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ढांचागत क्षेत्र में निवेश के लिए पीपीपी की दरकार

विनायक चटर्जी /  April 18, 2017

भारत को ढांचागत निवेश में कमी को दूर करने के लिए जल्द ही निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की भागीदारी में तेजी लाने की जरूरत है। इस बारे में विस्तार से बता रहे हैं विनायक चटर्जी


आजादी के बाद के शुरुआती 50 वर्षों में भारत ने अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का करीब तीन फीसदी हिस्सा ढांचागत क्षेत्र के विकास में लगाया जिसकी वजह से यह क्षेत्र 1990 के दशक के आखिर तक बदहाली का ही सामना करता रहा। वर्ष 1997 के आसपास ढांचागत क्षेत्र में बदलाव आना शुरू हुआ ताकि विकास की बढ़ती अपेक्षाओं के साथ तारतम्य स्थापित किया जा सके। इसके लिए ढांचागत क्षेत्र में निवेश को बढ़ाने की जरूरत थी और ऐसे समय में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की भागीदारी (पीपीपी) का मॉडल काफी लोकप्रिय बनकर उभरा। दरअसल उच्च विकास दर वाली उदीयमान अर्थव्यवस्थाओं ने अपने बेहतरीन दिनों में जीडीपी का सात से 10 फीसदी हिस्सा ढांचागत क्षेत्र में निवेश किया है। 
 
इन कोशिशों का असर यह हुआ कि दसवीं पंचवर्षीय योजना से ढांचागत क्षेत्र में जीडीपी का प्रतिशत योगदान यानी सकल ढांचागत पूंजी निर्माण (जीसीएफआई) लगातार बेहतर होता चला गया। वर्ष 2002 में जीसीएफआई 4.8 फीसदी था लेकिन वर्ष 2011 में यह बढ़कर 8.4 फीसदी तक पहुंच गया। इस दौरान निजी क्षेत्र का निवेश भी लगातार बढ़ता रहा। दसवीं पंचवर्षीय योजना में 22 फीसदी के स्तर पर रहा निजी निवेश 11वीं योजना में बढ़कर 37 फीसदी पर पहुंच गया। इस बढ़ोतरी ने योजना-निर्माताओं को ढांचागत क्षेत्र में निवेश को 12वीं योजना में बढ़ाकर 56 लाख करोड़ रुपये तक ले जाने का भरोसा दिलाया। इसके लिए पीपीपी को 48 फीसदी के स्तर तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया गया था। इससे 12वीं योजना के अंत में यानी 2017 तक जीसीएफआई भी नौ फीसदी हो जाने की बात कही गई थी। अब जब यह समय पूरा हो चुका है तो सवाल उठता है कि हम कितना काम कर पाने में कामयाब हुए हैं? इसका जवाब खोज पाना खासा मुश्किल है क्योंकि योजना आयोग का अस्तित्व खत्म होने के बाद कोई आंकड़ा सामने नहीं आया है। न तो नीति आयोग या वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग और न ही सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय की ही तरफ से इस बारे में कोई आंकड़ा रखा गया है।
 
इसके बारे में जानकारी जुटाने का सबसे अच्छा स्रोत एशियाई विकास बैंक (एडीबी) की वह रिपोर्ट है जो एशिया के ढांचागत क्षेत्र की आवश्यकताओं का जिक्र करती है। इस रिपोर्ट में एडीबी ने कहा है कि भारत ने वर्ष 2015 में ढांचागत क्षेत्र में डीजीपी का 5.5 फीसदी हिस्सा निवेश किया है। यह वर्ष 2015 के लिए तय किए गए आठ फीसदी के निवेश लक्ष्य से काफी कम है। चिंता की बात यह है कि ढांचागत निवेश घाटा बढ़ता जा रहा है जिसे देखते हुए नीति-निर्माताओं की नींद उड़ सकती है। 
 
अब इस पहलू पर गौर कीजिए। बारहवीं पंचवर्षीय योजना में ढांचागत निवेश के 56.32 करोड़ रुपये रहने की बात कही गई थी। अगर इस समय भी पंचवर्षीय योजना की व्यवस्था जारी रहती तो 2017-22 की अवधि में 33 फीसदी की बढ़त के साथ ढांचागत निवेश करीब 75 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच जाता। इसका मतलब है कि इन पांच वर्षों में हरेक साल 15 लाख करोड़ रुपये ढांचागत क्षेत्र में निवेश किए जाते। सवाल यह है कि इसमें से निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों से किस अनुपात में यह भारी रकम जुटाई जाती? 
 
