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सरकार के सामने लगा है समस्याओं का अंबार

नितिन देसाई /  April 24, 2017

जीएसटी की शुरुआत से लेकर एच1बी वीजा समस्या तक सरकार को तमाम दिक्कतों से तेजी से निपटने की आवश्यकता है। विस्तार से बता रहे हैं नितिन देसाई 

 
हाल ही में सामने आए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़े दिखाते हैं कि निवेश की दर में निरंतर गिरावट आ रही है। इसे उद्योग जगत में ऋण वृद्घि के स्तर में आई गिरावट में भी दर्ज किया जा सकता है। संभव है कि नोटबंदी ने आर्थिक गतिविधियों को उतना अधिक प्रभावित न किया हो जितना पहले अनुमान लगाया गया था। लेकिन इसकी वजह से निवेश में सुधार की प्रक्रिया में अवश्य देरी हुई जबकि हमें निवेश की सख्त आवश्यकता है। इसमें और अधिक देरी हो सकती है क्योंकि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की शुरुआत के आरंभिक दौर में कई विसंगतियां हो सकती हैं। फंसे हुए कर्ज (एनपीए) के मसले को हल करने में हो रही निरंतर देरी और सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में एच1बी वीजा की समस्याओं के कारण भी दिक्कत हो सकती है। ऐसे में सरकार के सामने तात्कालिक चुनौती है इन तमाम समस्याओं को हल करना ताकि कारोबारी अस्तित्व बचाने से अपना ध्यान हटाकर वृद्घि पर लगा सकें। 
 
जीएसटी की शुरुआत: जीएसटी की शुरुआत करने के लिए यह जरूरी है कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर एक अहम नई अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था तैयार करें। ऐसी आशंका है कि न तो कर प्रशासन और न ही कारोबारी जगत जुलाई से इसकी शुरुआत के लिए तैयार हैं। पहली चुनौती तो यही है कि विभिन्न जिंसों को एक ऐसे दर ढांचे में समायोजित किया जाए जहां कई अलग-अलग दायरे हैं। इसकी वजह से उद्योग जगत ने जमकर लॉबीइंग भी की। जीएसटी की मदद से एक मानक दर तय करनी थी जिसमें सीमित ऊपर-नीचे होने की गुंजाइश बहुत कम हो। अब हमारे पास ऐसे दो दायरे हैं जबकि बीच में 18 फीसदी की केंद्रीय दर है। सरकार 18 फीसदी की दर को अधिकांश वस्तुओं की डिफॉल्ट दर घोषित करके हालात को संभाल सकती है।
 
कई कर दरें रखने की एक वजह यह भी हो सकती है कि उत्पाद के स्तर पर राजस्व प्रतिपूर्ति हासिल करने की कोशिश में कहीं उपभोक्ता नाराज न हो जाए। लेकिन इसके अलावा भी नाराजगी की गुंजाइश है। आज की तारीख में उपभोक्ता को बिल पर उत्पाद शुल्क नजर नहीं आता है। वह केवल बिक्री कर और कुछ अन्य विक्रय संबंधी कर ही देख पाता है। अब उत्पाद शुल्क इस एकल कर व्यवस्था का हिस्सा होगा और बिल में दिखने वाली दर कहीं अधिक होगी। उत्पाद शुल्क संग्रह से लेकर बिक्री कर तक देखा जाए तो बिल में दिखने वाले कर प्रतिशत में खासा इजाफा हो सकता है। यह बढ़ोतरी एक तिहाई तक हो सकती है। यह बात बिक्री के अंतिम चरण में कर वंचना का दबाव बना सकती है। इस झटके को कम किया जा सकता है, बशर्ते विक्रेता शुद्ध मूल्य में ऋण क्रेडिट को भी स्थान दे। इस लक्ष्य के साथ जीएसटी अधिनियम के प्रावधानों में मुनाफाखोरी पर लगाम लगाना शामिल है। लेकिन असली दबाव तो जनता की जागरूकता और प्रतिस्पर्धा से ही आएगा। 
 
जीएसटी में खरीद और बिक्री के लेनदेन का पूरा हिसाब रखना होगा, चाहे उद्यम कितना भी बड़ा या छोटा हो। ऐसा कर का हिसाब रखने के लिए आवश्यक है। यह एक बहुत बड़ा काम है और सरकार को शुरुआती तीन से छह महीने का समय इसके क्रियान्वयन के परीक्षण में लगाना चाहिए जहां कर प्रशासन का पूरा ध्यान व्यवस्था का आकलन करने और इसे जीएसटी ढांचे से जोडऩे पर होना चाहिए न कि कड़े प्रवर्तन पर। 
 
