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भारत बरकरार रख पाएगा 7-8 फीसदी की वृद्घि दर!

शंकर आचार्य /  April 19, 2017

अगर वाकई यह विकास दर हासिल करनी है तो सरकार को विकास के मोर्चे पर कई चुनौतियों से सफलतापूर्वक निपटना होगा। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं शंकर आचार्य 

 
फरवरी के आखिर में जारी वर्ष 2016-17 की राष्ट्रीय आय के दूसरे अग्रिम अनुमानों में कहा गया कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्घि दर 7.1 फीसदी रहेगी। तब से अब तक सरकार के प्रवक्ता नोटबंदी के सीमित प्रभाव को लेकर कई वक्तव्य दे चुके हैं और उन्होंने भरोसा जताया है कि वर्ष 2017-18 में जीडीपी वृद्घि दर 7.5 फीसदी या उससे अधिक ही रहेगी। कहा जा रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था ने 7-8 फीसदी की स्थायित्व भरी विकास दर पर वापसी कर ली है। क्या वाकई ऐसा है? 
 
कई विश्लेषकों (मसलन सुदीप्त मंडल ने मिंट में 17 मार्च को और इंदिरा राजारामन ने मिंट में ही 7 अप्रैल को) कहा कि केंद्रीय सांख्यिकी संस्थान (सीएसओ) के राष्ट्रीय आय के शुरुआती आकलन में, मूलभूत मूल्य के मुताबिक क्षेत्रवार तरीके से लिए गए सकल मूल्य वर्धन के अनुमान (जीवीए) कहीं अधिक विश्वसनीय हैं, बजाय कि बाजार मूल्य पर लिए गए व्यापक व्यय श्रेणी के जीडीपी के आंकड़ों से। वे कहते हैं कि जीवीए की वृद्धि के बारे में आधिकारिक अनुमान है कि वह वर्ष 2016-17 में गिरकर 6.7 फीसदी रह जाएगी जबकि वर्ष 2015-16 में यह 7.8 फीसदी रही थी। 
 
इसके अलावा अगर नोटबंदी से कम प्रभावित होने वाले क्षेत्रों मसलन कृषि, सामान्य उपयोगिता एवं जन सेवाओं को अलग कर इससे ज्यादा प्रभावित होने वाले क्षेत्रों मसलन उद्योग और सेवाओं पर ध्यान दिया जाए तो आधिकारिक आंकड़े भी यही बताते हैं कि वृद्धि में कमतरी आई है। तब मंडल भी कहते हैं कि उद्योग एवं अन्य सेवा क्षेत्र की श्रेणी (जो जीवीए का 70 फीसदी है), में धीमापन आया और वह वर्ष 2015-16 के 6.7 फीसदी से घटकर 2016-17 में 4.5 फीसदी रह गई।
 
इतना ही नहीं सीएसओ के अग्रिम अनुमान देश के असंगठित क्षेत्र से बहुत कम वास्तविक आंकड़ों का इस्तेमाल करते हैं। इसके बजाय वे संगठित क्षेत्र पर भरोसा करते हैं। यह मानक तरीका तब संवेदनशील साबित हो सकता है जब सभी उपलब्ध प्रमाण और सूचनाएं यह बताएं कि नोटबंदी के कारण नवंबर 2016 से फरवरी 2017 के बीच नकदी की जबरदस्त तंगी रही और इसने असंगठित क्षेत्र के उद्योग धंधों और सेवाओं पर बहुत नकारात्मक असर डाला। सीएसओ के आंकड़ों में इस संभावित कमी को देखते हुए मंडल शीर्ष संकेतक मॉडल का इस्तेमाल करते हैं। गैर खाद्य बैंक ऋण पर आधारित इस मॉडल के आधार पर वर्ष 2016-17 की जीवीए वृद्धि दर 6.1 आती है। ऐसे में अगले कुछ वर्षों में सीएसओ के अनुमान कई बार संशोधित होंगे। केवल तभी हमें यह पता चल सकेगा कि उनके अनुमान सीएसओ के अंतिम निष्कर्ष के कितने करीब थे। 
 
इन तमाम बातों का उद्देश्य है यह स्वीकार करना कि जीवीए के संदर्भ में वर्ष 2016-17 में भारत की आर्थिक वृद्धि के 7 फीसदी से कम होने की काफी संभावना है। अर्थव्यवस्था के पुनर्मुद्रीकरण की प्रक्रिया अप्रैल के मध्य तक पूरी होने की काफी संभावना है, ऐसे में संभव है कि वर्ष 2017-18 में वृद्धि दर उछलकर 7 फीसदी या उससे अधिक का स्तर हासिल कर ले। असली समस्या यह है कि क्या अगले पांच साल में 7-8 फीसदी की वृद्धि दर को हासिल किया जा सकता है। मौजूदा रुझानों को देखकर तो यह खासा मुश्किल लगता है:
 
सुधाररहित और कानूनी विसंगतियों से भरे भूमि और श्रम बाजार, निहायत कमजोर जन शिक्षा और जन स्वास्थ्य व्यवस्था, परिवहन, ऊर्जा जल और सफाई के मोर्चे पर कमजोर बुनियादी ढांचा और विज्ञान तथा शोध एवं विकास में कम निवेश
 
