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जीएसटी के तहत कारोबार कैसे होगा अलग

सुदीप्त दे /  April 23, 2017

अगर हम यह मानकर चलते हैं कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) 1 जुलाई से लागू हो जाएगा तो इस कर प्रणाली के क्रियान्वित होने में 75 दिन से भी कम समय रह गया है। हम यहां आपको बता रहे हैं कि जीएसटी व्यवस्था के तहत कारोबार करना किस तरह अलग होगा। 

 
बिल बनाते समय किस चीज का ध्यान रखना चाहिए? 
 
बिल बनाना नई अप्रत्यक्ष कर प्रणाली का संभवतया सबसे अहम हिस्सा है। इसके आधार पर ही इनपुट टैक्स क्रेडिट निर्धारित होगा। प्रारूप नियमों के मुताबिक बिल में विस्तृत ब्योरा देना होगा। बिल में जरूरी सूचना नहीं भरने या गलत भरने की स्थिति में इनपुट टैक्स क्रेडिट का दावा खारिज किया जा सकता है या इसमें देरी हो सकती है। मुख्य रूप से बिल में करीब 16 विवरण भरने होंगे। इनमें आपूर्तिकर्ता और खरीदार की विभिन्न जानकारियां शामिल हैं। ये एचएसएन (हार्मनाइज्ड सिस्टम ऑफ नॉमेनक्लेचर), प्राप्तकर्ता की 15 अंकों की वस्तु एवं सेवा करदाता पहचान संख्या (जीएसटीआईएन) और जहां डिलिवरी की जानी है, उसका राज्य कोड शामिल हैं। पुणे के चार्टर्ड अकाउंटेंट और जीएसटी प्रशिक्षक प्रीतम माहुरे ने कहा, 'सेवा प्रदाताओं को बिल जमा कराते समय राज्य विशेष की पंजीकरण संख्या देनी होगी।' बीडीओ इंडिया में पार्टनर और हेड (अप्रत्यक्ष कर) अमित सरकार ने कहा कि बिल तैयार करने के लिए किसी कारोबार की आईटी प्रणाली को विभिन्न लेनदेन ग्रहण करने होंगे जैसे अंतर-कंपनी आधार पर सेवाएं, माल की आवजाही एवं अग्रिम की पावती और पुनर्वितरण के लिए केंद्रीयकृत खरीद। 
 
इनपुट टैक्स क्रेडिट का दावा करते समय क्या नहीं करें?
 
इनपुट टैक्स क्रेडिट का दावा करने के लिए आपूर्ति शृंखला के सभी विक्रेताओं का कर अनुपालक होना जरूरी है। सभी करदाताओं की उनके जीएसटी स्कोर कार्ड पर रेटिंग करने की भी योजना है, जिससे विक्रेताओं पर जीएसटी के लिए तैयार होने का अतिरिक्त दबाव बढ़ जाता है। वर्तमान व्यवस्था के तहत कोई भी आपूर्तिकर्ता सरकार से टैक्स क्रेडिट का दावा कर सकता है, भले ही विक्रेता ने अपने कर दायित्व पूरे किए हों या नहीं। यह स्थिति जीएसटी व्यवस्था के तहत बदलने के आसार हैं। 
 
नांगिया ऐंड कंपनी में प्रबंध साझेदार राकेश नांगिया ने कहा, 'विक्रेता को कर के इनपुट टैक्स क्रेडिट के रूप में दावे से पहले इसका भुगतान करना होगा। प्राप्तकर्ता को क्रेडिट का दावा करने से पहले टैक्स बिल और आपूर्ति प्राप्त करनी होगी।' चूंकि क्रेडिट एक निर्धारित समय सीमा में ही उपलब्ध कराया जा सकता है, इसलिए बिल जारी करने की तारीख अहम हो जाती है। सरकार सलाह देते हैं, 'डेबिट और क्रेडिट नोट्स पर नजर रखते हुए 180 दिनों की अवधि में वस्तु एवं सेवाओं के लिए कीमत के भुगतान पर निगरानी रखिए।' प्रारूप नियमों में कहा गया है कि क्रेडिट का दावा करने के 180 दिनों के भीतर विक्रेताओं को भुगतान किया जाना चाहिए। नांगिया ने कहा, 'कर योग्य कारोबार आपूर्ति से संबंधित खरीद के लिए क्रेडिट का दावा किया जाना चाहिए।' 
 
वस्तु एवं सेवाओं के स्टॉक की आवाजाही कैसे अलग होगी? 
 
