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कारोबारी जगत को रास नहीं आती साझा नेतृत्व की व्यवस्था

इंसानी पहलू
श्यामल मजूमदार /  April 27, 2017

कारोबारी जगत में इस वक्त बहुत कम ऐसे लोग होंगे जो इन्फोसिस के अध्यक्ष आर शेषशायी की जगह लेना चाहेंगे। फरवरी में मीडिया के साथ सनसनीखेज बातचीत में कंपनी के संस्थापक एन आर नारायणमूर्ति ने दो अहम बातें कही थीं: पहली, कंपनी के बोर्ड को कारोबारी प्रशासन की विफलता की जिम्मेदारी लेनी चाहिए और उसे सुधारना चाहिए तथा दूसरी, बोर्ड को एक सह अध्यक्ष का चयन करना चाहिए। शेषशायी ने जहां पहले मुद्दे को केवल मीडिया का शोर करार देते हुए कहा कि बोर्ड हर किसी की सलाह को पूरी जिम्मेदारी से सुनता है, वहीं कंपनी के बोर्ड ने मूर्ति की दूसरी सलाह मानते हुए एक सह अध्यक्ष की व्यवस्था स्वीकार की। विडंबना यह है कि शेषशायी को बोर्ड के उस फैसले का भी बचाव करना पड़ा। 

 
वह यही कह पाए कि कंपनी को नेतृत्व प्रदान करने के लिए व्यापक दायरे की आवश्यकता है। यह अत्यंत अस्पष्टï वक्तव्य है। किसी ने यह समझाने की जरूरत नहीं समझी कि उद्योग जगत के कुछ सर्वाधिक मजबूत नामों से बनने वाले बोर्ड में जहां एक मजबूत प्रबंध निदेशक, मुख्य कार्याधिकारी और  मुख्य परिचालन अधिकारी हैं, वहां एक सह अध्यक्ष की क्या आवश्यकता है? कंपनी के नए सह अध्यक्ष रवि वेंकटेशन का प्रदर्शन निस्संदेह पहले से बहुत अच्छा है लेकिन वह भी इस नई भूमिका के पीछे कोई ठोस दलील नहीं दे सके। उन्होंने कहा कि कुछ अहम क्षेत्रों में शेषशायी नेतृत्व करेंगे जबकि वह खुद सहायक भूमिका निभाएंगे जबकि अन्य में वह स्वयं नेतृत्व करेंगे और शेषशायी तथा अन्य सहायक भूमिका निभाएंगे।
 
निश्चित तौर पर सह अध्यक्षों की भूमिका और उनकी जिम्मेदारियों का अलग-अलग वर्गीकरण होगा। इसके अभाव में समस्याएं खड़ी होना तय है। प्रॉक्सी सलाहकार फर्म आईएएस भी कह चुकी है कि अगर संस्थान में एक से अधिक नेतृत्वकर्ता हुए तो वहां गुटबाजी की आशंका रहती है। एक सह अध्यक्ष की नियुक्ति होने से बोर्ड का शक्ति संतुलन भी बदल जाता है। हो सकता है कि इससे विशाल सिक्का की स्थिति पर कोई फर्क न पड़े लेकिन वास्तव में उनकी प्रभाव क्षमता पर असर पड़ेगा। सिक्का इस पूरे परिदृश्य पर दार्शनिक अंदाज में कहते हैं, 'विंसेंट वान गॉग ने एक बार एक पेंटिंग बनाई थी जिसे नाम दिया टू चेयर्स (दो कुर्सियां) लेकिन यह चित्र दरअसल एक ही कुर्सी का था।' सलाहकारों का कहना है कि दो अध्यक्षों का मॉडल अक्सर संचार की कमी से विफल होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि दो मजबूत लोगों के काम करने का तरीका भी अलग होता है। दोहरा नेतृत्व निर्णय प्रक्रिया को भी लंबा बनाता है और विरोधाभासी बिंदुओं को सामने रखता है। सच तो यह है कि सह अध्यक्ष मॉडल शायद ही कहीं लंबे समय तक कारगर रहा हो। 
 
