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बैंकिंग संकट का हल और एआरसी व्यवस्था

अजय शाह /  April 23, 2017

एआरसी की व्यवस्था केवल तभी उपयोगी साबित हो सकती है जब वह एक साधारण प्राइवेट इक्विटी फंड हो। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अजय शाह

 
देश की बैंकिंग समस्या के हल में परिसंपत्ति पुनर्गठन कंपनियों (एआरसी) की भूमिका को लेकर काफी रुचि देखने को मिल रही है। इस सिलसिले में हमें सबसे पहले उन गलतियों को दूर करना होगा जो अब तक एआरसी के नियमन में हुई हैं। हमें यह प्रश्न उठाना चाहिए कि आखिर क्यों एक एआरसी फंसे हुए कर्ज यानी एनपीए से निपटने में बैंक से बेहतर है? आखिर क्यों बैंक एआरसी को परिसंपत्ति बेचकर बुरी खबर को स्वीकार करेगा? देश के बैंक ऋण देने और फंसे हुए कर्ज से निपटने के मामले में खासे पिछड़े हुए हैं। हमें ऐसा क्यों लगता है कि एआरसी बेहतर काम करेगी? आखिर दोनों के कर्मचारी तो उसी श्रमशक्ति से आते हैं।
 
एआरसी तभी कामयाब होगी जब उसे एक सामान्य प्राइवेट इक्विटी फंड की तरह इस्तेमाल किया जाए। वहां प्रबंधक होंगे और निवेशक भी। प्रबंधक निवेशकों को मनाएंगे कि वे पूंजी निवेश करें। एआरसी फंसे हुए कर्ज को नकदी देकर खरीदेगी। तब फंसे हुए कर्ज को निपटाया जाएगा। उसे होने वाला मुनाफा निवेशकों को जाएगा। प्रबंधकों को प्रदर्शन के मुताबिक भुगतान किया जाएगा। एआरसी के प्रबंधक वित्तीय परिसंपत्ति के प्रतिभूतिकरण और प्रतिभूति ब्याज पुनर्गठन अधिनियम (एसएआरएफएईएसआई) और इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी कोड (आईबीसी) की मदद लेकर अधिकतम मूल्य हासिल कर सकते हैं। सरकारी क्षेत्र की एआरसी एक भ्रमित प्रावधान है क्योंकि इसमें कोई प्रोत्साहन ढांचा नहीं होता।
 
क्या निजी इक्विटी फंड को नियमन की आवश्यकता है? जरा एफएसएलआरसी (वित्तीय क्षेत्र विधायी सुधार आयोग) की जांच सूची पर नजर डालते हैं। निजी इक्विटी फंड में कोई खुदरा निवेशक नहीं होता। इसलिए वहां उपभोक्ता संरक्षण की समस्या नहीं है। वे कोई वादा नहीं करते, इसलिए सूक्ष्म नियमन की कोई समस्या नहीं है। वे इतने बड़े नहीं हैं कि अर्थव्यवस्था को संकट में डाल सकें इसलिए जोखिम के व्यवस्थित नियमन की भी आवश्यकता नहीं है। इन तीन वजहों के चलते निजी इक्विटी फंड को नियमन से परे रहना चाहिए। 
 
दुर्भाग्यवश आज हमारे देश में एआरसी को लेकर स्थिति स्पष्टï नहंी है। एआरसी नकद भुगतान नहीं करती। बैंकों की समस्या परिसंपत्ति के बिकने मात्र से नहीं होती। कई ऐसे एआरसी नियमन हैं जो अवधारणा के स्तर पर भ्रम के शिकार हैं। इन गलतियों ने एआरसी के लिए समस्या पैदा की है। बैंक की बात करें तेा उसे यह तय करना होता है कि वह परिसंपत्ति बेचेगा या नहीं। वह एक नीलामी करता है और एक एआरसी या कोई अन्य व्यक्ति सबसे ऊंची बोली लगाता है। यह बेहद सामान्य प्रक्रिया होती जिसके भुगतान की बारी आती है। एक बार परिसंपत्ति के बिकने के बाद बैंक का मामला निपट जाता है।
 
जब कोई 100 रुपये सांकेतिक मूल्य की वस्तु 30 रुपये में बिकती है तो बैंक को अपने मुनाफे में 70 रुपये का नुकसान सहना पड़ता है। अगर संपत्ति के 30 रुपये में बिकने पर 70 रुपये का नुकसान होता है तो यह बहुत ज्यादा है। बैंक बुरी खबरों को छिपाना चाहते हैं। हर प्रबंधक, हर मुख्य कार्याधिकारी, चाहता है कि बुरी खबर सामने न आए। यहां पर बैंकिंग नियमन सामने आता है। बैंक नियमन को दो काम करने होते हैं। पहला, आरबीआई को यह जोर देना चाहिए कि नकदी के बदले फंसे हुए कर्ज की साफ-साफ बिक्री होगी। यानी फंसे हुए कर्ज के बदले नकदी के बजाय कागज सौंपने की परंपरा बंद।
 