मॉडल जीएसटी कानून में कोई लेनदेन 'एक राज्य के भीतर' या 'राज्यों के बीच' है, इसके निर्धारण की जिम्मेदारी करदाता पर डाली गई है। माहुरे ने कहा, 'इसलिए व्यक्ति को लेनदेने के प्रकार के आधार पर यह फैसला करना चाहिए कि भुगतान केंद्रीय जीएसटी (सीजीएसटी) और राज्य जीएसटी (एसजीएसटी) या समन्वित जीएसटी (आईजीएसटी) के एवज में है।' सेवाओं की प्रकृति अमूर्त होती है, इसलिए जीएसटी रूपरेेखा में उनके लिए अलग नियम बनाए गए हैं ताकि करदाता सेवाओं के उपभोग का स्थान निर्धारित कर सकें। जीएसटी प्रणाली में आपूर्ति स्थान निर्धारित करने के लिए सेवा प्राप्तकर्ता का स्थायी पता रखना जरूरी हो जाता है। हालांकि इससे दूरसंचार जैसे क्षेत्र के लिए दिक्कत खड़ी हो सकती है, जिसमें उपभोक्ता एक राज्य से दूसरे राज्य में जाते रहते हैं। माहुरे ने कहा, 'दूरसंचार कंपनियों को रियल टाइम बेसिस पर अपने ग्राहकों के आंकड़ों को अद्यतन करना होगा।'
 
कर विशेषज्ञों का कहना है कि जीएसटी के तहत राज्यों के बीच माल की आवाजाही पर कर लगेगा, जिसमें खुद के लिए माल की आवाजाही भी शामिल है। इसी तरह एक राज्य के भीतर विभिन्न पंजीकृत उद्यमों के बीच माल की आवाजाही पर भी जीएसटी लगेगा। सरकार ने कहा, 'इससे कारोबार के लिहाज से आपूर्ति शृंखला को बेहतर बनाने के अवसर भी आएंगे।' जीएसटी कानून के हिसाब से अगर कोई करदाता गलत भुगतान करता है जैसे माल की आवाजाही को राज्य के भीतर मानकर आईजीएसटी के बजाय सीजीएसटी और एसजीएसटी का भुगतान करता है तो उसे फिर से सही कर (आईजीएसटी) का भुगतान करना होगा और गलत चुकाए गए करों के लिए रिफंड का दावा करना होगा। विभिन्न विशेषज्ञों का का कहना है कि लेनदेन राज्य के भीतर है या राज्यों के बीच है, इसका फैसला लेने की जिम्मेदारी करदाता पर नहीं डालनी चाहिए और इसके बजाय जीएसटी कानून में आसान प्रणाली मुहैया करानी चाहिए थी। 
 
व्यक्ति को ज्यादा नकदी प्रवाह की जरूरत होगी? 
 
नांगिया ने कहा कि माल की अंतरराज्यीय आवाजाही पर जीएसटी लगना उन कई वजहों में से एक होगा, जिसके लिए नकदी की जरूरत होगी। उदाहरण के लिए अगर कोई कंपनी अपने एक गोदाम से अन्य राज्यों के गोदामों में माल भेजती है तो यह आईजीएसटी के दायरे में आएगा। इसका मतलब है कि कर अगाऊ देना होगा, जिससे कारोबार के लिए नकदी की जरूरत बढ़ेगी। कारोबार के लिए ज्यादा नकदी प्रवाह की जरूरत की दूसरी वजह जीएसटी प्रणाली में सेवा कर की ऊंची औसत दर होना है। इस समय उद्यम सेवाओं पर करीब 15 फीसदी (विभिन्न उपकरों सहित) कर का भुगतान करते हैं। यह जीएसटी प्रणाली में बढ़कर करीब 18 फीसदी होने का अनुमान है। विशेषज्ञों का कहना है कि निर्यातकों को भी रिबेट के दावे से पहले कर का बोझ झेलना पड़ेगा। 
 
आपूर्ति का स्थान निर्धारित करने में संभावित चुनौतियां?
 
