाकाम रहा है। पीआरएस की तरफ से दिए गए आंकड़ों के मुताबिक अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों की विकास दर लगातार गिरावट पर है। विनिर्माण क्षेत्र की औसत विकास दर 2005-10 के 9.5 फीसदी की तुलना में 2010-15 के दौरान तीव्र गिरावट के साथ 2.9 फीसदी रही है। सेवा क्षेत्र में भी विकास दर 7.6 फीसदी से कम होकर 6.3 फीसदी पर आ गई। 
 
अन्य क्षेत्रों के कमजोर प्रदर्शन का नतीजा यह हुआ है कि राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि का हिस्सा लगातार बढ़ता जा रहा है और अब तो यह राष्ट्रीय जीडीपी में कृषि के अंशदान की तुलना में दोगुने से भी अधिक हो चुका है। यह काफी असामान्य होने के साथ सामान्य समझ के उलट भी है। कृषि उत्पादन में तीव्र वृद्धि से आम तौर पर परिवहन, कारोबार, वित्त एवं बिजली उपभोग में भी तेजी आनी चाहिए। इसके अलावा व्यक्तिगत उपभोग और विनिर्माण में भी तेजी आती है। पंजाब की हरित क्रांति के साथ-साथ उसका औद्योगीकरण भी हुआ था। इसकी वजह यह है कि खेती में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों, ट्रैक्टरों, साइकिलों, कपड़ों और वस्त्रों के उत्पादन में भी बढ़ोतरी हुई थी। लेकिन मध्य प्रदेश में कृषि क्षेत्र का विकास अन्य क्षेत्रों में नहीं दोहराया जा सका है जिसके चलते उसकी समग्र आर्थिक प्रगति में मामूली वृद्धि ही हुई।
 
वैसे पिछले कुछ वर्षों में मध्य प्रदेश विकास के राष्ट्रीय स्तर के करीब पहुंचा है। इसी का असर है कि अब मध्य प्रदेश की गिनती देश के सर्वाधिक विकासशील राज्यों में होने लगी है। यहां पर दो सवाल खड़े होते हैं। पहला, मध्य प्रदेश क्या कृषि क्षेत्र की सफलता को लंबे समय तक बरकरार रख पाएगा? वर्ष 2010 में प्रति हेक्टेयर उपज के मामले में इस राज्य की स्थिति खास अच्छी नहीं थी  लेकिन पिछले वर्षों के बेहतर प्रदर्शन के बावजूद फसल उपज, उर्वरक का इस्तेमाल और अन्य मानदंडों पर यह राष्ट्रीय औसत से पीछे ही है। भले ही देश में खेती के कुल इलाके में मध्य प्रदेश का हिस्सा 10.4 फीसदी है लेकिन मूल्यपरक योगदान केवल 8.6 फीसदी ही है। इसका मतलब है कि मध्य प्रदेश के पास कृषि क्षेत्र में प्रदर्शन सुधारने की काफी गुंजाइश है। 
 
दूसरा सवाल देश के पूर्वी इलाकों में कृषि विकास की संभावनाओं से जुड़ा हुआ है। उन इलाकों में अब भी सिंचाई क्षमताओं का पर्याप्त दोहन नहीं किया जा सका है और ग्रामीण सड़कों एवं बिजली आपूर्ति की हालत भी खस्ता है। इसके बावजूद यहां के कुछ राज्य कृषि उत्पादन के मामले में उल्लेखनीय प्रगति कर रहे हैं। लेकिन अब भी बहुत कुछ करने की संभावना है। भारत में बेहद गरीब आबादी का एक बड़ा हिस्सा पूर्वी हिस्से में रहता है और कृषि क्षेत्र में इस परिदृश्य को बदलने की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं।
Keyword: economy, राजकोषीय दायित्व एवं बजट प्रबंधन, एफआरबीएम, समिति, राजकोषीय परिषद, गठित,
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