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गाय के नाम पर

धु्व मुंजाल /  04 21, 2017

'आप गोलियों के निशान देख रहे हैं? मैं उस रात अपनी गाड़ी चला रहा था।' पहली नजर में दिनेश आर्य एक मामूली व्यक्ति लगते हैं। उन्होंने सफेद धोती-कुर्ता पहन रखा है। हल्की मूछें और दाढ़ी उनके चेहरे पर उभर रही झुर्रियों को नहीं छिपा पा रही हैं। उनकी दायीं कलाई पर कलावा बंधा है और वह अक्सर अपने सहयोगियों को आदेश देते नजर आते हैं। 34 साल के आर्य दिन के समय हरियाणा के रोहतक स्थित आध्यात्मिक केंद्र दयानंद मठ के महंत की भूमिका में नजर आते हैं। लेकिन शाम ढलते ही वह और स्वयंसेवकों  की उनकी टीम एसयूवी मे बैठकर सड़क पर गश्त पर निकल जाती है। इस टीम के अधिकांश सदस्यों की उम्र 20 से 30 साल के बीच है। उनके पास हॉकी स्टिक, बेसबॉल बल्ले और लाइसेंसी हथियार हैं। इन हथियारों के दम पर यह टीम गायों को तस्करों से बचाती है। अपने कार्यालय में बैठे आर्य ने कहा, 'कुछ सप्ताह पहले ढाई घंटे तक गोलीबारी हुई थी।' उनकी मेज पर कुछ नए स्वयंसेवकों के पहचान पत्र बिखरे हुए हैं। उन्होंने कहा, 'हमें पुलिस को अपनी कुछ पहचान बताने की जरूरत पड़ती है। इससे हमारे लड़कों को मदद मिलती है।'

 
आर्य हरियाणा गौ रक्षा दल के महासचिव हैं। उनकी टीम की सड़कों पर अक्सर गौ तस्करों से झड़प होती रहती है और यह उनके लिए रोज का काम है। यह टीम कुछ खास निशानदेही पर गौ तस्करों को दबोचती है। जैसे कम सवारी वाले वाहन, गोमूत्र की बदबू, बिना नंबर प्लेट वाले वाहन और ऐसे वाहन जिनकी पीछे की लाइट जली रहती है। आर्य बेहद शांत भाव से अपनी बात कहते हैं और उनके चेहरे पर कोई भय नहीं है। 
 
अक्सर तस्करों के साथ होने वाली झड़पों का अंत बड़ा दुखद होता है। पशु तस्कर भी समूह में काम करते हैं और अपने पास हथियार रखते हैं। आर्य मुझे अपने मठ के भीतर बने एक बड़े कमरे में ले गए जहां ऐसे लोगों की तस्वीरें लगी हैं जिन्होंने गाय के प्राण बचाने के लिए अपनी जान न्यौछावर कर दी। यहां उन्हें शहीद का दर्जा दिया गया है। रोहतक का गौ रक्षा दल उन सैकड़ों स्वयंभू संगठनों में शामिल है जो इस समय पूरे देश में काम कर रहे हैं। पिछले करीब एक साल से ये संगठन न केवल गायों को तस्करों और मांस के व्यापारियों से बचाने के कारनामों के कारण बल्कि हिंसक होने और बिना किसी सबूत के लोगों के साथ मारपीट करने के कारण भी सुर्खियों में रहे हैं। राजस्थान के अलवर में एक दुग्ध किसान की गौ रक्षकों द्वारा पीटपीटकर हत्या करना इनकी कारगुजारियों का ताजा उदाहरण है। पिछले साल गुजरात के ऊना में गौ रक्षकों ने चार दलितों की लोहे की छड़ों से पिटाई की थी। इन लोगों का कसूर इतना था कि वे एक मृत गाय का चमड़ा उतार रहे थे। दलित कई पीढिय़ों से यह काम करते आए हैं। यह क्रूरता एक वीडियो में कैद हो गई जो वायरल हो गया। इस पर जबरदस्त प्रतिक्रिया देखने को मिली। अब अलवर प्रकरण ने कुछ निर्दयी गौ रक्षकों का चेहरा सामने ला दिया है।
 