बैंकों और बीमा कंपनियों जैसी सेवा प्रदाताओं को उन सभी राज्यों में अलग-अलग पंजीकरण करना होगा, जहां वे सेवाएं मुहैया करा रही हैं। सभी राज्यों में पंजीकरण की इस अनिवार्यता से उद्यमों की अनुपालना लागत में अहम इजाफा होगा। नांगिया का कहना है कि सेवा कर की वर्तमान प्रणाली में आपूर्ति के स्थान के नियम केवल अंतरराष्ट्रीय लेनदेन पर ही लागू होते हैं। उन्होंने कहा, 'आने वाले समय में ऐसे ही नियम सभी लेनदेन पर लगेंगे, भले ही वे घरेलू हों या अंतरराष्ट्रीय।' विशेषज्ञों का मानना है कि सेवाओं की आपूर्ति के स्थान के नियमों से करदाताओं के लिए कानूनी विवाद पैदा हो सकते हैं।
 
जीएसटी का अर्थ जीएसटी क्या है?
 
यह एक प्रस्तावित नई अप्रत्यक्ष कर प्रणाली है, जिसमें किसी जिंस की देशभर में एकसमान दर होगी। स्थानीय अहमियत में कुछ अपवाद हो सकते हैं, इसलिए ऐसे मामलों में उन जिंसों को छूट मिलेगी। 
 
इनपुट टैक्स क्रेडिट
 
इनपुट (कच्चे माल) पर चुकाए गए करों का रिफंड। यह हर स्तर पर किया जाएगा, ताकि हर स्तर पर कर पर कर न लगे। 
 
यह वर्तमान प्रणाली से कैसे अलग है?
 
जीएसटी में इनपुट टैक्स क्रेडिट के लिए केवल दो श्रेणियां (बकेट) बनानी होंगी- एक राज्य जीएसटी और दूसरी केंद्रीय जीएसटी के लिए। इस समय माना कि कंपनियां 7 राज्यों में बिक्री कर रही हैं तो उन्हें मूल्य संवर्धित कर (वैट) में इनपुट टैक्स क्रेडिट लेने के लिए 7 बकेट बनानी पड़ती हैं। इसी तरह उत्पाद शुल्क के लिए उन्हें उतनी बकेट बनानी पड़ती हैं, जितनी उनकी विनिर्माण इकाइयां होती हैं। सेवाओं के लिए केवल एक बकेट की जरूरत होती है। 
 
स्टेटमेंट और रिटर्न की फाइलिंग 
 
उन्हें बाहर जाने वाली आपूर्ति का ब्योरा बिक्री के अगले महीने की 10 तारीख तक देना होगा। आने वाली आपूर्ति या इनपुट का ब्योरा अगले महीने की 15 तारीख तक और वापस लौटे माल का ब्योरा अगले महीने की 20 तारीख तक देना होगा। इसमें आने और जाने वाला माल और इनपुट टैक्स क्रेडिट के दावे समान होने चाहिए। 
 
जीएसटी में कौन से कर समाहित हो जाएंगे?
 
सेवा कर, केंद्रीय उत्पाद शुल्क, राज्य स्तरीय मूल्य संवर्धित कर और चुंगी जैसे स्थानीय कर। 
 
जीएसटी परिषद 
 
दरों सहित जीएसटी में किन्हीं बदलावों के लिए सुझाव देने वाली संस्था। इसके अध्यक्ष वित्त मंत्री होंगे और राज्योंं के वित्त मंत्री सदस्य होंगे।
 
जीएसटी परिषद में मत अधिकार
 
केंद्र के एक-तिहाई मत होंगे, जबकि राज्यों के संयुक्त रूप से दो-तिहाई मत होंगे। हर राज्य की समान मत शक्ति होगी। 
 
परिषद द्वारा मंजूरी की जरूरत 
 
प्रत्येक फैसले का तीन-चौथाई मतों से पारित होना जरूरी 
 
क्या केंद्र के पास वीटो है?
 
