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उर्वरक क्षेत्र के बुनियादी मसले अभी भी बरकरार

संजीव मुखर्जी / नई दिल्ली 04 20, 2017

उर्वरक क्षेत्र की खरपतवार

भारत के उर्वरक क्षेत्र में इस समय कुछ ऐसा मंथन चल रहा है, जैसा लंबे समय से नहीं हुआ था। इसमें बिक्री में प्रत्यक्ष नकद अंतरण (डीबीटी), यूरिया की नीम कोटिंग से लेकर यूरिया इकाइयों के लिए गैस की अलग कीमतें, नई मूल्य नीति और सब्सिडी भुगतान से संबंधित नीतियों में बदलाव और विशेष बैंकिंग व्यवस्था शामिल है। इन वजहोंं से यह उद्योग मुख्य धारा में आ गया है और यूरिया का घरेलू उत्पादन बढ़ा है। इससे भारत कम लागत मेंं ज्यादा उर्वरक का उत्पादन कर सकता है, जिससे बहुत ज्यादा नियमन के दायरे वाले इस क्षेत्र में सब्सिडी की बचत होने की पूरी उम्मीद है। भारत में यूरिया की कुल मांग का 20-25 प्रतिशत आयात होता है। वहीं करीब 90 प्रतिशत फास्फेट और 100 प्रतिशत पोटाश का आयात होता है। भारत में सबसे ज्यादा खपत यूरिया की है। 

उम्मीद की जा रही है कि 2018 के बाद से नई मूल्य नीति का दूसरा दौर लागू होने के बाद से इस क्षेत्र में सुधार प्रक्रिया को और बल मिलेगा, जिसमें सरकार उत्पादन लागत के तीन ढांचे लागू होंगे। यह ढांचे सुनिश्चित करेंगे कि जो उर्वरक संयंत्र ज्यादा ऊर्जा का इस्तेमाल करते हैं, वे इसमेंं कमी लाएंगे और सुनिश्चित करेंगे कि उनके उत्पादन की लागत प्रबंध करने योग्य बनी रहे। बहरहाल उर्वरक उद्योग का कहना है कि ऊर्जा की जरूरतें घटाने और इसे नई मूल्य नीति के मुताबिक करने के लिए नए सिरे से निवेश की जरूरत होगी, जिससे कार्यशील पूंजी का दबाव बढ़ेगा। 

इस उद्योग से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'अभी ज्यादातर यूरिया संयंत्रों में औसत ऊर्जा खपत का मानक 6 जीसीएएल प्रति टन है, जिसे हम 9 जीसीएएल प्रति टन से नीचे लाने में सफल हुए हैं। अब इसे और कम करने के लिए ताजा निवेश की जरूरत होगी, जिसे जुटाने के लिए उद्योग को संकट का सामना करना पड़ सकता है।'  उर्वरक के उत्पादन की लागत दो मुख्य चीजों पर निर्भर होता है, पहला वैरिएबल लागत (इसमें कच्चे माल, इस मामले में गैस) और स्थिर लागत (श्रमिक, संयंत्र आदि)। उत्पादन लागत के आधार पर केंद्र सरकार सब्सिडी वापस करती है, जो अलग अलग इकाइयों के  लिए अलग अलग है। यह इस पर निर्भर होता है कि किस कीमत पर संयंत्र को गैस मिल रही है। इस तरह से जो इकाई कम दरों पर गैर प्राप्त करती है, उसकी उत्पादन लागत कम होती है, जबकि गैस महंगी होने पर उत्पादन लागत बढ़ जाती है। यूरिया के लिए गैस की पूलिंग से यह सुनिश्चित हुआ है कि सभी यूरिया विनिर्माण संयंत्रों को कच्चा माल एक दाम पर मिले, जिसे खासकर छोटी इकाइयों को लाभ होगा और इससे उनको ज्यादा उत्पादन के लिए प्रोत्साहन मिलता है।

पिछले महीने के  आखिर में कैबिनेट ने एक फैसले में आयातित यूरिया के मामले में आयात समता मूल्य (आईपीपी)की गणना में बदलाव किया, जिससे असंगति दूर की जा सके। बहरहाल सबसे बड़ा बदलाव या सुधार यह हुआ है कि अगर प्रत्यक्ष नकदी हस्तांतरण के लिए प्वाइंट आफ सेल (पीओएस) नहीं लगाए जाते हैं तो कंपनियोंं की सब्सिडी 1 जून 2017 से रोक दी जाएगी। रसोई गैस की तुलना में उर्वरक के मामले में डीबीटी अलग है, क्योंकि सब्सिडी का अंश कंपनियों के खाते में डाला जाएगा। खरीदार (इस मामले में किसान) सस्ती दरोंं पर खरीद जारी रखेगा और कंपनियों को उसकी खरीद के एक हफ्ते के भीतर उनके खाते में सब्सिडी की राशि दे दी जाएगी। 