नवीन शर्मा से जब संपर्क किया गया तो वह गुस्सा होकर बार-बार फोन पर कहते हैं, 'पर आप को क्या काम है।' शर्मा भारतीय गौ रक्षा दल के राष्टï्रीय महासचिव हैं। दल का दावा है कि उसकी 20 से अधिक राज्यों में मौजूदगी है। सॉफ्टवेयर इंजीनियर से गौ रक्षक बने पवन पंडित ने कुछ साल पहले इसकी स्थापना की थी। बहुत मान मनौवल के बाद शर्मा चंडीगढ़ के करीब पंचकूला में एक सुनसान पार्किंग क्षेत्र में मिलने को तैयार हुए। उन्होंने चोटी रखी है और माथे पर तिलक लगा रखा है। शर्मा तुरंत वाहन के पीछे की सीट पर बैठ जाते हैं। इसका चालक करीब 20 साल का एक स्वयंसेवक है। उसने हमारे लिए दो गिलासों में पेप्सी डाली और कार से बाहर निकल गया। शर्मा ने कहा, 'हमारे पास पूरे देश में 6,000 से 7,000 स्वयंसेवक हैं। हम हिंसा में विश्वास नहीं करते हैं और कोई गुप्त सूचना मिलने पर ही सड़क पर उतरते हैं। इसके बाद मामला पुलिस के हवाले कर दिया जाता है।'
 
गौ रक्षकों का कहना है कि हिंदू गायों को अपनी मां के समान मानते हैं और यही वजह है कि बड़ी संख्या में युवा ऐसे संगठनों का रुख करते हैं। राजकोट के कबाड़ व्यापारी 29 साल के सेेंजल मेहता का कहना है कि धार्मिक विश्वास और गाय से जुड़ी भावनाओं के कारण वह अखिल विश्व गौ संवद्र्घन समिति और भोलेबाबा गौ सेवा समिति से जुड़े। ये दोनों संगठन सौराष्टï्र में सक्रिय हैं। मेहता कहते हैं, 'हम हिंदू हैं और गाय हमारे लिए पवित्र है। उसके लिए कुछ भी करना हमारे लिए पुण्य का काम है। गाय को वध से बचाना मेरा कर्तव्य है। मुझे इस बात की परवाह नहीं है कि दूसरे मेरे बारे में क्या सोचते हैं और मैं क्या करता हूं।' वह गर्व से इस बात को कहते हैं कि कुछ दिन पहले उन्होंने गाय को नुकसान पहुंचाने वाले एक व्यक्ति की पिटाई की थी। 
 
हरियाणा, पंजाब और गुजरात में गौ रक्षकों के संगठनों का आपस में गजब का तालमेल है। अधिकांश संगठनों के मुखिया एक दूसरे को जानते हैं, व्हॉट्सएप और सोशल मीडिया के दूसरे माध्यमों के जरिये तुरंत जानकारी भेजी जाती है और किसी आपात स्थिति में ये संगठन तुरंत एकदूसरे की मदद करते हैं। कई संगठनों का एक ही तरह का नाम है और अक्सर वे एकदूसरे से जुड़े होते हैं। 
 
फिर भी सही दृष्टिïकोण को लेकर उनमें मतभेद हैं। सुरेंद्र शर्मा एक गौशाला चलाते हैं जो पंचकूला से शिमला जाने वाली सड़क के करीब पहाड़ी की तलहटी में स्थित है। वह 2005 से गायों को तस्करों से बचाते रहे हैं और उन्हें अपनी गौशाला में उनका रखरखाव करते हैं। लेकिन उनका तरीका हिंसा और हंगामा करने का नहीं है जो अब एक तरह से पैमाना बन गया है। वह कहते हैं, 'इन संगठनों की मंशा गलत नहीं है लेकिन इनमें कुछ ऐसे तत्त्व शामिल हैं जो इसमें गलतियां कर रहे हैं। हिंसा स्वीकार्य नहीं हो सकती।' शर्मा ने कहा कि सेवक बनने के लिए सुर्खियों में आने की जरूरत नहीं होती है। इनमें से कुछ लोग गाय बचाने के अलावा सबकुछ करते हैं। 
 