नहीं, लेकिन अकेला केंद्र किसी भी प्रस्ताव पर रोक लगा सकता है। 
 
जीएसटी स्लैब 
 
परिषद ने पांच स्लैब को मंजूरी दी है। ये शून्य, 5 फीसदी, 12 फीसदी, 18 फीसदी और 28 फीसदी हैं। सराफा के लिए एक अन्य स्लैब भी बनाया जा सकता है।  
 
क्या जीएसटी में उपकर और अधिभार समाहित हो जाएंगे?
 
हां। नुकसानदेह, विलासिता और प्रदूषक उत्पादों जैसे तंबाकू, लक्जरी कार, एयरेटेड ड्रिंक और कोयले को छोड़कर। इन पर जीएसटी की सर्वाधिक 28 फीसदी दर के अलावा उपकर भी लगेगा। 
 
इस उपकर का उपयोग और कब तक रहेगा लागू
 
जीएसटी लागू होने से पहले पांच वर्षों में राज्यों को होने वाले किसी नुकसान की भरपाई में इसका इस्तेमाल किया जाएगा। यह केवल पांच साल लागू रहेगा। 
 
जीएसटी में क्या शामिल नहीं है?
 
जमीन को लीज पर देने के अलावा रियल एस्टेट, शराब और बिजली। 
 
क्या पेट्रोलियम शामिल है? 
 
हां, लेकिन इस पर तब तक जीएसटी की शून्य दर होगी जब तक परिषद इस पर जीएसटी लगाने का फैसला नहीं लेती है। तब तक इस पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क और राज्य वैट लागू रहेंगे। 
 
क्या जीएसटी लागू करने के लिए विधेयक लागू किए गए हैं? 
 
हां, राज्य जीएसटी बिलों को छोड़कर, जो संबंधित राज्यों में पारित होंगे। 
 
राज्य जीएसटी विधेयकों के अलावा अब क्या बचा है? 
 
जीएसटी दरों में उत्पादों में उत्पादों का वर्गीकरण और इनपुट टैक्स क्रेडिट, कंपोजिशन, ट्रैन्जिशन और वैल्यूएशन पर चार जीएसटी नियम बनाना। 
 
क्या परिषद ने अन्य नियमों को मंजूरी दे दी है?
 
पांच नियमों- बिल, भुगतान, रिफंड, पंजीकरण और रिटर्न को मंजूरी दे दी गई है। रिटर्न से संबंधित नियमों को अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है। 
 
जीएसटी के तहत कंपनियों को कितने रिटर्न जमा कराने होंगे?  
 
रिटर्न के नियम अभी सार्वजनिक नहीं किए गए हैं, लेकिन प्रारूप नियमों में कहा गया है कि यह करीब 13 होंगे। हर महीने एक और उसके बाद अंतिम रिटर्न। इस समय राज्य स्तरीय वैट के लिए 13, उत्पाद शुल्क के लिए 13 और आपूर्ति के लिए 2 रिटर्न जमा कराने होते हैं। इसलिए वस्तु एवं सेवा कर में आपूर्तिकर्ताओं के लिए यह काम आसान हो जाएगा। 
 
क्या कंपनियों को उन सभी राज्यों में पंजीकरण के लिए आवेदन करना होगा, जहां वे सेवाएं दे रही  हैं? 
 
हां। सेवा प्रदाताओं की परेशानी थोड़ी बढ़ेगी। इस समय उन्हें केंद्रीय पंजीकरण के लिए आवेदन आवेदन करना होता है। 
 
क्या ई-कॉमर्स कंपनियों को एक फीसदी स्रोत पर कर कटौती करनी होगी? 
 
हां। 
 
(इंदिवजल धस्माना)
Keyword: GST, वस्तु एवं सेवा कर, जीएसटी,,
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