एनपीए का निदान: निवेश प्रक्रिया में सुधार काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि कई कंपनियों की बैलेंस शीट समस्या से कैसे निपटा जाता है? खासतौर पर बुनियादी ढांचा क्षेत्र की कंपनियों की समस्या और बैंकों के फंसे हुए कर्ज पर। वर्ष 2016 के अंत में सरकारी और निजी कंपनियों का फंसा हुआ कर्ज करीब 70 खरब रुपये था और बीते दो साल में इसमें 135 का इजाफा हुआ है। सरकारी बैंकों के सकल जमा में 11 फीसदी उछाल आई है। 
 
हो सकता है कुछ फंसा हुआ कर्ज जानबूझकर देनदारी चूकने वालों को हो। उनसे भुगतान कराया जाना चाहिए। लेकिन अधिकांश मामलों में कर्ज इसलिए फंस जाता है क्योंकि परियोजनाओं का सही ढंग से आकलन नहीं किया जाता। कर्जदार और कर्ज लेने वाला, दोनों इस आकलन की गड़बड़ी के दोषी होते हैं और उनको कर्ज के मूल्य में आई कमी को साझा करना चाहिए। सरकार इसलिए स्वामित्व का भार नहीं लेती है क्योंकि उसे डर होता है कि उस पर विकृत पूंजीवाद का आरोप लग जाएगा।
 
एक तरीका यह भी हो सकता है कि एक स्वतंत्र और अधिकार संपन्न संस्थान मसलन बैंक बोर्ड ब्यूरो से काम लिया जाए जो न तो मालिक होता है और न ही प्रबंधक। यह ऋण की जवाबदेही को कम करने के लिए कुछ प्रस्ताव रख सकता है। यह काम आरबीआई और वित्त मंत्रालय के स्पष्ट दिशानिर्देश के अनुरूप हो सकता है। आशा है कि इससे बैंक प्रबंधकों का बचाव होगा और सरकार पर भी पक्षपात का आरोप नहीं लगेगा। 
 
एच1बी वीजा बदलाव: भारतीय कंपनियां और उनकी विदेशी शाखाएं या अनुषंगी कंपनियां सालाना 100 अरब डॉलर मूल्य का सॉफ्टवेयर, बिजनेस प्रोसेसिंग और इंजीनियरिंग सेवाएं आदि निर्यात करती हैं। यह देश के निर्यात का बड़ा हिस्सा है और युवाओं में रोजगार का बड़ा माध्यम भी है। अमेरिका हमारा सबसे अहम बाजार है और अब इस कारोबार में एच1बी वीजा नियमों की कड़ाई की तलवार लटक रही है। संबंधित कंपनियों और सरकार को इससे निपटने की योजना बनानी चाहिए। 
 
अमेरिका के ट्रंप प्रशासन ने एच1बी वीजा को लेकर जो कदम उठाए हैं वे विदेशी कंपनियों पर केंद्रित लग रहे हैं और इससे अमेरिकी कंपनियों को फायदा मिलेगा। ऐसे में संकेत यही हैं कि एच1बी वीजा के लिए आवेदन करने वालों को कड़ी जांच का सामना करना होगा। जिन कंपनियों में पहले ही एक औसत से ज्यादा तादाद में ऐसे वीजा कर्मी काम कर रहे हैं, वहां नए वीजा मिलना मुश्किल कर दिया गया है। इसका सीधा भारत समेत उन विदेशी सेवा प्रदाताओं पर पड़ेगा जिन्होंने अपने स्थानीय कार्यालय बना रखे हैं। जबकि अमेरिकी कंपनियों के लिए वीजा आवेदन करने वालों के साथ अधिक सकारात्मक व्यवहार होगा। कुलमिलाकर यह अमेरिकी नागरिकों के रोजगार को बचाने का नहीं बल्कि अमेरिकी पूंजी को बचाने का कदम है। 
 
संबंधित कंपनियां अमेरिकी कंपनियों के साथ अपना अंतर कम कर सकती हैं। वे अपने स्थानीय कार्यालयों में अमेरिकी नागरिकों को बेहतर प्रबंधन पदों पर बिठा सकती हैं। सरकार इन संरक्षणवादी उपायों को जनता के बीच और निजी बहस में उठाकर इस पर ध्यान आकर्षित करा सकती है। इतना ही नहीं यह भारत और अमेरिकी कंपनियों के उन कर्मचारियों के बीच का अंतर का प्रभाव कम कर सकती है जिन्हें एच1बी वीजा की जरूरत है। इसके लिए अमेरिकी कंपनियों में काम के लिए आव्रजन मंजूरी जरूरी की जा सकती है लेकिन भारतीय कंपनियों की अमेरिकी शाखा में काम करने के लिए नहीं। 
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी, एच1बी वीजा,
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