यह तरीका विप्रो, डायचे बैंक, ब्लैक बेरी बनाने वाली कंपनी रिसर्च इन मोशन, सिटी ग्रुप, ऑरेकल आदि किसी भी कंपनी में सफल नहीं रहा है। डायचे बैंक के पुनर्गठन की कोशिश में तीन साल तक संघर्ष करने के बाद और अंशधारकों, विश्लेषकों और कर्मचारियों को नई नीति के बारे में समझाने के बावजूद अंशु जैन और जर्गन फिटशन को अचानक अपना इस्तीफा सौंपना पड़ा। डायचे बैंक ने तत्काल दोहरे नेतृत्व की व्यवस्था समाप्त की और जॉन क्रेयान को यह पद सौंप दिया। 
 
ऑरेकल के लैरी एलिसन ने अपनी जगह एक नहीं बल्कि दो लोगों को नियुक्त किया। लेकिन यहां भी नतीजे संतोषजनक नहीं रहे। कई लोग यह भी कहते हैं कि विप्रो के अध्यक्ष अजीम प्रेमजी की दो सीईओ की नीति गलत थी और नाकाम रही। इसी के चलते विप्रो दोबारा एक सीईओ वाली व्यवस्था पर लौट गई। रिसर्च इन मोशन में भी यह प्रयोग विफल रहा और इसके चलते जिम बालसिली और माई लजार्डिस को इस्तीफा देना पड़ा। शुरुआत में उनको सफलता मिली लेकिन बाद में कठिन सामरिक निर्णयों के वक्त वे विफल रहे। पूरे संस्थान में इसके चलते भ्रम फैल गया था क्योंकि सह नेतृत्व का मॉडल विफल वफादारियों में विचलन की वजह बन रहा था। 
 
सह नेतृत्व से निर्णय प्रक्रिया में धीमापन आता है क्योंकि पारपरिक पदसोपान पद्घति की जगह यहां कई लोग शामिल होते हैं और इससे क्रियान्वयन धीमा होता है। यह इसलिए क्योंकि संचार और सहमति हासिल करने में सामान्य से बहुत ज्यादा वक्त लगता है। अगर सह-नेतृत्वकर्ताओं के बीच विवाद हुआ तो हालात और अधिक खराब हो जाते हैं। सबसे बड़ी बात बोर्ड के निदेशक कभी नहीं चाहते कि उनको सत्ता संघर्ष में पक्षधरता दिखानी पड़े।
 
सन 1998 से 2000 के बीच जब जॉन रीड और सैंडी वेल सिटी ग्रुप के सीईओ के रूप में आपस में उलझे तो यही हुआ था। वे दोनों मजबूत शख्सियत के मालिक थे और उनका नजरिया भी तगड़ा था। ऐसे में कंपनी की दिशा तय करने को लेकर विवाद हुआ। आखिरकार यह दोहरी व्यवस्था न तो उनके हित में साबित हुई, न ही सिटी ग्रुप के। इन्फोसिस भी अगर यह समझ जाए तो बेहतर है कि संगठनात्मक प्रभाव बेहतर करने के क्रम में शीर्ष प्रबंधन में अप्राकृतिक बदलाव करना कोई हल नहीं है। अगर सह संस्थापक एक दूसरे को समान मानते हों तो भी इसका यह तात्पर्य नहीं है कि वे हमेशा सहमत ही होंगे। जब वे सहमत नहीं होते तो निर्णय कौन करेगा? अगर इस प्रश्न का उत्तर बोर्ड है तो फिर सह अध्यक्ष की जरूरत ही क्या है? ये कुछ अहम सवाल हैं और इन्फोसिस को जल्द ही इनका जवाब तलाश करना होगा।
Keyword: infosys, इन्फोसिस, अध्यक्ष आर शेषशायी,
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