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संपादकीय /  April 24, 2017

केंद्रीय बजट पेश करने की तारीख को कुछ माह आगे करने के पश्चात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अब राज्य सरकारों से कहा है कि वे अपने वित्त वर्ष को जनवरी से दिसंबर के चक्र में तब्दील करने पर विचार करें। ऐसा करने पर एक बार फिर बजट की प्रस्तुति की तारीख बदलनी होगी। मोदी ने दलील दी है कि भारत जैसे देश में जहां कृषि की आय अत्यंत अहम है वहां बजट को वर्ष की कृषि संबंधी आय के तत्काल बाद तैयार किया जाना चाहिए। 

 
यह कोई नई मांग नहीं है। वित्त वर्ष में बदलाव की मांग तो लगातार की जाती रही है। खासतौर पर तब जब देश में सूखा पड़ता है। सन 1970 के दशक के आखिर में और 1980 के दशक के आरंभ में सरकार ने एल के झा के अधीन एक समिति गठित की थी। मोदी सरकार ने भी एक विशेषज्ञ समिति से वही सवाल दोहराया है। समिति ने अपनी रिपोर्ट दिसंबर में सौंप दी है लेकिन उसकी अनुशंसाओं को सार्वजनिक नहीं किया गया। यहां सवाल यह पैदा होता है कि अगर सरकार ने वित्त वर्ष बदलने का मन बना लिया है तो समिति बनाने का क्या तुक है? 
 
प्रधानमंत्री ने इस बदलाव के लिए जो दलील दी है वह भी नई नहीं है। इस सिलसिले में मुख्य दलील हमेशा से यही रही है बजट निर्माण में मॉनसून के प्रभाव और संसाधनों के इस्तेमाल का पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए। इस मसले पर एक नोट नीति आयोग की वेबसाइट पर भी मौजूद है। उसमें विवेक देवरॉय और किशोर देसाई ने वित्त वर्ष चक्र में बदलाव का पक्ष लिया है। बजट की टाइमलाइन को देखते हुए उनका कहना है कि जब तक सरकारी अधिकारियों को नया आवंटन मिलता है तब तक पिछले दक्षिण पश्चिम मॉनसून का असर पुराना पड़ चुका होता है। 
 
जब तक नया आवंटन जमीनी अधिकारियों तक पहुंचता है तब तक अगला मॉनसून बस आने ही वाला होता है। इन हालात में समायोजन की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती। इसके अलावा कृषि क्षेत्र देश की कुल श्रम शक्ति के लगभग आधे के लिए जिम्मेदार है। बहरहाल, ऐसे बदलाव के खिलाफ भी कई दलील हैं। उदाहरण के लिए लगभग सभी प्रमुख आर्थिक संस्थानों को भी अपना अंकेक्षण बदलना होगा। यह केवल एक बजट का मामला नहीं है और इस बदलाव के लिए पूरी अर्थव्यवस्था में ऐसे संस्थागत बदलाव लाने होंगे जिनकी लागत बहुत ज्यादा होगी। 
 
इस कदम से ऐसे वक्त में व्यापक उठापटक पैदा होगी जबकि देश के वित्तीय तंत्र को बहुत अधिक स्थिरता की आवश्यकता है। पहले ही देश एक नई अंकेक्षण व्यवस्था अपनाने जा रहा है। इस वर्ष के अंत में काफी उठापटक होनी तय है क्योंकि वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था लागू होने वाली है। इतना ही नहीं अंकेक्षण को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाने की दलील में भी कोई दम नहीं है क्योंकि इस संबंध में कोई मानक वैश्विक व्यवहार है ही नहीं। इस बदलाव से भारत में निवेश बढऩे की भी कोई उम्मीद नहीं है क्योंकि यह निवेश में गतिरोध की वजह भी नहीं है। इतना ही नहीं इस कदम की बदौलत देश के आर्थिक आंकड़ों को लेकर पहले से ही धूमिल माहौल और अधिक अस्पष्टï होगा। 
 
जहां तक मॉनसून के खेती पर पडऩे वाले असर की दशकों पुरानी दलील की बात है तो हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि मॉनसून जिस फसली खेती को सीधे तौर पर प्रभावित करता है, वह देश के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का बमुश्किल 11 फीसदी है। संक्षेप में कहें तो यह एक ऐसा झटका है जिससे देश की अर्थव्यवस्था बची रहे तो ही बेहतर माना जाएगा।
Keyword: budget, संसद बजट सत्र, narendra modi,,
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