जहां तक सरकारी निवेश का प्रश्न है तो वर्ष 2017-18 के केंद्रीय बजट में ढांचागत क्षेत्र में कुल निवेश 3.96 लाख करोड़ रुपये रहने का जिक्र किया गया है। अगर हम यह मान लें कि राज्य सरकारें, मंत्रालय, सार्वजनिक उपक्रम और विभागों के पास उपलब्ध गैर-बजटीय स्रोतों से भी इतनी ही रकम ढांचागत क्षेत्र के लिए जुटा ली जाती है तो भी इस वित्त वर्ष में कुल निवेश करीब आठ लाख करोड़ रुपये ही पहुंच पाएगा। वह 15 लाख करोड़ रुपये की सालाना जरूरत का केवल 53 फीसदी हिस्सा ही होगा। इसका साफ मतलब है कि बाकी बचा सात लाख करोड़ रुपये या 47 फीसदी निवेश निजी क्षेत्र से ही जुटाना होगा। 
 
यह 12वीं पंचवर्षीय योजना में रखे गए 48 फीसदी पीपीपी निवेश के बराबर ही होगा जिसे घरेलू एवं बाहरी निवेशकों से जुटाना होगा। सार्वजनिक व्यय के मामले में मौजूदा सरकार ने जाहिर तौर पर सधे हुए अंदाज में कदम रखा है। मई 2014 में सत्ता संभालने के साथ ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार को यह अहसास हो गया कि पीपीपी कोमा की हालत में पहुंच चुका है और ढांचागत निवेश को पटरी पर लाने का इकलौता तरीका यह है कि छोटी से मध्यम अवधि के लिए सरकारी निवेश बढ़ाया जाए। सार्वजनिक निवेश बढ़ाने के लिए जरूरी कदम उठाने में इस सरकार ने काफी तेजी दिखाई। उच्च-प्रभाव क्षेत्रों में बजट आवंटन बढ़ाने के साथ ही गैर-बजटीय फंडिंग बढ़ाने, ढांचागत क्षेत्र के नए सार्वजनिक उपक्रमों की स्थापना के जरिये संस्थागत क्षमता का निर्माण और प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ से इनके क्रियान्वयन पर गहरी निगाह रखे जाने जैसे कदम उठाए गए। 
 
जहां तक निजी निवेश का सवाल है तो सात लाख करोड़ रुपये का स्तर हासिल कर पाना पहुंच से भी बाहर है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) में आई तेजी ग्रीनफील्ड से अलग मूलत: ब्राउनफील्ड तक ही सीमित दिख रही है। सच तो यह है कि सड़क, पारेषण, रेल, नवीकरणीय ऊर्जा, बंदरगाह, हवाईअड्डा, पाइपलाइन और शहरी ढांचागत क्षेत्र में पीपीपी के लिए निजी निवेश का सवाल है तो अगर हम सालाना एक लाख करोड़ रुपये का भी आंकड़ा पार कर जाते हैं तो यह काफी सौभाग्य की बात होगी।
 
यही बात हमारे लिए बड़ी चुनौती पेश कर रही है। भारत को अगर ढांचागत निवेश की कमी को दूर करना है तो उसे जल्द ही पीपीपी में तेजी लाने की जरूरत है। पीपीपी बढ़ाने के लिए दोहरी बहीखाता समस्या दूर करने, भ्रष्टाचार उन्मूलन अधिनियम को संशोधित करने, विवाद निपटान प्रणाली को तेज करने, मध्यस्थता में फंसी राशि को मुक्त कराना, राष्ट्रीय निवेश एवं ढांचागत फंड के गठन में तेेजी लाने और सही अर्थों में स्वतंत्र नियामक संस्थाओं के जरिये निजी क्षेत्र के लिए बराबरी का अवसर देने जैसे उपाय करने की जरूरत है। 
 
यह तो साफ है कि निजी निवेश की कमी से खाली हुई जगह की भरपाई केवल सार्वजनिक निवेश से ही नहीं की जा सकती है। ऐसे में पीपीपी को बढ़ावा देने वाला वातावरण तैयार करने के लिए जरूरी है कि सरकार ढांचागत क्षेत्र को प्राथमिकता देने का काम करे। नवीनतम आर्थिक समीक्षा में जिक्र भी किया गया है कि निजी क्षेत्र के अनुकूल रवैया बनाने के लिए राजनीतिक गतिशीलता की दरकार है। अगर ऐसा नहीं होता है तो ढांचागत क्षेत्र का घाटा 21वीं सदी के शुरुआती दशकों में एक बार फिर बढ़ जाएगा। 
 
(लेखक फीडबैक इन्फ्रा के चेयरमैन हैं)
Keyword: infra, PPP,,
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