उर्वरक के मामले में परंपरागत डीबीटी मॉडल का इस्तेमाल नहीं किया गया, क्योंकि सब्सिडी वाली दरों व बाजार भाव में दोगुने से कुछ ज्यादा का अंतर है और अगर किसान पूरे दाम का भुगतान करते हैं तो उनके ऊपर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। उद्योग को देश भर में 2,00,000 से ज्यादा पीओएस संयंत्र लगाने हैं, जो कंपनियां खुद के खर्च पर करेंगी। इस पर करीब 400 करोड़ रुपये खर्च होंगे।

फर्टिलाइजर एसोसिएशन आफ इंडिया (एफएआई) के महानिदेशक सतीश चंदर ने कहा, 'हम उर्वरक में डीबीटी का विरोध नहीं कर रहे हैं लेकिन चाहते हैं कि इसे सभी बकाये का भुगतान किए जाने के बाद ही पेश किया जाए और साथ ही डीलर के स्तर पर सभी व्यवस्थाएं दुरुस्त कर ली जाएं। इससे बिक्री के मुख्य सीजन में अफरातफरी नहीं होगी।'  

नवंबर 2016 से प्रायोगिक आधार पर 19 जिलों में डीबीटी योजना चल रही है, जिनकी सब्सिडी अभी भी कंपनियों को नहीं मिली है जबकि सरकार ने एक सप्ताह के भीतर इसका भुगतान करने का वादा किया है। बहरहाल केंद्र सरकार के सभी सुधार परवान नहीं चढ़ पाए हैं, जो कुछ वर्षों से चल रहे हैं। यूरिया की 100 प्रतिशत नीम कोटिंग भी उस कदमों में से एक है, जो आलोचना के घेरे में है। 

कृषि विभाग की ओर से कराए गए एक अध्ययन के मुताबिक यूरिया की नीम कोटिंग से धान, गन्ने, मक्का, सोयाबीन, अरहर व लाल चना की उत्पादकता क्रमश: 5.79 प्रतिशत, 17.5 प्रतिशत, 7.14 प्रतिशत, 7.4 प्रतिशत और 16.88 प्रतिशत बढ़ेगी। चंदर कहते हैं, 'अगर यूरिया की नीम कोटिंग की जाती है तो उसका असर कई गुना बढ़ जाता है क्योंकि इससे नाइट्रोजन धीरे धीरे जारी होता है।'

बकायों के तेजी से भुगतान के लिे विशेष बैंकिंग व्यवस्था का बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ा है। उद्योग जगत का कहना है कि ऐसा करने से कार्यशील पूंजी पर दबाव कुछ कम होगा। कृषि अर्थशास्त्री और कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) के पूर्व चेयरमैन अशोक गुलाटी ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा, 'यह सही है कि सुधार के सभी कदमों से उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा, लेकिन इससे कुछ बुनियादी सवालों के उत्तर छूट जाते हैं। अब स्थिति देखें तो करीब 70,000 करोड़ रुपये सब्सिडी दी गई है, जबकि बकाया 30,000 करोड़ रुपये से ज्यादा है। इस तरह से 100,000 करोड़ रुपये का भुगतान नहीं हुआ है। अगर आप खरीद पर मात्रात्मक प्रतिबंध नहीं लगाते हैं या यूरिया के दाम कम नहीं होते हैं तो उस पर बहुत ज्यादा सब्सिडी बनी रहेगी और कोई सुधार संभव नहीं होगा।'

इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट आफ डेवलपमेंट रिसर्च (आईजीआईडीआर) के निदेशक महेंद्र देव का कहना है कि जब तक यूरिया के दाम सरकारी नियंत्रण में बने रहेंगे, इन सभी सुधारों और क्षमता बढ़ाने की कवायदों का कोई असर नहीं होगा और मूल समस्या का कोई समाधान नहीं हो सकेगा।

Keyword: agri, आधुनिक मशीन, किसान, कृषि उपकरण,fertilizer,,
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