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उत्तर प्रदेश में भारी जीत के बाद विकास की बारी

पार्थसारथि शोम /  April 26, 2017

उत्तर प्रदेश की नई सरकार के समक्ष आर्थिक और सामाजिक संदर्भों में कई तरह की चुनौतियां सर उठाए खड़ी हैं। इस बारे में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं पार्थसारथि शोम

 
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में 75 फीसदी से भी अधिक सीटों पर जीत मिली। जीत का प्रतिशत भले ही चौंकाने वाला रहा लेकिन उसे बहुमत मिलने पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। पार्टी ने मतदाताओं से जमकर वादे किए और उसकी सफलता की एक वजह यह भी रही कि पार्टी लोगों में यह भरोसा पैदा करने में कामयाब रही कि प्रधानमंत्री स्वयं इन वादों का ध्यान रखेंगे। अब बेहतर प्रदर्शन करने की जिम्मेदारी प्रदेश के मुख्यमंत्री की है। ये तमाम बातें स्वाभाविक तौर पर एक तुलना भी पैदा करती हैं कि उत्तर प्रदेश आज अन्य बड़े राज्यों (मोटे तौर पर 15) की तुलना में कहां खड़ा है।
 
अगर चुनिंदा आर्थिक संकेतकों की बात करें तो ताजातरीन आंकड़े वर्ष 2010-15 की अवधि से ताल्लुक रखते हैं। पहली बात तो यह कि उत्तर प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय देश की औसत प्रति व्यक्ति आय की आधी है और उत्तर प्रदेश को इस मामले में 15 राज्यों में 14वां स्थान हासिल है। एक ओर जहां मैं यह निष्कर्ष निकालता हूं कि ऐसे निम्र स्तर से शुरुआत के बावजूद प्रत्येक रुपये पर उत्तर प्रदेश का प्रतिफल उच्च होना चाहिए। वहीं दूसरी ओर उत्तर प्रदेश को वास्तव में निवेश व्यय पर काम करना होगा और हर तरह की लीकेज पर रोक लगानी होगी ताकि उत्पादन को महत्त्वपूर्ण ढंग से प्रभावित किया जा सके। उदाहरण के लिए बिजली उत्पादन का एक अहम सूचकांक है। उत्तर प्रदेश में प्रति व्यक्ति बिजली खपत देश के औसत के आधे से भी कम है। इस सूची में भी प्रदेश को 15 प्रमुख राज्यों में 13वां स्थान हासिल है। 
 
उत्तर प्रदेश मूल रूप से कृषि प्रधान प्रदेश है और उससे भी अहम बात यह है कि प्रदेश की कृषि रैंकिंग भी बेहतर है। एक हेक्टेयर से कम की जोत के हिसाब से देखा जाए तो यह 15 राज्यों में 14वें स्थान पर है। जबकि कुल बुआई रकबे के अनुपात में सिंचाई की दृष्टिï से देखा जाए तो यह तीसरे स्थान पर है। फसल के घनत्त्व के मामले में उत्तर प्रदेश छठे स्थान पर और उर्वरक खपत के मामले में यह सातवें स्थान पर है। गेहूं और चावल के उत्पादन के मामले में प्रदेश को चौथा और आठवां स्थान हासिल है।
 
कृषि क्षेत्र में तुलनात्मक बढ़त के बाद सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश में संगठित क्षेत्र में 90 फीसदी तक रोजगार मुहैया करा पाने के वादे को कितनी तवज्जो दी जानी चाहिए। खासतौर पर तब जब प्रति एक लाख की आबादी में पंजीकृत फैक्टरियों में औसतन प्रतिदिन रोजगार पाने वाले लोगों के मामले में प्रदेश 14वें स्थान पर है। ऐसे में सवाल यह बनता है कि कृषि क्षेत्र में मिल रही बढ़त के बावजूद अन्य क्षेत्रों की ओर रुख करने में क्या समझदारी है। इसके बजाय कृषि क्षेत्र के आधुनिकीकरण और जोत को बेहतर बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए। इसके अलावा युवाओं को विज्ञान, इंजीनियरिंग और कृषि व्यवसाय के बारे में सूचित और शिक्षित किया जाना चाहिए। 
 