दूसरी बात, आरबीआई को बैंकों पर यह दबाव बनाना चाहिए कि वे किसी परिसंपत्ति के फंसे हुए कर्ज में बदलने के तत्काल बाद उसका मूल्यांकन कम कर दें। बैंक के बही खाते में उस संपत्ति की कीमत तत्काल शून्य कर दी जानी चाहिए। बैंक को आंतरिक तौर पर कोशिश करनी चाहिए कि एक बार परिसंपत्ति का मूल्य उसके बही खाते में शून्य होने के बाद उससे अधिकाधिक मूल्य हासिल किया जाए या उसे उचित दर पर नीलाम कर दिया जाए। अगर ऐसा होगा तो बैंक कहीं अधिक तार्किक निर्णय ले पाएंगे। 
 
बैंकिंग नियमन में जिन चीजों की आवश्यकता है वे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग मानक (आईएफआरएस) के मूल भाव से बहुत अधिक अलग नहीं है। परिसंपत्ति का मूल्यांकन बाजार मूल्य के अनुमान के आधार पर किया जाना चाहिए और इस दौरान सख्त लेखा नियमों का पालन किया जाना चाहिए। अगर आईएफआरएस के मूल सिद्घांत भर लागू कर दिए जाएं तो देश में बैंकिंग नियमन की विफलता काफी हद तक दूर की जा सकती है। 
 
हमें यह ध्यान देना होगा कि नियमन के दोनों तत्त्व यानी नकदी के बदले बिक्री और फंसे हुए कर्ज के मूल्य में तेजी से कमी करना, बैंकिंग के नियमन के दायरे में है। एआरसी जैसे किसी निजी इक्विटी फंड के कामकाज में आरबीआई या किसी अन्य वित्तीय नियामक की कोई भूमिका नहीं है। एआरसी के नियमन तय करने की आरबीआई की प्रक्रिया गलत थी। एक बार अगर हम इस चीज में सुधार कर लें तो एआरसी सफल होंगी। वैश्विक वित्तीय बाजार में काफी पूंजी मौजूद है जिसकी मदद से निवेशक एआरसी में राशि लगा सकते हैं। इसलिए उनके काम करने का पैमाना बहुत बड़ा हो सकता है। लेकिन इसके लिए एक और नीतिगत कमी को दूर करना होगा। उस पूंजी नियंत्रण को दूर करना होगा जो पूंजी को एआरसी में आने से रोक रहा है। अगर एआरसी शब्द को ही समाप्त कर दिया जाए तो बेहतर होगा। हमें उसकी जगह केवल निजी इक्विटी फंड का प्रयोग करना चाहिए। 
 
भारत में यह अवधारणा विफल हो चुकी है। लेकिन इसका यह तात्पर्य नहीं है कि सरकार को अपनी एआरसी शुरू करने की आवश्यकता है। हमें उन नीतिगत विफलताओं की तलाश करनी होगी। इस अवधारणा की कमी यह है कि एआरसी एक आरबीआई नियंत्रित संस्था है और आरबीआई काफी हद तक इसकी दिशा तय करती है। ऐसा मोटे तौर पर बैंकों के बारे में आने वाली बुरी खबर छिपाने के लिए किया गया था। यह रुख विफल हो चुका है। इसकी बदौलत बैंकिंग संकट खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है हमें यह स्थिति बदलनी होगी। बैंकिंग नियमन में गलतियों की एक लंबी सूची है। अगर यथास्थिति बनी रहती है तो वह आरबीआई और बैंकों के लिए तो ठीक होगा लेकिन करदाताओं और अर्थव्यवस्था के लिए वह सही नहीं होगा। हमें इन गलतियों की जड़ पर प्रहार करना होगा। इसके लिए जरूरी है कि आरबीआई में बौद्घिक क्षमता को मजबूत किया जाए और उसकी वैधानिक स्थिति को बदला जाए। ऐसा करने से बैंकों के अनुकूल नियम कायदे खत्म किए जा सकेंगे। 
 
(लेखक नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी, नई दिल्ली में प्रोफेसर हैं।)
Keyword: bank, loan, debt, भारतीय रिजर्व बैंक,
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