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अतार्किक मूल्यांकन

संपादकीय /  April 26, 2017

आशावाद की एक लहर ने बाजार को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया है। सेंसेक्स और निफ्टी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए हैं। अमेरिकी सूचकांकों डाऊ जोंस इंडस्ट्रियल एवरेज और तकनीकी क्षेत्र के सूचकांक नैस्डैक में भी उछाल है। मूल्यांकन के पारंपरिक तरीकों से देखें तो इस आशावाद को सही ठहरा पाना मुश्किल है। निश्चित तौर पर यह अस्वाभाविक कारकों की बदौलत है। फ्रांस में राष्ट्रपति चुनाव के पहले दौर के बाद जो राहत उभरी है उसने भी इसमें योगदान किया है। अगर एमैनुएल मैक्रॉन फ्रांस के अगले राष्ट्रपति बनते हैं तो यूरोपीय संघ बचा रहेगा। यूरो की कीमतों में इस नतीजे की बदौलत दो फीसदी की उछाल आई। लेकिन मैक्रॉन की जीत अभी तय नहीं है। धुर दक्षिणपंथी और यूरो को शंका की दृष्टिï से देखने वाली नैशनल फ्रंट की मैरीन ली पेन अभी मुकाबले से बाहर नहीं हैं। दूसरे दौर का मतदान 7 मई को होगा और अगर ली पेन ओपिनियन पोल को धता बताते हुए जीत जाती हैं तो 'फ्रेक्जिट' की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। उस दृष्टिï से देखें तो जर्मनी में आगामी सितंबर में चुनाव होने हैं और वहां भी दक्षिणपंथी मुकाबले में हैं। 
 
एक अन्य कारक जिसने कारोबारियों को उत्साहित किया है वह है डॉनल्ड ट्रंप का अमेरिकी निगमित कर दरों में कटौती का वादा। इसके अलावा उन्होंने अमेरिकी बहुरराष्ट्रीय कंपनियों के लिए फायदेमंद प्रस्ताव तैयार करने की बात कही है ताकि वे विदेशों में अर्जित संपत्ति को देश में लाएं। परंतु ट्रंप का अब तक रिकॉर्ड कोई शुभ संकेत नहीं देता। उनके कर प्रस्तावों का विरोध तो खुद उनकी ही पार्टी के कई सदस्य कर सकते हैं। एक और विरोधाभास है। ट्रंप बुनियादी खर्च में इजाफा करना चाहते हैं और बड़ी कर कटौती भी। अगर ऐसा होता है तो अमेरिकी सरकार अपने व्यय की पूर्ति के लिए राजस्व कहां से जुटाएगी? 
 
भारत में आर्थिक वृद्घि की दर तेज होने की उम्मीद है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) निवेशकों के लिए एक और मजबूत कारक है। चाहे जो भी हो लेकिन वृद्घि दर की उम्मीदों के आधार पर बाजार में मौजूदा तेजी को उचित ठहरा पाना मुश्किल है। उदाहरण के लिए निफ्टी देश में 50 सबसे बड़ी कंपनियों का सूचकांक है जो फिलहाल 24 के औसत मूल्य-आय चर पर काम कर रहा है। पारंपरिक संदर्भ में इसे केवल तभी सही ठहराया जा सकता है जबकि संबंधित कंपनियों की आय में 24 फीसदी या अधिक की वृद्घि हो। इस दृष्टिï से देखें तो देश की 50 सबसे बड़ी कंपनियां जो देश के सालाना जीडीपी में अहम योगदान देती हैं उनको 7.5 फीसदी की अपेक्षित वृद्घि दर से कम से कम तीन गुना तेज प्रदर्शन करना चाहिए। तभी मौजूदा मूल्यांकन को सही ठहराया जा सकेगा। हकीकत में आय में वृद्घि की दर के 15 से 20 फीसदी तक पहुंंचने की उम्मीद है। जिन बड़ी कंपनियों ने चौथी तिमाही के नतीजे अब तक घोषित किए हैं उनमें रिलायंस इंडस्ट्रीज के शुद्घ लाभ में 13 फीसदी का इजाफा हुआ है। लेकिन सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की दिग्गज कंपनियों इन्फोसिस, विप्रो और टीसीएस सब ने एकल दर में प्रतिफल का अनुमान जताया है। औषधि क्षेत्र के भी बहुत अच्छा प्रदर्शन करने की उम्मीद नहीं है। 
 
आगे चलकर वैश्विक वृद्घि में कमी आ सकती है क्योंकि संरक्षणवाद पर जोर बढ़ रहा है। कोरिया और दक्षिण चीन सागर में तनाव बढ़ रहा है जिसके अनचाहे परिणाम सामने आ सकते हैं। जीएसटी के बाद माहौल स्थिर होने में कुछ समय लग सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने मूल मुद्रास्फीति का जोखिम जताया है। बहरहाल इस निराशावाद को छोड़ दिया जाए तो कारोबारी बाजार को और अधिक ऊपर ले जाना चाहते हैं। इस क्रम में वे अच्छी खबरों को चुनते हैं, बुरी खबरों को छोड़ देते हैं। यह वक्त सावधान रहने का है। 
Keyword: share, market, sensex, बीएसई, कंपनी, शेयर,,
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