एक बार फिर उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था को गति पकडऩे के लिए बैंक ऋण की अहम आवश्यकता है। आर्थिक गतिविधियों के लिए कृषि ऋण मुहैया कराए बिना काम नहीं बनने वाला। ताजातरीन आंकड़ा बताता है कि उत्तर प्रदेश में ऋण-जमा अनुपात देश के औसत के आधे से अधिक है और इस सूची में उसे 13वां स्थान हासिल है। अच्छी बात यह है कि सरकार ने कृषि ऋण माफ करने का वादा किया है। जैसा कि मैंने पहले भी कहा है, इसकी भरपाई बड़े कारोबारियों से ही की जानी चाहिए। 
 
सामाजिक आर्थिक संकेतकों के मामले में उत्तर प्रदेश देश के औसत के सामने कहां खड़ा है यह भी जानने लायक है। यहां पर तस्वीर निहायत निराश करने वाली है। केवल प्राथमिक और द्वितीयक स्कूलों के मामले में हालात बेहतर हैं। प्रति एक लाख की आबादी पर स्कूलों की बात करें तो यह ठीकठाक स्थिति में है। अन्य तमाम मानकों पर यह नाकाम है। उदाहरण के लिए हाईस्कूलों के मामले में यह 14वें स्थान पर है। देश में प्रति एक लाख की आबादी पर 17 हाई स्कूल हैं जबकि उत्तर प्रदेश में यह औसत केवल नौ है। उत्तर प्रदेश साक्षरता दर के मामले में भी 12वें स्थान पर है। इससे दो निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। पहला, माध्यमिक स्कूल पास करने वाले छात्रों के हाई स्कूल में प्रवेश लेने की दर अन्य राज्यों की तुलना में काफी कम है और दूसरा, संगठित क्षेत्र के रोजगार के लिए हाईस्कूल डिप्लोमा वाले बच्चों की कमी है। ऐसे में शिक्षक-छात्र उपस्थिति की निगरानी से कुछ बातें समझी जा सकती हैं। 
 
स्वास्थ्य की बात करें तो प्रति एक लाख की आबादी पर अस्पतालों और बेड की हालत बहुत खराब है। इनका औसत देश के औसत के आधे से भी कम है। इन दोनों ही मामलों में उत्तर प्रदेश 15 प्रमुख राज्यों में क्रमश: 14वें और 13वें स्थान पर है। अन्य अहम आंकड़ों पर भी प्रदेश की हालत खस्ता है। जन्म दर के मामले में वह 15वें स्थान पर, मृत्यु दर के मामले में 11वें स्थान पर और शिशु-मातृ दर के मामले में वह 14वें स्थान पर है। इस सिलसिले में अगर चिकित्सकों की 25 फीसदी रिक्तियों को भरने से शुरुआत की जाए तो बेहतर होगा। इस प्रकार देखा जाए तो उत्तर प्रदेश में असंख्य सामाजिक और आर्थिक चुनौतियां हैं। शायद नए प्रशासन में आए बदलाव के बाद जनसेवाओं की आपूर्ति की प्रक्रिया में तेजी से बदलाव आए और आर्थिक वृद्घि हासिल करने में मदद मिले। लेकिन इसे हासिल करने के लिए ठोस नीतियां अपनानी होंगी और आर्थिक पहलुओं को ध्यान में रखना होगा। 
 
ऐसे में अगर मैं गोरखनाथ धाम में योगी आदित्यनाथ के आतिथ्य और स्वागत सत्कार का जिक्र न करूं तो बात पूरी नहीं होगी। वह एक आनंददायक शाम थी जब उन्होंने मेरे रात्रिभोज की मेजबानी की थी। मुझे आज भी याद है कि इसके बाद उन्होंने एक युवा गाइड के साथ मुझे मंदिर परिसर का भ्रमण करने का अवसर दिया था। वह युवा गाइड मुझे तमाम जगहों पर ले गया। उनमें एक जगह ऐसी थी जहां कहा जाता था कि भीम ने आराम किया था। मुझे अहसास हुआ कि आस्था और विश्वास की यह दुनिया बहुत व्यापक है। इसमें हमारी संस्कृति और धर्म को भी बहुत हद तक समाहित कर लिया है। अब प्रदेश के लिए आर्थिक मोर्चे पर प्रदर्शन करना अहम है। संसाधनों के प्रयोग के मामले में योगी की स्वच्छ छवि स्थानीय तौर पर निर्मित है। मेरी अपेक्षा है कि वह बेहतर प्रदर्शन करने में कामयाब हो सकें। 
Keyword: uttar pradesh, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ,
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