देश में गौ रक्षक कई दशकों से अस्तित्व में हैं लेकिन भारतीय जनता पार्टी के तीन साल पहले केंद्र की सत्ता में आने के बाद उनकी बाढ़ सी आ गई है। शर्मा जैसे पुराने गौ रक्षकों का कहना है कि शरारती तत्व अब आगे आ गए हैं। लेकिन गौ रक्षक इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं। आर्य ने कहा, 'हम पिछले कई सालों से यह काम कर रहे हैं। कुछ भी नहीं बदला है। शायद कुछ राजनीतिक लाभ पाने के लिए हमें सुर्खियों में घसीटा जा रहा है।' उन्होंने कहा कि अलवर और ऊना की घटनाएं राजनीति से प्रेरित थीं और उनमें कोई भी गौ रक्षक शामिल नहीं था। हरियाणा के गौ रक्षकों का दावा है कि उनकी मुहिम को मनोहर लाल खट्टïर की अगुआई वाली भाजपा सरकार के बजाय पिछली सरकार से ज्यादा समर्थन मिला था। नवीन शर्मा ने कहा, 'भूपेंद्र सिंह हुड्डïा के कार्यकाल में हमें ज्यादा समर्थन मिला था। वह अक्सर सभी गौरक्षकों को हथियार देने की बात करते थे। यह सरकार तो केवल दिखावा करती है।' खट्टïर विदेशियों को गोमांस खाने की अनुमति के लिए विशेष प्रावधान करना चाहते हैं जिसका नवीन शर्मा समर्थन करते हैं। उन्होंने कहा, 'विदेशी कमरा बंद करके कुछ भी खा सकते हैं लेकिन हम स्थानीय लोगों को गोमांस खाने की इजाजत नहीं देंगे।'
 
भाजपा शासित दूसरे राज्यों में भी यही स्थिति है। गौहत्या पर प्रतिबंध लगाने वाले पहले राज्य छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने गाय की हत्या करने वालों को फांसी पर लटकाने की बात कही है। इसके बावजूद राज्य के गौ रक्षकों के बीच रोष है। विश्व हिंदू परिषद की गौ रक्षा शाखा के राज्य संयोजक ओमेन बिसेन कहते हैं, 'सरकार की बेरुखी के कारण कानून को कड़ाई से लागू नहीं किया जा रहा है। यहां तक कि अगर स्वयंसेवक गायों की तस्करी करने वालों को पकड़ भी लें तो पुलिस प्राथमिकी दर्ज नहीं करती है।' मोहाली में भारतीय गौ रक्षा दल के अध्यक्ष अमित कुमार जोशी अपने सहयोगियों की तरह डराने धमकाने में विश्वास नहीं करते हैं। वह आसानी से देवकी नंदन गौशाला में मिलने को तैयार हो गए। इस गौशाला के दोनों तरफ कार के शोरूम हैं। कशीदाकारी वाला गुलाबी कुर्ता पहने जोशी ने कहा, 'यह सामान्य सी बात है। अगर पुलिस अपना काम करती तो फिर हमें इसमें आगे आने की जरूरत नहीं है। कोई भी आधी रात को घर से निकलकर सड़कों पर इन लोगों से मारपीट क्यों करेगा।' 
 
जोशी गौ संरक्षण के पीछे वैज्ञानिक वजह बताते हैं। उन्होंने कहा, 'पूरे देश में गांवों में हर परिवार के पास एक गाय होती है जो उस परिवार की आय का स्थायी स्रोत होती है। उसे क्यों मारना चाहिए।' कुछ मायनों में गौ रक्षा के नाम पर बने संगठन राज्य सरकार की नाकामियों को परिलक्षित करते हैं। लेकिन दूसरी तरफ कुछ स्थानीय लोगों का कहना है कि यह दादागीरी है। अक्सर पुलिस गौ रक्षकों और मांस ले जाने वालों की झड़प में फंस जाती है। पंजाब पुलिस के एक सब इंस्पेक्टर ने कहा, 'हमें दोनों तरफ से खुली धमकी मिलती है। दोनों पक्षों को राजनीतिक संरक्षण हासिल है। इसके अलावा उनकी लड़ाई गैंगवार की तरह है। कोई भी इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहता है।' अलबत्ता गौ रक्षकों का आरोप है कि पुलिस घूस लेकर गौ तस्करों को छोड़ देती है। गाय के प्रति सम्मान से ही लोग गौ रक्षक नहीं बन जाते हैं बल्कि इसमें रोमांच भी है। कुछ युवा गौरक्षकों को इस काम में बड़ा मजा आता है। वे वाहनों को रोकते हैं, हथियार लेकर चलते हैं, यात्रियों को तंग करते हैं। 
 
