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देश में स्वच्छता के विस्तार के लिए सीवेज कारोबार पर हो नया विचार

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  April 24, 2017

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के कार्यकाल के तीन वर्ष पूरे होने को हैं। ऐसे में नदियों की सफाई जैसी उसकी सबसे महत्त्वाकांक्षी योजना, खासतौर पर गंगा सफाई की बात करें तो उसमें मध्यावधि सुधार और हस्तक्षेप का वक्त आ गया है। हकीकत यह है कि कोई खास जमीनी बदलाव देखने को नहीं मिला है। नदियां अब भी प्रदूषित हैं। शहरों का कचरा बाहर निकालने वाली नालियां अब भी गंदगी से भरी हुई हैं और प्रदूषण में इजाफा ही कर रही हैं। सच तो यह है कि शौचालय केवल गंदगी इक_ïा करने का जरिया बने हुए हैं। जब हम शौचालय को फ्लश करते हैं या उसमें पानी डालते हैं तो मल एक पाइप वाली नाली में जाता है। संभव है यह नाली सीवर ट्रीटमेंट प्लांट से जुड़ी हो या हो सकता है ऐसा नहीं भी हो। हो सकता है वह प्लांट से जुड़ी हो लेकिन वह काम ही नहीं कर रहा हो। सबसे महत्त्वपूर्ण बात है ऐसे शौचालय बनाना जो काम करते हों और जो ऐसी व्यवस्था से जुड़े हों जहां मल का समुचित और सुरक्षित निस्तारण हो जाता हो। ऐसा होगा तो वह प्रदूषण का एक नया माध्यम नहीं बनेगा। साफ है कि शौचालय निर्माण को साफ-सफाई से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।

 
लेकिन यहां पर एक अवसर भी है कि काम को ठीक ढंग से अंजाम दिया जा सके। अब तक शहरी साफ-सफाई काफी महंगी रही आई है। इसके लिए पहले तो पानी चाहिए। पानी को जितनी दूर तक ढोना पड़ता है उसकी लागत उतनी ही ज्यादा होती जाती है। गंदगी साफ करने के लिए बहुत अधिक पानी चाहिए। अगले चरण में ऐसी भूमिगत व्यवस्था अपनानी होगी जहां हर घर को आपस में जोड़ दिया जाए। गंदे पानी को दूर से दूर स्थित सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट तक पहुंचाया जाए ताकि उसे निस्तारण के पहले साफ किया जा सके। लेकिन इतना भी पर्याप्त नहीं है। सच तो यह है कि हमारी नदियों में साफ पानी उपचार के बाद भी नहीं बचता। इसका तात्पर्य यह है कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के साफ पानी को नदियों में छोडऩे के पहले बहुत अधिक साफ करना चाहिए। परंतु ऐसा कभी होता नहीं है। सरकार नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, शौचालयों और भूमिगत नालियों की योजना बनाती  रहती है और गंदगी बढ़ती जाती है। यह रवैया भी ऐसा है जहां अवसर का पूरा लाभ नहीं लिया जा पा रहा। शहर की गंदगी के प्रवाह से दो हकीकतें हमारे सामने आती हैं। पहली बात, देश के लगभग सभी शहरों में अधिकांश मानव मल का न तो उपचार होता है, न ही उसे सुरक्षित ढंग से निपटाया जाता है। दूसरी बात, विभिन्न शहरों के अधिकांश शौचालय भूमिगत पाइप लाइन से नहीं बल्कि अलग-अलग सेप्टिक टैंक से जुड़े हैं। इस काम को अत्यंत संगठित ढंग से अंजाम देने की आवश्यकता है। 
 
इस मामले में आम घर जो फ्लश करते हैं वह पूरा मल एक टैंक में जाता है। टैंक अगर अच्छी तरह बनाया गया है तो वह गंदगी को रोक लेगा और तरल को बह जाने देगा। शुष्क मल को बाद में टैंक से निकालकर उपचार के लिए भेजा जा सकता है। यह व्यवस्था कारगर साबित हो सकती है। बशर्ते टैंक उपयुक्त तरीके से बने, मल को समय-समय पर निकालकर उपचारित किया जाए और इस पूरी प्रक्रिया की भलीभांति निगरानी की जाए। ध्यान रहे कि यह सब एकदम सुरक्षित अंदाज में किया जाना चाहिए। 
 
सच तो यह है कि शुष्क मल पोषण से भरपूर होता है। आज दुनिया भर में नाइट्रोजन चक्र नष्टï किया जा रहा है क्योंकि हम पोषक तत्त्वों से भरे मल को पानी में बहा देते हैं। इस मामले में हम मानव मल को दोबारा बतौर खाद धरती के हवाले कर सकते हैं। यह उर्वरक की तरह काम कर सकता है। उपचार के बाद इस शुष्क मल को किसानों को दिया जा सकता है। यह पूरी तरह जैविक खाद है। इसके अलावा इसे अन्य अन्य जैविक कचरे के साथ मिलाकर बायोगैस बनाने में या एथेनॉल आदि बनाने में इस्तेमाल किया जा सकता है।
 
सरकारों को भी अब अहसास हो रहा है कि यह पुरानी व्यवस्था भर नहीं है बल्कि इसे सही तरीके से तो आगे भी इस्तेमाल किया जा सकता है। सेप्टिक टैंक कचरा संग्रहण की विकेंद्रित प्रणाली है। भूमिगत सीवेज व्यवस्था बनाने के स्थान पर बेहतर यह होगा कि भविष्य में शहरी सफाई के लिए सेप्टिक टैंक पर गंभीरता से विचार किया जाए। आखिरकार हम बिना लैंडलाइन के मोबाइल टेलीफोनी की ओर बढ़ गए कि नहीं। साफ-सफाई के मामले में व्यक्तिगत सेप्टिक टैंक ऐसी ही भूमिका निभा सकते हैं। 
 
शहरों की साफ-सफाई की योजना में यह बात समझी जानी चाहिए कि ये सारी व्यवस्थाएं भविष्य में बेहतर इस्तेमाल की जा सकती हैं। सबसे अहम है यह व्यवस्था तैयार करना। सही क्रियान्यवन और इस व्यवस्था का प्रमाणन इसमें अहम है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात है इस मल के संग्रहण और परिवहन के लिए न्यूनतम नियमन ताकि उसे उपचारित किया जा सके बजाय कि कहीं भी फेंक देने के। आज भूमिगत सीवेज संग्रहण टैंकर कारोबार का फलता-फूलता निजी बाजार है। यह कारोबार केवल मल हटाने का है, उसे सही तरीके से ठिकाने लगाने का नहीं। ऐसे में यह गंदगी करीबी नाले, नदी, झील यहां तक कि खेत या जंगल में ही फेंक दी जाती है। अगर सही ढंग से नियमन किया जाए तो यह बंद हो सकता है और उक्त मल को दोबारा खाद आदि के रूप में प्रयोग में लाया जा सकता है। इस तरह का कचरा प्रबंधन कहीं अधिक सस्ता और स्थायित्व भरा है। इससे बड़ी तादाद में रोजगार भी तैयार होता है। यह ऐसा उपाय हमारे सामने रखता है जहां गंदगी केवल गंदगी नहीं रह जाती बल्कि वह एक संसाधन बन जाती है। इसमें हर तरह से लाभ है। यही हमारे भविष्य और नदियों के लिए इकलौती उम्मीद है।
 
Keyword: clean india, स्वच्छ भारत अभियान,
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