गत वर्ष राष्ट्रीय स्तर पर सकल जमा निवेश में ठहराव देखने को मिला। जीडीपी के अनुपात के रूप में देखें तो वर्ष 2014-15 में जहां यह 30 फीसदी था वहीं 2016-17 में यह घटकर 27 फीसदी रह गया। शायद ही कोई ऐसा देश होगा जो 7 फीसदी की विकास दर के बावजूद 30 फीसदी से कम सकल जमा निवेश दर रखता हो। 
 
दोहरी बैलेंस शीट की समस्या निवेश के सामने एक बड़ी बाधा बनकर उभरी है। इसमें सरकारी बैंकों की परिसंपत्ति का पोर्टफोलियो और अत्यधिक नकदी वाली ऋणग्रस्त कंपनियां शामिल हैं। कुछ पहल और तमाम चर्चा के बावजूद इस समस्या का कोई हल नहीं निकल सका। 
 
एक अन्य समस्या है वर्ष 2009 के बाद उच्च राजकोषीय और राजस्व घाटे का इतिहास। इसमें केंद्र और राज्य का मिलाजुला घाटा शामिल है। इसकी वजह से सार्वजनिक बचत में कमी आई और मौद्रिक नीति की राह की मुश्किल बढ़ी। केंद्र सरकार के राजकोषीय घाटे में बीते तीन साल में कुछ कमी आई लेकिन राज्य सरकारों के बढ़ते घाटे ने उसका कोई फायदा नहीं मिलने दिया। 
 
हाल ही में उत्तर प्रदेश की नई सरकार ने किसानों का 37,000 करोड़ रुपये का कर्ज माफ करने की घोषणा की है। इसका असर न केवल वित्तीय व्यवस्था पर पड़ेगा बल्कि राजकोषीय समावेशन को भी इससे नुकसान पहुंचेगा। अगर अन्य राज्य भी इसे दोहराएंगे तो बहुत बुरा होगा। रिजर्व बैंक के गवर्नर ऊर्जित पटेल ने उत्तर प्रदेश की ऋण माफी योजना की आलोचना की और कहा कि इससे ऋण कारोबार और अनुशासन को नुकसान पहुंचेगा। इसका असर राज्यों और राष्ट्रीय राजकोषीय स्थिति पर पड़ेगा। अगर अन्य राज्य भी लोकलुभावन कोशिश में ऐसी ही योजनाएं आजमाते हैं तो समग्र राजकोषीय घाटा तेजी से बढ़ेगा। इससे विकास की प्राथमिकता वाली योजनाएं प्रभावित होंगी, ब्याज दरें बढ़ेंगी और वृद्घि पर असर पड़ेगा। आरबीआई गवर्नर की ऐसी माफी योजनाओं की मुखालफत सही है। 
 
उत्तर प्रदेश में तथा अन्य प्रांतों में अवैध बूचडख़ानों के खिलाफ लगातार तेज होती कार्रवाई ने भी मांस प्रसंस्करण और चमड़ा उद्योग जैसे प्रमुख रोजगारपरक उद्योगों को नुकसान पहुंचाया है। गौरतलब है कि ये दोनों उद्योग देश के राष्ट्रीय निर्यात में अहम स्थान रखते हैं। किरीट पारेख ने पिछले दिनों एक आलेख में कहा था कि गोवध पर राष्ट्रव्यापी प्रतिरोध लगाने का पशुपालन उद्योग की आर्थिक स्थिति पर तगड़ा असर होगा। वह तो यहां तक कहते हैं कि गोवध पर प्रतिबंध लगाना एक तरह से गाय पर प्रतिबंध लगाने के समान है। गायें भारत से गायब हो सकती हैं। 
 
अदालती फैसलों ने भी आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित किया है। उदाहरण के लिए हाल ही में राजमार्गों के निकट शराब की बिक्री पर रोक लगाई गई। यह कदम स्वागत और पर्यटन उद्योग पर नकारात्मक असर डालेगा। नीति आयोग के सीईओ ने ट्वीट करके कहा कि लाखों रोजगार जा सकते हैं। राज्य के राजस्व पर अलग असर होगा। 
 
देश के वस्तु निर्यात में भी स्थिरता है। बल्कि वर्ष 2011-12 से इसमें गिरावट ही आई है। वर्ष 2016-17 में इसके 270 अरब डॉलर रहने की उम्मीद है। जबकि वर्ष 2003-04 से 2011-12 के बीच यह निर्यात 66 अरब डॉलर से बढ़कर 310 अरब डॉलर तक पहुंच गया था। 
 
आश्चर्य नहीं कि यही वह अवधि थी जब जीडीपी की वृद्घि की औसत दर सालाना 8 फीसदी से ऊपर थी। ऐसे में भविष्य में 7 फीसदी से अधिक की दर को बरकरार रखने के लिए निर्यात में उचित सुधार करने की आवश्यकता है। वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और रुपये के मौजूदा अधिमूल्यन को देखते हुए तो यह संभव नहीं लगता। संक्षेप में कहें तो भारत के मध्यम अवधि में 7-8 फीसदी की वृद्घि दर हासिल करने के लिए यह आवश्यक है कि सरकार कई चुनौतियों से सफलतापूर्वक निपटे।
Keyword: india, grwuth rate, GDP,,
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