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अच्छी शुरुआत

संपादकीय /  April 20, 2017

गत दिनों एक अच्छी खबर आई। भारत में गैर जमानती वारंट जारी होने के बावजूद लंदन में रह रहे कारोबारी विजय माल्या को ब्रिटेन में प्रत्यर्पण की प्रक्रिया का सामना करना पड़ रहा है। देश की नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि वह इस संबंध में कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ा रही है। यह सब उस प्रत्यर्पण संधि के अधीन हो रहा है जिस पर दोनों देशों ने 25 वर्ष पूर्व हस्ताक्षर किए थे। 

 
इस वर्ष के आरंभ में ब्रिटेन को वारंट भेजे जाने के बाद वहां के गृह मंत्री ने मार्च के आखिर में इसे प्रमाणित करके आगे की कार्रवाई के लिए वेस्टमिंस्टर मजिस्ट्रेट की अदालत में भेज दिया। इस सप्ताह अदालत ने कहा कि माल्या को मामले में उत्तर देना होगा और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। बाद में वह जमानत पर रिहा हुए। आगे चलकर प्रत्यर्पण के मामले को अदालत में साबित करना होगा। इसके बाद कई अपीलें होंगी और तब कहीं जाकर वहां के गृहमंत्री इसकी इजाजत देंगे।
 
यह स्पष्टï है कि यह एक लंबी और कठिन प्रक्रिया की शुरुआत है। वास्तव में भारत को ऐसे मामलों में कम ही सफलता मिली है। इकलौती सफलता गत वर्ष मिली थी जब गुजरात में 2002 के दंगों के एक आरोपी को सफलतापूर्वक भारत प्रत्यर्पित कराया गया था। लेकिन उस मामले में आरोपित ने प्रत्यर्पण का विरोध नहीं किया था। अब तक इस संधि के तहत कोई ऐसा प्रत्यर्पण नहीं हुआ है। ऐसा शायद इसलिए हुआ होगा क्योंकि भारत सरकार के कदमों की विधिक गुणवत्ता अदालती मानकों पर खरी नहीं उतरी। 
 
इसके अलावा भारत सरकार, ब्रिटिश सरकार को प्रत्यर्पण की कानूनी आवश्यकताओं के बारे में संतुष्टï नहीं कर पाई। मसलन वह मीडिया प्रभाव से मुक्त जांच और बंदी बनाए जाने के दौरान मानवीय व्यवहार को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं कर सकी। यह स्पष्टï होना चाहिए कि ऐसे हाई-प्रोफाइल मामलों में प्रक्रिया एकदम सीधी सपाट भी नहीं होगी। माल्या खुद को राजनीतिक पीडि़त बता सकते हैं या कह सकते हैं कि उनके साथ भारत में अनुचित व्यवहार किया जा सकता है। ये बातें प्रत्यर्पण से बचाव में काम आएंगी। सरकार को यह सुनिश्चित करने में कड़ी मेहनत करनी होगी कि ब्रिटिश नौकरशाह किसी भी हालत में यह दावा नहीं कर सकें कि मीडिया जांच को किसी भी तरह प्रभावित कर सकता है। अगर ऐसा हुआ तो प्रत्यर्पण की कोशिश खारिज हो जाएगी। 
 
वास्तविक कानूनी प्रक्रिया भी कतई आसान नहीं होगी। सरकार ने माल्या को लेकर अपने शुरुआती नोटिस में इस बात पर एकदम उचित ध्यान दिया है कि यह धोखाधड़ी का मामला है। ऐसा इसलिए कि ऐसे मामले सुस्पष्टï तरीके से परिभाषित हैं और उनकी परिभाषा और संबंधित सजा दोनों देशों की संहिताओं में लगभग समान हैं। सरकार को अपनी कानूनी प्रक्रिया को इसी दिशा में केंद्रित रखना चाहिए। माल्या यह दलील अवश्य देंगे कि वह एक ऐसे अपराध के आरोपी हैं जिसकी प्रकृति दीवानी है जो किसी गंभीर अपराध की श्रेणी में नहीं आता है और इसलिए यह भारत-ब्रिटेन प्रत्यर्पण संधि के दायरे में भी नहीं है। इसके अलावा वह यह दलील भी दे सकते हैं कि आपराधिक आरोप राजनीतिक वजहों से उन पर थोपे गए हैं। इन सवालों का जवाब देना आसान नहीं होगा। भारत सरकार को यह दिखाना होगा कि एक आपराधिक कृत्य हुआ है जिसमें धोखाधड़ी और षडयंत्र शामिल हैं। फिलहाल जो शुरुआत हुई है वह अच्छी है। अगर माल्या को भारतीय न्याय व्यवस्था के दायरे में लाना है तो इसे सधे कदमों से आगे बढ़ाना होगा।
Keyword: vijay malya, भारतीय स्टेट बैंक स्कॉटलैंड यार्ड,
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