बिजनेस स्टैंडर्ड - जनता का विरोध और सरकार का हस्तक्षेप
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जनता का विरोध और सरकार का हस्तक्षेप

देवाशिष बसु /  April 25, 2017

जनता हर परेशानी में सरकारी हस्तक्षेप की मांग करती है और सरकार खुशी-खुशी दखल देती है। यह सिलसिला अंतहीन समस्याओं का पिटारा खोलता है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं देवाशिष बसु

 
खबरों के मुताबिक गुडग़ांव और फरीदाबाद में तकरीबन 40 शिक्षण संस्थानों द्वारा शुल्क में जबरदस्त इजाफा किए जाने के बाद तगड़ा प्रतिरोध देखने को मिल रहा है। ये शुल्क तो खूब बढ़ाते हैं लेकिन बेहतर शिक्षा व्यवस्था में किसी तरह का निवेश नहीं करते हैं। वे अपने निर्धारित विक्रेताओं से सामान और सेवाएं खरीदने के लिए मां-बाप पर दबाव बनाते हैं। इन सबसे बढ़कर माता-पिता पर अक्सर यह दबाव बनाया जाता है कि वे स्कूल के शिक्षकों से अपने बच्चों को निजी ट्यूशन दिलवाएं। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो इसका दंड उनके बच्चों को भुगतना पड़ता है। शिक्षा का पूरा कारोबार बहुत गड़बड़ है। मां-बाप बच्चों की खातिर इसे सहन करते हैं। अब जब यह सब बरदाश्त के बाहर होने लगा तो वे सड़कों पर उतर आए। जनता का गुस्सा जायज है लेकिन यह कोई समाधान नहीं है। हमारी तात्कालिक प्रतिक्रिया यही होती है कि वे सरकार से इसे हल करने को क्यों नहीं कहते। हमें यह अहसास ही नहीं होता है कि असल समस्या तो सरकार खुद है। 
 
इस आलेख में हम शिक्षा के कारोबार से जुड़ी नैतिकता के बारे में बात नहीं करेंगे। हर समस्या में हम एक ही हल के बारे में ही सोचते हैं। चाहे वह कृषि ऋण का मसला हो, बिल्डरों द्वारा किए जाने वाले शोषण का, कमजोर स्वास्थ्य सुविधाओं का खराब बुनियादी ढांचे का, हमें हमेशा लगता है कि सरकार का ठोस कदम हमें दिक्कतों से निजात दिला देगा। यह एक सहज स्वाभाविक मांग है लेकिन यह याद करना भी श्रेयस्कर होगा कि सरकार ने ही ये सारी परिस्थितियां पैदा की हैं और उसी के कारण हम बेहतर विकल्पों से वंचित हैं। 
अगर शिक्षा की बात करें तो यह अपने आप में उच्च नियमन वाली गतिविधि है। शिक्षा विभाग के पास स्कूलों को मंजूरी देने, वहां क्या पढ़ाया जाएगा यह तय करने और स्कूल की परिस्थितियां कैसी हों यह सब देखने का अधिकार है। वह किसी भी समय किसी भी स्कूल को बंद कर सकता है। लेकिन हकीकत में स्कूलों को कुछ नहीं होता है और यही बात बच्चों के विकास के पूरे दौर में उनको खुशी देने के बजाय उनके और माता-पिता के निराशा का सबब बनती है जो दरअसल स्कूल के ग्राहक भी हैं। 
 
प्राइवेट कॉलेज और स्कूल इस कदर शुल्क इसलिए वसूल कर पाते हैं क्योंकि अच्छे विद्यालयों की तादाद बहुत कम है। ऐसा इसलिए क्योंकि शैक्षणिक संस्थान शुरू करने के लिए जो भी संसाधन जरूरी हैं उन पर या तो सरकार का नियंत्रण है या सरकार उनको प्रभावित करती है। जमीन और इमारत बहुत महंगी हैं, कुछ ही लोग इतने प्रभावशाली हैं कि वे स्कूल शुरू करने की इजाजत हासिल करने के लिए नियम कायदों में बदलाव करा सकें। स्कूल चलाते रहने में एक हद तक सरकारी भ्रष्टïाचार की अहम भूमिका है। यही वजह है कि सक्षम और विचारशील शिक्षाविद इस पूरी प्रक्रिया में नहीं नजर आते। यह कारोबार इतना बुरा है कि केवल राजनेता और उनसे जुड़े लोग ही इसमें दखल देने की हिम्मत कर पाते हैं। देश के अनेक हिस्सों में खासतौर पर महाराष्टï्र में शिक्षण संस्थानों पर राजनेताओं का प्रभुत्व है। इनकी स्थापना चैरिटेबल ट्रस्ट के रूप में की जाती है ताकि इनको सस्ती जमीन मिल सके और इसके बाद वे विशाल कारोबारी साम्राज्य खड़ा कर लेते हैं।
 
