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टीवी सामग्री की कीमत तय करने की कानूनी लड़ाई

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  April 18, 2017

भारतीय टेलीविजन जगत में इस सवाल पर चर्चा हो रही है कि क्या कंपनियों को अपने उत्पाद की कीमत तय करने की आजादी है? भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) और स्टार इंडिया के बीच चल रही अदालती लड़ाई के केंद्र में यही सवाल है। इस कानूनी जंग का नतीजा ही यह तय करेगा कि भारत का 58,800 करोड़ रुपये आकार वाला टीवी उद्योग वैश्विक स्तर हासिल कर पाता है या नहीं? 

 
अक्टूबर 2016 में ट्राई ने टीवी सामग्री के मूल्य की सीमा को लेकर एक परिचर्चा पत्र जारी किया था। इसमें टेलीविजन पर प्रसारित होने वाली सामग्री को धार्मिक, सामान्य मनोरंजन और बच्चों के विषय जैसे समूहों में बांटा गया था। इसमें हरेक विधा के लिए कीमत का अधिकतम स्तर भी तय करने की बात कही गई थी। सामान्य मनोरंजक चैनल के लिए यह सीमा 12 रुपये प्रति सेकंड रखी गई है जबकि बच्चों के चैनल के लिए सात रुपये और समाचार चैनलों के लिए पांच रुपये की सीमा तय की गई। 
 
दिसंबर 2016 में टीवी सामग्री के मूल्य सीमा तय किए जाने के विरोध में स्टार इंडिया और उसके हिस्से विजय टीवी ने एक याचिका दायर कर दी। इसमें केंद्र सरकार के औद्योगिक नीति एवं संवद्र्धन विभाग, दूरसंचार विभाग, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और ट्राई को पक्षकार बनाया गया था। याचिका में ट्राई की तरफ से इस तरह की सीमा तय किए जाने को उसके अधिकार-क्षेत्र के बाहर बताते हुए दावा किया गया कि दूरसंचार नियामक का गठन वर्ष 2004 में प्रसारण के नियमन के लिए किया गया था लिहाजा प्रसारण सामग्री का नियमन उसके दायरे में नहीं आता है। 
 
स्टार की याचिका में कहा गया कि ट्राई का मूल्य निर्धारण आदेश कॉपीराइट अधिनियम 1957 के तहत प्रसारकों को हासिल वैधानिक अधिकार में अतिक्रमण करता है। ये कानून उन अंतरराष्ट्रीय संधियों पर आधारित हैं जिन पर भारत भी हस्ताक्षर कर चुका है। इस आदेश पर अगर अमल किया जाता है तो कॉपीराइट अधिनियम के दायरे में आने वाले सामग्री निर्माण, उत्पादन, लाइसेंस जैसे तमाम मुद्दों पर इसका असर पड़ेगा। 
 
इस याचिका पर मद्रास उच्च न्यायालय ने दिसंबर 2016 में टीवी सामग्री का मूल्य तय करने की ट्राई की शक्तियों पर रोक लगा दी। लेकिन मार्च 2017 में उच्चतम न्यायालय ने ट्राई को अपना आदेश अधिसूचित करने की मंजूरी दे दी। उसने मद्रास उच्च न्यायालय को दो महीने के भीतर सुनवाई पूरी कर लेने का भी आदेश दिया। उच्च न्यायालय के पीठ ने स्टार इंडिया और केंद्र सरकार के पक्षों की सुनवाई का काम पूरा भी कर लिया है। लेकिन ट्राई की बहस का काम लंबित है। 
 
इस बीच एक गुमनाम याचिका के चलते मामले की सुनवाई कर रहे दोनों न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस नागमुत्तु और न्यायमूर्ति अनिता सुमंत को मामले से अलग होने के लिए बाध्य होना पड़ा है। इस याचिका में आरोप लगाया गया था कि न्यायमूर्ति नागमुत्तु को संयुक्त प्रगतिशील सरकार के समय उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनाया गया था और उस समय केंद्र में वित्त मंत्री मंत्री रहे पी चिदंबरम ही इस मामले में स्टार इंडिया के वकील की भूमिका निभा रहे हैं। विवाद होने पर खंडपीठ के दोनों न्यायाधीशों ने इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है और अब दो नए न्यायाधीशों को इस पीठ में शामिल किया जाएगा। नया पीठ नए सिरे से सुनवाई करेगा। 
 