हरियाणा पुलिस के एक अधिकारी ने कहा, 'इनमें से कुछ युवा समृद्घ परिवारों के हैं और बेरोजगार हैं। वे कुछ इस तरह का काम करना चाहते हैं जो उनके ऊपर वालों को पसंद है।' गौ रक्षा संगठनों का दावा है कि अधिकांश स्वयंसेवकों को कोई पैसा नहीं दिया जाता है। राज्यों में कानून व्यवस्था की स्थिति बदतर होने के बावजूद मांस के कारोबार में लगे लोगों में कोई डर नहीं है। इनमें से अधिकांश लोग मुस्लिम हैं। आर्य ने कहा, 'तभी तो हमें हथियारों की जरूरत है। हमें डर पैदा करने की जरूरत है।' गौ रक्षा में लगे कई संगठनों ने ऐसे वीडियो अपलोड किए हैं जिनमें उनके कार्यकर्ता गायों को बचाते और तस्करों की पिटाई करते हुए दिखाए गए हैं। इन वीडियो का व्यापक प्रचार प्रसार होता है ताकि खौफ पैदा किया जा सके। लंबी-मोटी मूछों वाले और हथियारों से लैस पंजाब गौरक्षा दल के अध्यक्ष सतीश कुमार पर कई आपराधिक मामले दर्ज हैं। उन पर अपहरण और अप्राकृतिक यौन संबंधों का आरोप है और उन्हें पिछले साल अगस्त में वृंदावन से गिरफ्तार किया गया था। एक वीडियो में उन्हें गौ रक्षा के नाम पर लोगों को पीटते हुए दिखाया गया है। 
 
पंजाब के राजपुरा में इस संगठन के मुख्यालय में जबरदस्त कद काठी के युवा अपने नियमित कामकाज में व्यस्त हैं। इनमें से कोई भी उस घटना के बारे में बात करने को तैयार नहीं है। अधिकांश गौरक्षक यह मानने को तैयार नहीं है कि गौ रक्षा के मुद्दे पर हिंदू और मुस्लिम एकदूसरे के आमने-सामने खड़े हैं। जोशी ने कहा, 'मेरे कई मुस्लिम दोस्त हैं जो मुझसे ज्यादा गाय का सम्मान करते हैं।' पंडित कहते हैं उनका संगठन न तो मुस्लिम विरोधी है और न ही दलित विरोधी। फिर भी अपने लक्ष्य के प्रति उनकी प्रतिबद्घता दृढ़ रहती है। दयानंद मठ के हरे भरे लॉन में दिन ढलने लगा है और आर्य अपने एक सहयोगी को जीप का इंजन शुरू करने को कहते हैं। इस जीप पर बैठकर वह गश्त करने के लिए निकलते हैं। इसके शीशे टूटे हुए हैं और उस पर गोलियों के निशान हैं। फिर उनका एक सहयोगी उन्हें पगड़ी पहनाता है। इसके बाद वह एक स्वयंसेवक को बिठाकर गाड़ी ले जाते हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें कभी डर नहीं लगता है तो आर्य ने कहा, 'जब बात आपकी मां की हो तो फिर किसी भी चीज की अहमियत नहीं है। गौ रक्षा के लिए हम कुछ भी कर सकते हैं।'
 
(साथ में रायपुर से आर कृष्णा दास और अहमदाबाद से विमुक्त दवे)
Keyword: cow, गौ रक्षा दल,
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