कोलकाता में राजनीतिक इकाइयां कॉलेज में दाखिला लेने वाले हर व्यक्ति की समीक्षा करती हैं। वहां मेरिट सूची का कोई मतलब नहीं होता है। आपको इन राजनीतिक दलों को भुगतान करना होता है। शिक्षा विभाग को भी यह बात पता है। ऐसे में उनसे दिक्कत के हल की अपेक्षा करना बेमानी है। परंतु इसके बावजूद जब हालात बेकाबू होने लगते हैं तो हम सरकार से यह उम्मीद करते हैं कि वह दखल दे। हमें इन चीजों को लेकर सावधान रहना चाहिए। 
 
सरकार से हस्तक्षेप की उम्मीद करना दरअसल मुसीबत को न्योता देना है। जन विरोध के हर गंभीर मामले में सरकार अंतत: एक समिति बना देती है और अंत में कानून व्यवस्था और सख्त हो जाती है। हम दहेज और बलात्कार के मामलों में ऐसा होते देख चुके हैं। सवाल यह है कि क्या जमीन पर हालात बदलते हैं? इसका एक अनचाहा परिणाम यह है कि विरोध करने वालों से अलग देश के जो भी नागरिक हैं वे या तो इन कानूनों से पीडि़त होते हैं या वे पीड़क बन जाते हैं। इसके बाद अदालतों की बारी आती है। खासतौर पर निचली अदालतें समय-समय पर अपने निर्णय देती रहती हैं जिनमें ऐसे ही कानूनों का सहारा लिया जाता है। यह तो सभी जानते हैं कि पुलिस अथवा न्याय प्रक्रिया के चक्कर में पडऩे वाला व्यक्ति वित्तीय मोर्चे पर टूट जाता है। 
 
एक ओर जहां जनता सरकारी कदम की मांग करती है वहीं सरकार खुद हर रोज अलग-अलग तरह से हस्तक्षेप करती है। ये सारे कदम उसके हित में होते हैं जबकि आम जनता को नुकसान पहुंचाते हैं। हमारा देश है ही कानून और नियमों का देश है। नए कानून पुराने कानूनों का स्थान लेते जाते हैं। हमारे जीवन का हर पहलू अब नियंत्रित है। एक नागरिक के रूप में अगर आप हर नियम का पालन करते हैं तो आप काम ही नहीं कर पाएंगे। यह बात उद्यमियों के लिए खासतौर पर सही है। जब भी कोई नई सरकार बनती है तो वह तय करती है कि कैसे उसे जनता के लिए काम करना है। लेकिन विधायिका की रुचि पहले से चली आ रही व्यवस्था को भंग करने में नहीं होती है क्योंकि वे मुद्दों को धीमी आंच पर चढ़ाए रखना चाहते हैं। यह उनके हित में होता है। जब समस्या लगभग उबलने लगती है तो हम सरकार से मांग करते हैं कि वह कोई कदम उठाए। सरकार खुशी-खुशी उस मामले में दखल देती है और कोई फौरी हल सुझाती है। हम इस बात को लेकर प्रसन्न होते हैं कि चलो कुछ तो हो रहा है। इसके बाद हम देखते हैं कि कोई नया संकट हमारे सामने है। 
 
हमारी सरकार के लगातार विस्तार और रोज ब रोज नए नियम आने के बावजूद हमारा जीवन कतई आसान नहीं है। श्रेष्ठïता के कोई खास मायने नहीं हैं और न्याय व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है। कोई भी सरकार जो वास्तव में लोगों का जीवन सुधारने की तमन्ना रखती है, उसे अपने हर कदम की एक साधारण जांच करनी चाहिए। उसे सोचना चाहिए कि क्या इससे अपेक्षित शांति, न्याय, कम लागत और न्यूनतम तनाव पैदा होगा? इन प्रश्नों के उत्तर हमें कई चौंकाने वाले विकल्पों की ओर ले जाएंगे। चतुर राजनेता इन पर विचार कर सकते हैं। 
Keyword: education, fees,,
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