यहां पर तीन रहस्य अब भी अनसुलझे हैं। पहला, जब पूरे मामले की सुनवाई अपने अंतिम दौर में पहुंच चुकी थी तब अचानक ही कहां से कोई गुमनाम याचिका दायर कर दी गई। यह सवाल तो सुनवाई शुरू होते समय भी उठाए जा सकते थे। दूसरा, आखिर क्या वजह है कि स्टार को छोड़कर टेलीविजन के तमाम दिग्गज इस पूरे मामले में चुप्पी साधे हुए हैं जबकि स्टार की जीत होने से समूचे प्रसारण उद्योग को फायदा मिलेगा? कुछ महीनों पहले इस मसले को जब देश की पांच शीर्ष प्रसारण कंपनियों के मुख्य कार्याधिकारियों के समक्ष उठाया गया था तो उनमें से अधिकतर ने कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया था।
 
तीसरा, तमाम मसलों पर शानदार काम करने वाले ट्राई ने एक प्रतिगामी नजर आने वाले आदेश को लेकर इतना आग्रही क्यों नजर आ रहा है? जब ट्राई का 2004 में गठन हुआ था तो मूल्य नियमन को लेकर तमाम तर्क दिए जाते थे। टीवी प्रसारण करने वाले केबल उद्योग की हालत तो काफी खराब थी। आज के समय में भारतीय टीवी उद्योग मूल्य श्रृंखला के विभिन्न स्तरों पर काफी हद तक प्रतिस्पद्र्धी हो चुका है। सामग्री उत्पादन के क्षेत्र में हजारों प्रोडक्शन हाउस सक्रिय हैं, वितरण के क्षेत्र में डीटीएच, केबल, आईपीटीवी, इंटरनेट और मोबाइल प्लेटफॉर्म मौजूद हैं जबकि 800 से भी अधिक चैनलों का प्रसारण हो रहा है। ऐसे में टीवी सामग्री की कीमतें तय करने की क्या जरूरत है?
 
ट्राई को मूल्य नियमन के चलते भारत में टेलीविजन कारोबार पर पड़ी लागत की गणना करनी चाहिए। इसने कार्यक्रमों में नयापन लाने, डिजिटाइजेशन की प्रक्रिया सुस्त पडऩे और वितरण में कराड़ों डॉलर का निवेश प्रभावित होने के हालात पैदा हुए हैं। दुनिया की बड़ी केबल एवं डीटीएच कंपनियां सौ फीसदी विदेशी निवेश की अनुमति मिलने के बावजूद भारत में दस्तक देने से परहेज करती रही हैं। आम तौर पर दुनिया भर में संचार क्षेत्र के नियामक कोई भी नियम लागू करने से पहले यह आकलन जरूर करते हैं कि उसे क्रियान्वित करने पर आने वाली लागत क्या होगी?
 
भुगतान राजस्व में कमी ने प्रसारकों के पास विज्ञापनों की भरमार वाले और एक ही विषय वस्तु पर आधारित कार्यक्रमों के सिवाय शायद ही कोई विकल्प छोड़ा है। मूल्य सीमा नहीं होने से टीवी बाजार कार्यक्रमों की गुणवत्ता और विविधता के मोर्चे पर नयापन लाने के लिए आजाद होंगे जिससे इस कारोबार का प्रदर्शन बेहतर होगा। कीमतें तय करने का अधिकार प्रसारकों को देकर ट्राई फिर से विकास का मददगार और उपभोक्ता अधिकारों का रक्षक बन सकेगा।
Keyword: media, AVDT,,
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